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राहुल गांधी का यूपीआई शुल्क पर विरोध, लेकिन कांग्रेस सांसदों की समिति रिपोर्ट में एमडीआर का समर्थनराजनीति
16 सित॰ 2026, 10:36 pm (40 दिन पहले)· 0

राहुल गांधी का यूपीआई शुल्क पर विरोध, लेकिन कांग्रेस सांसदों की समिति रिपोर्ट में एमडीआर का समर्थन

यूपीआई पर संभावित शुल्क को लेकर राहुल गांधी का विरोध सामने आया है, जबकि संसद की एक समिति की रिपोर्ट में कांग्रेस सांसदों की मौजूदगी में एमडीआर लागू करने की सिफारिश की गई है।

नई दिल्ली में यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर को लेकर राजनीतिक खींचतान बढ़ गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म पर किसी भी प्रकार का शुल्क थोपे जाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं। दूसरी ओर, संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति की एक नई रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद सियासी गलियारों में बहस छिड़ गई है। इस दस्तावेज में डिजिटल भुगतान प्रणाली के वास्ते चरणबद्ध तरीके से एमडीआर ढांचे को अमल में लाने की जोरदार पैरवी की गई है। दिलचस्प बात यह है कि जब 12 अगस्त 2026 को इस समिति ने उक्त रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगाई थी, तब उस बैठक में पी. चिदंबरम और मनीष तिवारी सहित कांग्रेस पार्टी के पांच वरिष्ठ सांसद भी उपस्थित थे। अब यह बड़ा सवाल बन गया है कि जिस वित्तीय ढांचे पर पार्टी के सांसदों ने अपनी सहमति दी थी, उसी का शीर्ष स्तर पर विरोध क्यों हो रहा है।

संसदीय समिति की बैठक में कांग्रेस सांसदों की भूमिका

संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के दायरे में कांग्रेस के पांच सांसद सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। इस समूह में देश के पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के साथ-साथ गौरव गोगोई, मनीष तिवारी, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ के नाम शामिल हैं। इस आधिकारिक रिपोर्ट को 12 अगस्त 2026 के दिन बिना किसी असहमति नोट के पूरी तरह से सर्वसम्मति के साथ स्वीकार कर लिया गया था। प्रकाशित हुए मिनट्स के दस्तावेजों में किसी भी सदस्य द्वारा आपत्ति जताने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। ऐसे हालात में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उस प्रस्ताव को हरी झंडी दे रहे थे, तब इस नीतिगत मामले पर आंतरिक स्तर पर क्या विचार-विमर्श हुआ होगा।

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डिजिटल भुगतान प्रणाली को चलाने में आने वाला भारी घाटा

कमेटी के दस्तावेजों के मुताबिक यूपीआई नेटवर्क को सुरक्षित रखने का खर्च और मिलने वाली सरकारी वित्तीय सहायता के बीच बहुत बड़ा फासला बना हुआ है। सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 2,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का प्रावधान तय किया है। इसके विपरीत, पूरे डिजिटल पेमेंट उद्योग का अनुमानित परिचालन खर्च बढ़कर लगभग 20,700 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। समिति ने स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि सरकारी इमदाद इस कुल ऑपरेटिंग लागत का केवल 11 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा कर पाती है। यदि इसके लिए कोई टिकाऊ और मजबूत राजस्व मॉडल तैयार नहीं किया गया, तो साइबर सुरक्षा और वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के वास्ते किए जाने वाले अनिवार्य निवेश पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

नेतृत्व के रुख और संसदीय रिपोर्ट के बीच विरोधाभास

संसदीय समिति ने भारी भरकम भुगतानों पर चरणों के हिसाब से एमडीआर शुल्क लगाने की सिफारिश की है ताकि छोटे दुकानदारों और आम उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। इसके विपरीत, राहुल गांधी का स्पष्ट आरोप है कि सरकार आम नागरिकों पर वित्तीय बोझ बढ़ाने की तैयारी में है। विश्लेषकों का मानना है कि समिति की किसी बैठक में भाग लेने का मतलब हर प्रशासनिक दर पर व्यक्तिगत मुहर लगाना नहीं होता है। इसके बावजूद, इस स्पष्ट विरोधाभास ने राजनीतिक विरोधियों को कांग्रेस के खिलाफ हमलावर होने का पूरा मौका दे दिया है।

