देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की दिशा में प्रक्रिया तेज होती नजर आ रही है। यदि देश के संविधान में आवश्यक संशोधन कर लिए जाएं और राज्य सरकारें इसके समर्थन में कदम बढ़ाएं, तो वर्ष 2029 तक केंद्र और राज्यों के चुनाव एक ही समय पर संपन्न कराए जा सकते हैं। संसद की 31-सदस्यीय संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने इस पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट करते हुए यह जानकारी दी है। राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले भाजपा सांसद पीपी चौधरी के मुताबिक, अगर वर्ष 2028 तक संसद के भीतर इस बदलाव से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को आधिकारिक रूप से मंजूरी मिल जाती है, तो इसे अमलीजामा पहनाने का रास्ता साफ हो जाएगा।
राज्यों की सहमति और विधानसभाओं की स्थिति
प्रक्रिया के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत राज्यों के पास एक साथ चुनाव में शामिल होने का अधिकार निहित है। हालांकि, केंद्र सरकार के पास इस बात की कोई शक्ति नहीं है कि वह किसी भी राज्य पर अपनी विधानसभा को समय से पहले भंग करने का अनुचित दबाव बना सके। यह पूरा निर्णय पूरी तरह से संबंधित राज्यों की मंत्रिपरिषद और वहां के मुख्यमंत्रियों के विवेक और फैसले पर निर्भर करता है। इसलिए राज्यों की सहभागिता इस पूरी व्यवस्था की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।
जनता का भारी समर्थन और प्रशासनिक सुधार
समिति के अध्यक्ष ने देश के कुल 10 अलग-अलग राज्यों का दौरा किया है, जहां उन्होंने आम नागरिकों और नागरिक समाज के विभिन्न सदस्यों के साथ सीधी बातचीत की। इस दौरान सामने आए अनुभवों के आधार पर उन्होंने दावा किया कि लगभग 99 प्रतिशत जनता लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने के पक्ष में खड़ी है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थों के मुकाबले आम जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है। बार-बार चुनाव आयोजित होने से देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ने वाले असर का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इससे सरकारी स्कूलों और शिक्षकों का कीमती समय बर्बाद होता है, जिसमें से करीब 30 प्रतिशत समय केवल चुनाव संबंधी ड्यूटियों और कार्यों में ही निकल जाता है, जिसे इस व्यवस्था के लागू होने से बचाया जा सकेगा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशें
यह पूरा खाका पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति की संस्तुतियों पर पूरी तरह आधारित है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल रहे थे। उस समिति ने अपने सुझावों में देश भर में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की वकालत की थी। यदि भारतीय चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो देश में आजादी के तुरंत बाद यानी 1951-52, इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के दशकों में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही संपन्न होते आए थे। हालांकि, साल 1968 और 1969 के दौरान देश के कुछ राज्यों में विधानसभाओं के समय से पहले भंग हो जाने तथा वर्ष 1970 में चौथी लोकसभा के अचानक भंग होने के बाद यह निरंतरता टूट गई थी और चुनाव का यह पुराना चक्र बिखर गया था।





















