केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और हालिया उप-चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की पराजय के बाद से विपक्षी इंडी गठबंधन राजनीतिक रूप से खुद को मजबूत मान रहा था। हालांकि, संसद भवन के भीतर और बाहर बदलते समीकरणों ने विपक्षी खेमे में नई हलचल पैदा कर दी है। केंद्र सरकार देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने वाले दो अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद के पटल पर रखने की अंतिम तैयारी कर रही है। इनमें पहला परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) है और दूसरा विदेश निधि नियमन अधिनियम (FCRA) में व्यापक संशोधनों से जुड़ा विधेयक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस भावी विधायी एजेंडे का स्पष्ट संकेत विपक्षी नेताओं को दे दिया है, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में बयानों का दौर तेज हो गया है।
संसद का गतिरोध और विधायी रणनीति
विपक्ष जहां परिसीमन विधेयक की भावी रूपरेखा को लेकर आशंकित नजर आ रहा है, वहीं एफसीआरए विधेयक के प्रावधानों की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका तक सुनाई दे रही है। परिसीमन का मुद्दा पहले भी कई बार तकनीकी और राजनीतिक आंकड़ों के गणित में उलझता रहा है, लेकिन इस बार सरकार पूरी मजबूती से अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी ने इन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाने का खाका तैयार कर लिया है। हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई उच्चस्तरीय बैठकों और रणनीतिक संवाद से विपक्षी दलों को भी यह आभास हो गया है कि विधायी प्रक्रिया के इस मुकाबले में सरकार को रोकना आसान नहीं होगा।
दूसरी ओर, वर्तमान संसद सत्र के दौरान लोकसभा में विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है। विपक्षी सांसद रोजाना परिसर में पोस्टर लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं और गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बयानों के साथ-साथ श्री राम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी के मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं। लगातार हो रहे हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। हालांकि, इस गतिरोध के बीच उच्च सदन यानी राज्यसभा में कुछ महत्वपूर्ण विधायी कार्य संपन्न हुए हैं, जिनमें उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से संबंधित विधेयक को मंजूरी दी गई है। संसद परिसर में विपक्षी नेताओं द्वारा निकाले गए विरोध मार्च में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा भी प्रमुखता से शामिल हुए।
संसद भवन में किरण रिजिजू और राहुल गांधी की रणनीतिक मुलाकात
संसद में जारी इस गतिरोध को खत्म करने और सरकार के बड़े विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने विपक्ष के साथ सीधे संवाद की पहल की है। इसी कड़ी में संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने संसद भवन स्थित नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में जाकर राहुल गांधी से मुलाकात की। इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका वाड्रा भी मौजूद थीं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस बैठक में मुख्य रूप से परिसीमन विधेयक को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
बैठक में राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि परिसीमन के मुद्दे पर उनकी पार्टी और विपक्षी सहयोगियों का रुख पूर्ववत है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार विधेयक में कुछ आवश्यक बदलाव या नए संशोधन शामिल करके लाती है, तो विपक्षी दल उस पर नए सिरे से विचार और चर्चा करने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही राहुल गांधी ने मांग रखी कि सरकार संसद में अमित शाह के बयानों और राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विषय पर भी विस्तृत चर्चा कराने की अनुमति दे। संसदीय कार्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि वे विपक्ष के इन सुझावों और मांगों से प्रधानमंत्री और सरकार के शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराएंगे।
16 से 18 अगस्त के बीच विशेष सत्र की योजना और दो-तिहाई बहुमत की कवायद
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाने का दावा कर रहे विपक्षी खेमे के लिए यह वार्ता एक नए राजनीतिक घटनाक्रम की तरह सामने आई है। सरकार अपने तय एजेंडे पर मजबूती से आगे बढ़ रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण से जुड़े विधायी प्रावधानों को एक साथ या नए प्रारूप में संसद में प्रस्तुत करना चाहती है। इन संविधान संशोधनों को कानूनी रूप देने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
