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पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदू सहिष्णुता वाले दावे पर जावेद अख्तर का पलटवार, 10 प्रतिशत वाले तंज से साधा निशानाराजनीति
16 अग॰ 2026, 12:42 am (27 दिन पहले)· 7

पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदू सहिष्णुता वाले दावे पर जावेद अख्तर का पलटवार, 10 प्रतिशत वाले तंज से साधा निशाना

गीतकार जावेद अख्तर ने पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी और सहिष्णुता पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बयान पर निशाना साधा है। उन्होंने 10 प्रतिशत वाली टिप्पणी से तंज कसा, जबकि 2023 की जनगणना के आंकड़े जरदारी के 4 प्रतिशत आबादी के दावे को खारिज करते हैं।

पाकिस्तान में रहने वाली हिंदू आबादी को लेकर दिए गए बयान पर मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने देश के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को करारा जवाब दिया है। जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आसिफ अली जरदारी के दावों की हवा निकालते हुए उन पर तंज कसा, जिसके बाद इंटरनेट पर लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है।

अल्पसंख्यकों पर आसिफ अली जरदारी का विवादित बयान

पूरा मामला 14 अगस्त का है, जब इस्लामाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने हिंदू समुदाय का जिक्र किया था। उन्होंने अपने भाषण में यह दावा किया कि पाकिस्तान अपने देश में हिंदुओं को बर्दाश्त करता है और वे वहां अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। जरदारी का यह भी कहना था कि हिंदू भारत जाने के बजाय पाकिस्तान में ही रहना पसंद करेंगे। इसके अलावा, उन्होंने अपने भाषण में दावा किया था कि पाकिस्तान में हिंदू आबादी 4 प्रतिशत है और भारतीय लोग 'अखंड भारत' की अवधारणा में विश्वास करते हैं।

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जावेद अख्तर ने जरदारी पर क्यों कसा तंज

राष्ट्रपति जरदारी की इस टिप्पणी के बाद प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की। उन्होंने आसिफ अली जरदारी की राजनीतिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए लिखा कि वे बेनजीर भुट्टो से शादी के बाद चर्चा में आए थे। जरदारी द्वारा 3 से 4 प्रतिशत हिंदू आबादी को बर्दाश्त करने की बात पर जावेद अख्तर ने पुराना तंज कसते हुए लिखा कि वे समझ सकते हैं कि 10 प्रतिशत से कम आबादी वाली किसी भी कम्युनिटी के प्रति जरदारी हमेशा से संवेदनहीन रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं

जावेद अख्तर के इस जवाब के बाद इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने तरह-तरह की राय दी। एक यूजर ने सवाल उठाते हुए लिखा कि कोई व्यक्ति इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है और क्या पाकिस्तान के संविधान के तहत कोई हिंदू देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। वहीं एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की कि कम से कम राष्ट्रपति ने गैर-मुस्लिमों के प्रति अपनी सोच को खुलकर स्वीकार कर लिया है, जिसे ध्यान में रखते हुए ही आगे का रुख तय किया जाना चाहिए।

जनगणना के आंकड़ों ने खोली जरदारी के दावों की पोल

आसिफ अली जरदारी द्वारा बताए गए आबादी के आंकड़े सरकारी रिपोर्ट से मेल नहीं खाते हैं। पाकिस्तान की साल 2023 की जनगणना के अनुसार, वहां हिंदू आबादी लगभग 52 लाख (5.2 मिलियन) है। यह संख्या पाकिस्तान की कुल आबादी का मात्र 2.17 प्रतिशत ही बनती है। यह वास्तविक आंकड़ा राष्ट्रपति द्वारा दावा किए गए 4 प्रतिशत के आंकड़े से काफी कम है, जिससे उनके बयान की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

सवाल-जवाब

जावेद अख्तर ने आसिफ अली जरदारी के किस बयान पर प्रतिक्रिया दी?
आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि पाकिस्तान अपने यहां हिंदुओं को बर्दाश्त करता है और वे वहां सुरक्षित महसूस करते हैं। इसी दावे पर जावेद अख्तर ने तंज कसा।
आसिफ अली जरदारी ने पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी कितनी बताई थी?
आसिफ अली जरदारी ने दावा किया था कि पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 4 प्रतिशत है।
साल 2023 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में वास्तव में कितनी हिंदू आबादी है?
2023 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में हिंदू आबादी लगभग 52 लाख है, जो कुल जनसंख्या का 2.17 प्रतिशत है।
जावेद अख्तर ने आसिफ अली जरदारी पर क्या तंज कसा?
जावेद अख्तर ने कहा कि वे समझ सकते हैं कि 10 प्रतिशत से कम आबादी वाली किसी भी कम्युनिटी के प्रति जरदारी हमेशा से संवेदनहीन रहे हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·26 दिन पहले

जावेद अख्तर का यह तीखा व्यंग्य केवल एक बयान पर प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में राजनीतिक बयानों और वास्तविक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के बीच के भारी अंतर को उजागर करता है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों को 'बर्दाश्त' करने जैसे शब्दों का प्रयोग और 2023 की जनगणना के 2.17 प्रतिशत के आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि वहां की नीतिगत व संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों की स्थिति और राजनीतिक सोच किस दिशा में जा रही है। यह घटना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मानवाधिकारों के मंचों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ सकती है।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·26 दिन पहले

राष्ट्रपति जरदारी का यह बयान और उस पर जावेद अख्तर की प्रतिक्रिया पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में अल्पसंख्यकों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को फिर से केंद्र में ले आई है। विशेष रूप से 2023 की जनगणना के आंकड़े, जो कुल आबादी का मात्र 2.17 प्रतिशत हिंदू हिस्सेदारी दिखाते हैं, राज्य के आधिकारिक दावों की पोल खोलते हैं। जब सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की भाषा में 'सहिष्णुता' और 'बर्दाश्त' जैसे शब्द शामिल होते हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक प्राथमिकताओं और बहुसंख्यकवादी एजेंडे को दर्शाता है। इससे आने वाले समय में घरेलू स्तर पर मानवाधिकार संगठनों का दबाव बढ़ सकता है और पाकिस्तान की छवि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और अधिक प्रभावित हो सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·26 दिन पहले

पाकिस्तानी राष्ट्रपति का यह बयान केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि देश की विधि-व्यवस्था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब राष्ट्रप्रमुख ही 'बर्दाश्त करने' जैसी भाषा का इस्तेमाल करें, तो यह स्पष्ट है कि संवैधानिक समानता और कानून के समक्ष अधिकार कागजों तक सीमित हैं। आगे चलकर यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघनों और धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों को और अधिक हवा दे सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·26 दिन पहले

पाकिस्तानी राष्ट्रपति के इस बयान और जनगणना के आंकड़ों के बीच का अंतर केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह वहां की नीतियों में अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर संघर्ष कर रहे देश में इस तरह के बयान निवेश के माहौल और अंतरराष्ट्रीय छवि को और अधिक प्रभावित कर सकते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·26 दिन पहले

पाकिस्तानी राष्ट्रपति का यह बयान केवल ऐतिहासिक विसंगतियों को ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चल रहे प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच के भारी अंतर को उजागर करता है। वर्ष 2023 की जनगणना के आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि अल्पसंख्यकों की जनसांख्यिकीय स्थिति सरकारी बयानों से मेल नहीं खाती। इस तरह के बयानों पर सार्वजनिक हस्तियों की तीखी प्रतिक्रियाएं यह बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों और पड़ोसी देशों की नीतियों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा लगातार बहस के केंद्र में बना रहेगा और क्षेत्रीय कूटनीति तथा सामाजिक संवाद पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

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