आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की ओर से घटती प्रजनन दर को लेकर दिए गए बयान के बाद देश में नई चर्चा शुरू हो गई है। उनका मानना है कि परिवारों को बच्चों की परवरिश को किसी बोझ के रूप में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि बच्चे ही भविष्य की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। उनका यह भी तर्क रहा है कि यदि परिवार में संतानों की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तो आने वाले समय में मानव समाज को मशीनों की सेवा करनी पड़ सकती है।
जनसंख्या का बूढ़ा होना और असली चुनौतियां
मुख्यमंत्री की इस चिंता को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है, क्योंकि किसी भी समाज के लिए आबादी का तेजी से बूढ़ा होना एक बड़ी परीक्षा बन सकता है। जब कार्यबल में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या घटने लगती है, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा पैदा होता है। इसके साथ ही सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्गों के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल से जुड़े गंभीर सवाल भी सामने खड़े हो जाते हैं। हालांकि, इस स्थिति को लेकर यह बहस जरूर होनी चाहिए कि क्या इसका एकमात्र समाधान केवल जन्म दर बढ़ाना ही है। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या बच्चों का जन्म केवल इसलिए कराया जाना चाहिए ताकि वे भविष्य में मशीनें चला सकें, कर चुका सकें या बुजुर्गों की सेवा संभाल सकें।
संपत्ति की परिभाषा और परवरिश की गुणवत्ता
बच्चों को संपत्ति की संज्ञा दिए जाने को भावनात्मक रूप से तो समझा जा सकता है, क्योंकि वे परिवारों के जीवन में खुशियां लाते हैं। लेकिन यदि इस शब्द का अर्थ यह निकाला जाए कि अधिक बच्चे होने से अधिक कामकाजी हाथ मिलेंगे, तो इस सोच पर विचार करने की जरूरत है। आज के समय में बच्चों की संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनकी जीवनशैली और परवरिश की गुणवत्ता होती है। यदि कोई परिवार दो बच्चों को बेहतरीन शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण दे पा रहा है, तो चार बच्चे पैदा करके समाज को बड़ा योगदान देना आवश्यक नहीं रह जाता है। आज की युवा पीढ़ी केवल इसलिए छोटे परिवार रख रही है क्योंकि उन्हें बच्चों से प्रेम नहीं है, बल्कि इसके पीछे महंगे मकान, महंगी शिक्षा, अनिश्चित नौकरियां, लंबे कार्य घंटे और शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी जैसी कई व्यावहारिक मुश्किलें हैं।
सरकारी नीतियां और परिवारों की वास्तविक जरूरतें
यदि सरकारें सचमुच यह चाहती हैं कि परिवार अधिक बच्चों को जन्म दें, तो केवल जुबानी अपील करने या आर्थिक प्रोत्साहन देने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए ऐसा मजबूत ढांचा तैयार करना होगा जहां बच्चों की शिक्षा सस्ती और सुलभ हो, चिकित्सा खर्च आम आदमी की कमर न तोड़े और कामकाजी माता-पिता के लिए पर्याप्त शिशु देखभाल केंद्र मौजूद हों। महिलाओं के लिए मातृत्व के बाद अपना करियर न छोड़ना पड़े और नौकरी में स्थिरता बनी रहे, यह भी उतना ही जरूरी है। केवल यह चेतावनी देना कि बच्चे न होने पर भविष्य में मशीनों की गुलामी करनी होगी, युवा पीढ़ी को अपनी बात समझाने का सबसे सही तरीका नहीं हो सकता है।
तकनीक और बेहतर प्रबंधन का विकल्प
जनसंख्या के मोर्चे पर आ रही गिरावट से निपटने के लिए जन्म दर बढ़ाने के अलावा भी कई रास्ते मौजूद हैं। मशीनें भी आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा हैं और तकनीक की मदद से कार्यबल की कमी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दम पर लोग अधिक उम्र तक सक्रिय रूप से काम कर सकते हैं और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाया जा सकता है। आने वाला भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि दुनिया में कितने बच्चे पैदा हुए, बल्कि इस बात पर भी टिका है कि हम उपलब्ध संसाधनों और तकनीक का इस्तेमाल कितनी कुशलता से करते हैं।
निर्णय का अधिकार और मानवीय दृष्टिकोण
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि जनसंख्या के रुझानों पर चिंता जताना और सुविधाएं देना सरकार का काम हो सकता है, लेकिन परिवार का आकार क्या हो यह पूरी तरह से दंपती का अपना निजी फैसला होना चाहिए। किसी भी महिला के लिए मातृत्व केवल जनसंख्या बढ़ाने का एक आंकड़ा नहीं है और न ही किसी बच्चे को केवल भविष्य की कार्यशक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए यदि जन्म दर बढ़ाना ही लक्ष्य है, तो लोगों को यह भरोसा दिलाना होगा कि बच्चे का पालन-पोषण किसी भी तरह का आर्थिक या मानसिक बोझ नहीं बनेगा।





















