रक्षाबंधन का पर्व केवल कलाई पर रेशमी धागों की डोर बांधने और भाई की लंबी उम्र की दुआ मांगने तक सीमित नहीं होता है। कई बार भाई-बहन का अटूट रिश्ता जीवन के ऐसे मोड़ पर ढाल बनकर खड़ा हो जाता है, जहां एक छोटी-सी सलाह इंसान की पूरी दुनिया बदल देती है। हरियाणा के अंबाला शहर में हीरा नगर के रहने वाले मनोज की कहानी कुछ ऐसी ही अनूठी प्रेरणा देती है। कॉरपोरेट सेक्टर की बड़ी कंपनियों में नौकरी करने वाले मनोज के सीने में लंबे समय से खुद का वेंचर शुरू करने की सुलगती आग थी, लेकिन इस सपने को जमीन पर उतारने का सही नुस्खा उन्हें अपनी मुंहबोली बहन से मिला। बहन ने उन्हें दूसरों के लिए दफ्तरों में पसीना बहाने के बजाय खुद का टिफिन या खान-पान का काम शुरू करने की सलाह दी, जो आज उनकी एक अलग पहचान बन चुकी है।
संघर्षों से भरा बचपन और उच्च शिक्षा का सफर
मनोज का शुरुआती जीवन तमाम आर्थिक तंगियों और संघर्षों के साए में बीता। उनके पिता ने घर का चूल्हा जलाने के लिए रिक्शा खींचने का कठिन काम किया। तमाम मुश्किलों के बावजूद मनोज ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक अलग-अलग निजी कंपनियों में अपनी सेवाएं दीं। वह माइक्रोसॉफ्ट, नोकिया और डैश मोबाइल जैसी नामचीन कंपनियों में काम कर चुके थे। कॉरपोरेट नौकरी के दौरान उन्हें हर महीने करीब 32 से 35 हजार रुपये का वेतन मिलता था, जो इंसेंटिव जुड़ने के बाद लगभग 40 हजार रुपये तक पहुंच जाता था। एक स्थिर और अच्छी आय वाली नौकरी होने के बावजूद मनोज के मन में हमेशा से अपना खुद का काम करने की लालसा बनी रही और यहीं से उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ आया।
बहन की एक सलाह और बाइक वाली चलती-फिरती रसोई
नौकरी के दौरान जब उन्होंने अपनी मुंहबोली बहन के सामने अपनी इच्छा रखी, तो उन्होंने घर का बना शुद्ध, पौष्टिक और स्वादिष्ट खाना बेचने का नायाब सुझाव दिया। यह विचार मनोज को पूरी तरह भा गया और उन्होंने इस पर अमल करने का पक्का इरादा कर लिया। शुरुआत में उन्होंने साइकिल पर खान-पान का सामान बेचने का विचार किया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपने इस आइडिया को और बेहतर बनाया। उन्होंने शाहाबाद के एक स्थानीय कारीगर से संपर्क किया और करीब 15 हजार रुपये खर्च करके अपनी ही मोटरसाइकिल को मॉडिफाई करवा लिया। इस बाइक पर ऐसा शानदार सेटअप तैयार किया गया कि वह एक छोटी-सी चलती-फिरती रसोई में तब्दील हो गई, जिस पर ग्राहकों को गरमा-गरम खाना परोसा जा सके।
अंबाला की सड़कों पर घूमती अनोखी फूड बाइक
आज यही खास मोटरसाइकिल अंबाला की तंग गलियों, व्यस्त बाजारों, सरकारी और निजी दफ्तरों के बाहर तथा विभिन्न कॉलोनियों में मनोज की खास पहचान बन चुकी है। वह हर रोज तय समय पर अलग-अलग जगहों पर पहुंचते हैं और कामगारों तथा आम लोगों को घर जैसा ताजा खाना उपलब्ध कराते हैं। उनके डेली मेन्यू में शाही पनीर, कढ़ाई पनीर, कढ़ी-चावल, राजमा-चावल, दाल, छोले और ताजी रोटी-सब्जी जैसे लजीज व्यंजन शामिल रहते हैं। आम आदमी की जेब का पूरा ख्याल रखते हुए उन्होंने खाने के दाम बेहद किफायती रखे हैं। उनके यहां भोजन की शुरुआत मात्र 30 रुपये से हो जाती है, जिसमें चावल-छोले या दाल-राजमा का दोना मिलता है, जबकि पेट भरकर खाने के लिए फुल प्लेट की कीमत करीब 50 रुपये है और पनीर की विशेष थाली मात्र 90 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है।
जीवनसंगिनी का साथ और कारोबार का बढ़ता दायरा
इस संघर्ष भरे सफर में मनोज अकेले नहीं हैं, बल्कि उनकी पत्नी हर कदम पर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। पति-पत्नी दोनों सुबह होते ही खाना पकाने की तैयारियों में जुट जाते हैं। शुरुआती दौर में जब उन्होंने काम शुरू किया था, तब बमुश्किल 10 रोटियां बनती थीं, लेकिन आज उनकी मेहनत रंग लाई है और रोजाना करीब 200 रोटियां तैयार होती हैं तथा लगभग 100 प्लेट खाना आसानी से बिक जाता है। बाइक पर स्टॉल चलाने के अलावा वह स्थानीय कंपनियों और दफ्तरों में टिफिन सेवा भी देते हैं। इसके साथ ही वह चायपत्ती की डीलरशिप लेकर अतिरिक्त आय का जरिया भी चला रहे हैं, जिससे उनकी आजीविका और अधिक मजबूत हुई है।
समाज की परवाह किए बिना अपने सपने को दी उड़ान
लोकल 18 से बातचीत में मनोज साझा करते हैं कि जब उन्होंने नौकरी छोड़कर सड़क पर बाइक से खाना बेचना शुरू किया, तो शुरुआत में कई लोगों ने उनका जमकर मजाक उड़ाया। कुछ पुराने दोस्तों ने भी उनसे दूरी बना ली और मुंह फेर लिया, लेकिन उन्होंने किसी की नकारात्मक बातों की परवाह नहीं की। उन्होंने अपनी मुंहबोली बहन की अमूल्य सलाह और अपने खुद के सपनों पर अटूट भरोसा बनाए रखा। आज वही जोखिम भरा फैसला उनकी सफलता और पहचान की नींव बन गया है। मनोज गर्व से बताते हैं कि वह ग्राहकों की पसंद का ध्यान रखते हुए रोजाना मेन्यू में बदलाव करते हैं और शाही पनीर से लेकर कढ़ी-चावल, राजमा-चावल और ताजी रोटी-सब्जी परोसते हैं। वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर अंगीठी पर खाना तैयार करते हैं। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर मनोज की यह प्रेरणादायक दास्तान भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के एक नए और अनूठे पहलू को उजागर करती है, जहां बहन ने भाई की कलाई पर सिर्फ रक्षा का सूत्र नहीं बांधा, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बनने का पक्का रास्ता भी दिखाया।



