सरकार इसी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े को सुरक्षित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों से संपर्क साध रही है। वर्तमान संसद सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है। इसके तुरंत बाद, सरकार की योजना 16 अगस्त से 18 अगस्त के बीच संसद का एक विशेष सत्र आयोजित करने की है। संसदीय कार्यमंत्री ने इस विशेष सत्र का आधिकारिक प्रस्ताव कांग्रेस सहित अन्य प्रमुख विपक्षी दलों के सामने रख दिया है। कांग्रेस नेतृत्व ने इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वे अपनी पार्टी के भीतर और इंडी गठबंधन के अन्य घटक दलों से विचार-विमर्श करने के बाद ही अपना अंतिम निर्णय सरकार को बताएंगे।
37 एनडीए सांसदों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की नाश्ते पर बैठक
संख्या बल का मुकाबला जीतने के लिए मोदी सरकार किस स्तर पर तैयारी कर रही है, इसका एक नजारा खुद प्रधानमंत्री ने प्रस्तुत किया। संसद सत्र के दौरान नियमित रूप से सांसदों के अलग-अलग समूहों से मिलने की अपनी परंपरा के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुबह नाश्ते पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नए सांसदों के एक दल से मुलाकात की। इस बैठक में लगभग 37 सांसद शामिल हुए, जिनमें वे जन प्रतिनिधि भी विशेष रूप से उपस्थित थे जो हाल के महीनों में आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी या एनडीए के घटक दलों में शामिल हुए हैं।
नाश्ते पर आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े भी उपस्थित रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने नए सांसदों के साथ संसदीय कार्यप्रणाली, जनसंपर्क और राजनीतिक शुचिता पर विस्तार से संवाद किया।
नवनिर्वाचित सांसदों को प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए के सभी नए सांसदों को अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों में जनता के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने का परामर्श दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के युवाओं की बात को खुले मन से सुनना और उनकी समस्याओं को ध्यानपूर्वक समझना सबसे जरूरी है। जब हम युवाओं की आकांक्षाओं को गंभीरता से सुनेंगे, तभी उनकी समस्याओं का सही और स्थायी समाधान निकाला जा सकेगा। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने सांसदों को सार्वजनिक जीवन में सतर्कता बरतने की कड़ी नसीहत दी।
प्रधानमंत्री मोदी ने सांसदों को आगाह करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि बनने के बाद कई प्रकार के लोग उनसे मिलने और आतिथ्य स्वीकार करने आएंगे। ऐसे में प्रत्येक सांसद को अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है ताकि वे किसी गलत संगत या अनुचित विवाद में न फंसें। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से ताकीद की कि कोई भी सांसद अपना आधिकारिक लेटर पैड किसी अनधिकृत व्यक्ति के हाथ में न जाने दे, क्योंकि इसका दुरुपयोग हो सकता है। विपक्ष के हमलों का जवाब देने की रणनीति पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि विरोधी दल का कोई नेता गलत या भ्रामक बात कहता है, तो सांसदों को सीधे टकराव में उलझने के बजाय धैर्यपूर्वक उन्हें समझाने का प्रयास करना चाहिए। राजनीति में लोगों का दिल और विश्वास जीतना ही सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।
विदेश निधि नियमन कानून (FCRA) और वैश्विक प्रतिक्रिया
परिसीमन विधेयक के अलावा, जिस दूसरे विधायी कदम पर देश और विदेश में सबसे अधिक ध्यान केंद्रित हो रहा है, वह है Foreign Contribution (Regulation) Act अर्थात एफसीआरए कानून में संशोधनों की तैयारी। केंद्र सरकार गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और अन्य नागरिक संस्थाओं को विदेश से मिलने वाले वित्तीय अनुदान के नियमों को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाने जा रही है।
प्रस्तावित संशोधनों के तहत विदेश से आने वाली धनराशि के स्रोतों, उसके उपयोग और जवाबदेही की निगरानी के तंत्र को बेहद कड़ा किया जाएगा। इस विधायी पहल से न केवल भारत के भीतर राजनीतिक और सामाजिक हलचल बढ़ी है, बल्कि अमेरिका स्थित कई संगठनों और राजनयिक हलकों में भी गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सरकार का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शी व्यवस्था के लिए विदेशी फंडिंग पर सख्त नियंत्रण आवश्यक है, जबकि विपक्षी दल इसे नागरिक संगठनों की स्वायत्तता पर अंकुश के रूप में देख रहे हैं।



















