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साल 2029 तक देश में हो सकते हैं एक साथ चुनाव, पीपी चौधरी ने बताई पूरी कार्ययोजनाराजनीति
24 अग॰ 2026, 10:59 pm (63 दिन पहले)· 2

साल 2029 तक देश में हो सकते हैं एक साथ चुनाव, पीपी चौधरी ने बताई पूरी कार्ययोजना

संसद की संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने संकेत दिए हैं कि संविधान संशोधन और राज्यों के सहयोग से 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं।

देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की दिशा में प्रक्रिया तेज होती नजर आ रही है। यदि देश के संविधान में आवश्यक संशोधन कर लिए जाएं और राज्य सरकारें इसके समर्थन में कदम बढ़ाएं, तो वर्ष 2029 तक केंद्र और राज्यों के चुनाव एक ही समय पर संपन्न कराए जा सकते हैं। संसद की 31-सदस्यीय संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने इस पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट करते हुए यह जानकारी दी है। राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले भाजपा सांसद पीपी चौधरी के मुताबिक, अगर वर्ष 2028 तक संसद के भीतर इस बदलाव से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को आधिकारिक रूप से मंजूरी मिल जाती है, तो इसे अमलीजामा पहनाने का रास्ता साफ हो जाएगा।

राज्यों की सहमति और विधानसभाओं की स्थिति

प्रक्रिया के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत राज्यों के पास एक साथ चुनाव में शामिल होने का अधिकार निहित है। हालांकि, केंद्र सरकार के पास इस बात की कोई शक्ति नहीं है कि वह किसी भी राज्य पर अपनी विधानसभा को समय से पहले भंग करने का अनुचित दबाव बना सके। यह पूरा निर्णय पूरी तरह से संबंधित राज्यों की मंत्रिपरिषद और वहां के मुख्यमंत्रियों के विवेक और फैसले पर निर्भर करता है। इसलिए राज्यों की सहभागिता इस पूरी व्यवस्था की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।

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जनता का भारी समर्थन और प्रशासनिक सुधार

समिति के अध्यक्ष ने देश के कुल 10 अलग-अलग राज्यों का दौरा किया है, जहां उन्होंने आम नागरिकों और नागरिक समाज के विभिन्न सदस्यों के साथ सीधी बातचीत की। इस दौरान सामने आए अनुभवों के आधार पर उन्होंने दावा किया कि लगभग 99 प्रतिशत जनता लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने के पक्ष में खड़ी है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थों के मुकाबले आम जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है। बार-बार चुनाव आयोजित होने से देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ने वाले असर का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इससे सरकारी स्कूलों और शिक्षकों का कीमती समय बर्बाद होता है, जिसमें से करीब 30 प्रतिशत समय केवल चुनाव संबंधी ड्यूटियों और कार्यों में ही निकल जाता है, जिसे इस व्यवस्था के लागू होने से बचाया जा सकेगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशें

यह पूरा खाका पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति की संस्तुतियों पर पूरी तरह आधारित है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल रहे थे। उस समिति ने अपने सुझावों में देश भर में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की वकालत की थी। यदि भारतीय चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो देश में आजादी के तुरंत बाद यानी 1951-52, इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के दशकों में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही संपन्न होते आए थे। हालांकि, साल 1968 और 1969 के दौरान देश के कुछ राज्यों में विधानसभाओं के समय से पहले भंग हो जाने तथा वर्ष 1970 में चौथी लोकसभा के अचानक भंग होने के बाद यह निरंतरता टूट गई थी और चुनाव का यह पुराना चक्र बिखर गया था।

सवाल-जवाब

2029 में ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू करने की मुख्य शर्त क्या है?
इसके लिए 2028 तक संसद में संबंधित संविधान संशोधन विधेयकों का पारित होना और राज्य सरकारों की सहमति मिलना अनिवार्य है।
इस मुद्दे पर गठित संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष कौन हैं?
इस 31-सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति की अध्यक्षता राजस्थान से भाजपा सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं।
क्या केंद्र सरकार राज्यों को विधानसभा भंग करने का आदेश दे सकती है?
नहीं, पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया है कि राज्यों को विधानसभा भंग करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता और यह फैसला राज्यों की मंत्रिपरिषद पर निर्भर करता है।
भारत में आखिरी बार लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कब हुए थे?
आज़ादी के बाद 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में चुनाव एक साथ हुए थे, लेकिन 1968-69 में विधानसभाएं भंग होने से यह क्रम टूट गया था।
‘एक देश, एक चुनाव’ का खाका किस समिति की सिफारिशों पर तैयार किया गया है?
यह पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Aisha Khan@aisha-khan·62 दिन पहले

मनोरंजन और मीडिया इंडस्ट्री के दृष्टिकोण से देखें तो एक साथ चुनाव होने का असर हमारे कामकाज पर भी सीधा पड़ेगा। बार-बार चुनावी आचार संहिता लागू होने से सरकारी विज्ञापनों के बजट, प्रचार अभियानों और सार्वजनिक जागरूकता कार्यक्रमों के प्रसारण पर ब्रेक लग जाता है। यदि 2029 तक यह व्यवस्था लागू होती है, तो मीडिया और मनोरंजन जगत को राजनीतिक विज्ञापनों की अनिश्चितता से राहत मिलेगी और सूचना तथा मनोरंजन का प्रवाह अधिक सुचारू हो सकेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·62 दिन पहले

वर्ष 2029 तक एक साथ चुनाव कराने की यह कार्ययोजना न केवल प्रशासनिक और शैक्षणिक संसाधनों की बचत करेगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार पर भी इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। बार-बार चुनावी खर्च और नीतिगत ठहराव से बचने पर कॉर्पोरेट निवेश को बढ़ावा मिलेगा और वृहद आर्थिक स्थिरता मजबूत होगी। हालांकि, इसके लिए राज्यों की राजनीतिक सहमति और 2028 तक विधाई प्रक्रिया को पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·62 दिन पहले

वैदिक गणित और खगोलीय कालगणना के दृष्टिकोण से, समय चक्र की एकरूपता राष्ट्र के वृहद प्रबंधन को सुदृढ़ करती है। बार-बार के चुनावी अनुष्ठानों से बाधित होने वाली प्रशासनिक और शैक्षिक ऊर्जा का एकीकरण देश की आर्थिक रीढ़ को स्थिर करेगा। यदि वर्ष 2028 तक विधाई और संवैधानिक चक्र पूर्ण हो जाते हैं, तो वर्ष 2029 का महा-संयोग भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नए कालचक्र का सूत्रपात करेगा, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति और राज्यों का समन्वय इस खगोलीय गति से तालमेल बिठा सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·63 दिन पहले

संवैधानिक संशोधन और राज्यों की रजामंदी से वर्ष 2029 तक एक साथ चुनाव कराना एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव होगा। इस व्यवस्था के लागू होने से बार-बार लगने वाली आचार संहिता और चुनाव ड्यूटी के कारण शिक्षा व प्रशासन पर पड़ने वाला भारी दबाव कम होगा। हालांकि, केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का संतुलन तथा समय से पहले विधानसभा भंग होने की स्थिति में कानूनी पेचीदगियों को सुलझाना इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·63 दिन पहले

उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और विधानसभाओं के कार्यकाल का समन्वय इस सुधार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यदि कोई राज्य सरकार समय से पहले गिरती है, तो चुनाव आयोग को संविधान के दायरे में उस अनिश्चितता से निपटने के लिए बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक कानूनी प्रावधान करने होंगे, अन्यथा यह महत्वाकांक्षी योजना प्रशासनिक उलझन बनकर रह जाएगी।

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