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परिसीमन मुद्दे पर तमिलनाडु विधानसभा में गरमाई बहस, टीवीके मंत्री ने उठाई दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनाने की मांगराजनीति
12 अग॰ 2026, 10:44 pm (2 दिन पहले)· 0

परिसीमन मुद्दे पर तमिलनाडु विधानसभा में गरमाई बहस, टीवीके मंत्री ने उठाई दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनाने की मांग

तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन के खिलाफ पेश प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने राष्ट्रीय राजनीति के शक्ति संतुलन पर सवाल उठाए और भविष्य में दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री चुने जाने की वकालत की।

तमिलनाडु की राजनीति में परिसीमन को लेकर छिड़ी बहस अब केवल संसदीय सीटों के पुनर्गठन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने राष्ट्रीय सत्ता के बुनियादी ढांचे पर एक व्यापक विमर्श को जन्म दे दिया है। राज्य विधानसभा में परिसीमन विरोधी प्रस्ताव पर हुई एक गहन चर्चा के दौरान सत्ताधारी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के वरिष्ठ नेता और लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने देश के राजनीतिक शक्ति संतुलन पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश का शीर्ष राजनीतिक पद यानी प्रधानमंत्री का पद किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र या उत्तरी राज्यों का एकाधिकार नहीं हो सकता। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आने वाले समय में दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु से भी देश का नेतृत्व करने वाला प्रधानमंत्री चुना जाना चाहिए।

जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और दक्षिणी राज्यों की चिंता

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा विधानसभा में पेश किए गए परिसीमन विरोधी प्रस्ताव पर सदन में लगभग दो घंटे तक विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान मंत्री आधव अर्जुन ने कहा कि केवल जनसंख्या के आंकड़ों को आधार बनाकर संसदीय प्रतिनिधित्व तय करने का प्रयास दक्षिणी राज्यों के प्रशासनिक और सामाजिक हितों के प्रतिकूल साबित हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि जिन राज्यों ने बीते दशकों में राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप जनसंख्या नियंत्रण, सुदृढ़ आर्थिक नीतियों और सामाजिक विकास के संकेतकों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, उन्हें इस बात की राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी चाहिए। यदि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें दी जाती हैं, तो विकास और नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर काम करने वाले राज्यों का संसदीय प्रभाव कम हो जाएगा।

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उत्तरी राज्यों के राजनीतिक प्रभुत्व पर सवाल

अपने वक्तव्य में आधव अर्जुन ने वर्तमान चुनावी गणित और सत्ता के समीकरणों का विश्लेषण करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में केवल पांच या छह उत्तरी राज्य आपस में एकजुट होकर देश का प्रधानमंत्री तय कर सकते हैं। उन्होंने इस व्यवस्था को असमान बताते हुए इसमें तात्कालिक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि देश की बागडोर और राजनीतिक सत्ता केवल उत्तर प्रदेश, बिहार या गुजरात जैसे राज्यों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिस तरह तमिलनाडु की विधानसभा में राज्य के जनहित और प्राथमिकताओं की आवाज गूंजती है, ठीक उसी तरह संसद के सर्वोच्च पद पर बैठकर भी दक्षिण की प्राथमिकताओं को दिशा दी जानी चाहिए।

आर्थिक योगदान और केंद्रीय नीतियों से उपजी चुनौतियां

तमिलनाडु के आर्थिक प्रदर्शन को रेखांकित करते हुए टीवीके नेता ने कहा कि राज्य देश के अग्रणी औद्योगिक और आर्थिक केंद्रों में शामिल है। इसके बावजूद संसद द्वारा पारित किए जाने वाले कई कानूनों को लेकर राज्य की विशिष्ट प्रशासनिक और सामाजिक चिंताएं अनसुनी रह जाती हैं। उन्होंने NEET, GST और CAA जैसे महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख करते हुए बताया कि तमिलनाडु के सांसदों ने इन राष्ट्रीय नीतियों पर राज्य की आपत्तियों और चिंताओं को लगातार संसद के पटल पर उठाया है। इसके बावजूद केंद्र स्तर पर ऐसे फैसले लिए गए जिन्हें राज्य सरकार और स्थानीय राजनीतिक दल तमिलनाडु के हितों के विपरीत मानते हैं। यदि जनसंख्या के अनुपात में सीटों में कटौती होती है, तो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण को प्रभावित करने की राज्य की क्षमता और भी कमजोर हो जाएगी, जो संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार और संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों के खिलाफ है।

द्रविड़ आंदोलन का इतिहास और अमेरिकी गृहयुद्ध का संदर्भ

सदन को संबोधित करते हुए आधव अर्जुन ने द्रविड़ आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी स्मरण कराया। उन्होंने पेरियार ईवी रामासामी और सीएन अन्नादुरई के विचारों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति राज्यों की स्वायत्तता और उनके सर्वांगीण विकास में निहित है। सीएन अन्नादुरई के सिद्धांतों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राज्यों की प्रगति को दरकिनार करके एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है। परिसीमन का मुद्दा महज सीटों की संख्या का गणित नहीं है, बल्कि यह राज्यों की राजनीतिक संप्रभुता का सवाल है।

इसके साथ ही उन्होंने अब्राहम लिंकन के दौर में हुए अमेरिकी गृहयुद्ध का संदर्भ देते हुए चेतावनी दी कि उत्तर और दक्षिण के बीच बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक असंतुलन के दुष्परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संदर्भ भारत की संवैधानिक सीमाओं के भीतर क्षेत्रीय समानता को समझाने के लिए है, ताकि देश के सभी हिस्सों को विकास और प्रतिनिधित्व का समान अधिकार मिल सके।

सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित और प्रमुख मांगें

राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक एकजुटता का उल्लेख करते हुए आधव अर्जुन ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक दल की नहीं है। अतीत में डीएमके के सीएन अन्नादुरई और एम. करुणानिधि से लेकर एआईएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन और पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता तक सभी प्रमुख नेताओं ने राज्य की स्वायत्तता और संघीय ढांचे के लिए आवाज उठाई है। टीवीके भी इसी राजनीतिक विरासत का अनुसरण कर रही है।

लंबी बहस के पश्चात विधानसभा ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया। इस प्रस्ताव के जरिए केंद्र सरकार से मांग की गई है कि लोकसभा की कुल सीट संख्या को 543 पर स्थायी रूप से रोक दिया जाए। इसके अलावा, प्रस्ताव में वर्ष 2029 के लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को पूर्ण रूप से लागू करने का भी आग्रह किया गया है।

सवाल-जवाब

तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन पर क्या प्रस्ताव पारित हुआ?
विधानसभा ने लोकसभा सीटों को स्थायी रूप से 543 पर तय रखने और 2029 के चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग का प्रस्ताव पारित किया।
मंत्री आधव अर्जुन ने प्रधानमंत्री पद को लेकर क्या मांग उठाई?
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का पद केवल कुछ उत्तरी राज्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए और भविष्य में दक्षिण भारत तथा तमिलनाडु से भी पीएम चुना जाना चाहिए।
परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता क्या है?
चिंता यह है कि जनसंख्या नियंत्रण और विकास में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद अधिक आबादी वाले राज्यों की तुलना में संसदीय सीटें घटने से राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है।
टीवीके नेता ने भाषण के दौरान किन ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया?
उन्होंने द्रविड़ आंदोलन के नेताओं पेरियार और अन्नादुरई के सिद्धांतों के साथ-साथ अब्राहम लिंकन के समय हुए अमेरिकी गृहयुद्ध का संदर्भ दिया।
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