लोकसभा में परिसीमन का मुद्दा गरमाने के बीच द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने साफ कर दिया है कि पार्टी महिला आरक्षण कानून के पक्ष में तो है, मगर मौजूदा 543 सीटों के ढांचे में ही किसी भी बदलाव के सख्त खिलाफ है. रविवार को डीएमके सांसद तिरुचि शिवा ने कहा कि सीमाओं की नए सिरे से गिनती दक्षिण भारत के राज्यों को किसी भी सूरत में नुकसान नहीं पहुंचानी चाहिए.
महिला आरक्षण पर पार्टी की स्थिति साफ
तिरुचि शिवा के मुताबिक, डीएमके महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में अधिक भागीदारी देने के पक्ष में हमेशा से रही है, लेकिन पार्टी की शर्त यह है कि यह हिस्सेदारी मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही तय हो, न कि सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर या घटाकर. वजह यह है कि सीटों में किसी भी फेरबदल का सीधा असर राज्यों के बीच राजनीतिक ताकत के मौजूदा संतुलन पर पड़ेगा.
जनसंख्या नियंत्रण में आगे, फिर भी नुकसान की आशंका
तिरुचि शिवा ने चिंता जताई कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया, उन्हें ही परिसीमन की किसी नई प्रक्रिया में कम सीटें मिलने का खतरा है. उनका कहना था कि केंद्र सरकार ने अब तक इस पूरी कवायद को लेकर कोई साफ और पारदर्शी खाका जनता के सामने नहीं रखा, जिससे राज्यों के बीच अनिश्चितता बनी हुई है.
25 साल तक सीटों में बदलाव न करने की मांग
डीएमके सांसद ने सुझाव दिया कि अगर परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी घटने का खतरा दिखे, तो बेहतर यही होगा कि लोकसभा की 543 सीटों की मौजूदा संख्या को अगले 25 साल तक जस का तस रखा जाए. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वह परिसीमन को लेकर अपनी नीयत और नीति दोनों जल्द से जल्द सार्वजनिक करे. साथ ही, देश के संघीय ढांचे और हर राज्य के हितों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को इस संवेदनशील मसले पर टालमटोल की बजाय ठोस रुख अपनाना चाहिए.
दक्षिणी राज्यों की पुरानी आशंका फिर सामने आई
तिरुचि शिवा की यह टिप्पणी उस बहस को फिर हवा देती है, जो दक्षिण भारत में काफी समय से चल रही है. वहां के कई नेता लगातार यह आशंका जताते रहे हैं कि आने वाले वर्षों में परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने पर संसद में उनके राज्यों की आवाज और सीटों की तादाद, दोनों घट सकती हैं.




