सवाल-जवाब

यूपीआई पर एमडीआर चार्ज को लेकर विवाद क्यों चल रहा है?
राहुल गांधी यूपीआई पर किसी भी प्रकार का शुल्क लगाने का विरोध कर रहे हैं, जबकि संसदीय समिति ने इसे लागू करने की सिफारिश की है।
संसदीय समिति की बैठक में कांग्रेस के कौन से सांसद शामिल थे?
इस बैठक में पी. चिदंबरम, गौरव गोगोई, मनीष तिवारी, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ मौजूद थे।
समिति की रिपोर्ट को कब स्वीकार किया गया था?
इस रिपोर्ट को 12 अगस्त 2026 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था।
डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री का अनुमानित ऑपरेटिंग खर्च कितना है?
डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री का अनुमानित परिचालन खर्च लगभग 20,700 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·40 दिन पहले

फैशन और लाइफस्टाइल उद्योग भी आज पूरी तरह से डिजिटल भुगतान पर निर्भर है। यदि एमडीआर लागू होने से मर्चेंट लागत बढ़ती है, तो प्रीमियम ब्रांड्स और बुटीक स्टोर्स से लेकर ऑनलाइन सौंदर्य उत्पादों की खरीद तक, हर स्तर पर इसका वित्तीय प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि राजनीतिक मोर्चे पर विरोधाभास चिंताजनक है, लेकिन डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत रखने के लिए वित्तीय स्थिरता पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·40 दिन पहले

डिजिटल भुगतान पारितंत्र में 20,700 करोड़ रुपये के परिचालन खर्च के मुकाबले महज 11% सरकारी सब्सिडी वित्तीय स्थिरता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। संसदीय समिति का चरणबद्ध एमडीआर (MDR) का प्रस्ताव साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के निवेश को टिकाऊ बनाने की आर्थिक आवश्यकता को दर्शाता है। शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के विरोध और नीतिगत विशेषज्ञों की सहमति के बीच यह अंतर दिखाता है कि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के वित्तीय मॉडल और जन-लुभावन राजनीति में तालमेल बैठाना कितना चुनौतीपूर्ण है। यदि राजस्व मॉडल स्पष्ट नहीं हुआ, तो भुगतान नेटवर्क की सुरक्षा जोखिम में पड़ सकती है।

Divya Reddy@divya-reddy·40 दिन पहले

डिजिटल भुगतान ढांचा अब केवल व्यापारिक लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर के छात्रों, विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के दैनिक कामकाज व शुल्क भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। यदि परिचालन खर्च और सरकारी मदद के भारी अंतर के कारण साइबर सुरक्षा से समझौता होता है, तो इसका सीधा जोखिम उन लाखों युवाओं पर पड़ेगा जो हर दिन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर हैं। नीतिगत स्तर पर राजनीतिक विरोधाभास के बजाय वित्तीय व तकनीकी मजबूती को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि छात्रवृत्ति वितरण से लेकर ऑनलाइन भुगतान तक पूरा शैक्षणिक पारितंत्र सुरक्षित बना रहे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·40 दिन पहले

यह घटना नीतिगत मामलों पर दलगत समन्वय और आंतरिक संवाद की गंभीर कमी को उजागर करती है। एक तरफ सार्वजनिक सुरक्षा और वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के लिए मजबूत राजस्व मॉडल की आवश्यकता है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक नेतृत्व का विरोध इस पूरी व्यवस्था के वित्तीय संतुलन को और अधिक जटिल बना सकता है। यदि डिजिटल भुगतान के परिचालन खर्च और सब्सिडी के बीच का यह भारी अंतराल पाटा नहीं गया, तो आने वाले समय में साइबर सुरक्षा ढांचे पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है, जिससे सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा प्रभावित होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·40 दिन पहले

यह स्पष्ट विरोधाभास उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में चुनाव और जनसभाओं के दौरान विपक्ष की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। ज़मीनी स्तर पर छोटे व्यापारी पहले से ही डिजिटल लेन-देन के तकनीकी पहलुओं और सुरक्षा जोखिमों को लेकर असमंजस में हैं। यदि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और नीति निर्माताओं के बीच ऐसा तालमेलहीन रुख जारी रहा, तो इसका सीधा असर स्थानीय स्तर पर जनता के बीच संगठन के आर्थिक एजेंडे की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।

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