नगर परिषद चुनाव के मुहाने पर खड़े सिरोही में एक बार फिर राम मंदिर की जमीन का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह गरमा गया है। रामझरूखा और महामंदिर की संपत्तियों के स्वामित्व और प्रबंधन को लेकर विभिन्न पक्षों के बीच जुबानी जंग तेज हो चुकी है। इस गर्माते माहौल के बीच हिंदू वेव के संयोजक हरीश दवे ने खुलकर सामने आकर इस पूरे प्रकरण पर अपनी बात रखी है। उनका मानना है कि रामझरूखा से जुड़ा मूल विवाद अब सुलझ चुका है, लेकिन चुनाव के इस दौर में हो रही राजनीतिक बयानबाजी के कारण मंदिर की पवित्र संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचने का खतरा लगातार मंडरा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह चेतावनी दी है कि इस संवेदनशील मामले को केवल चुनावी लाभ के लिए राजनीतिक अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर मंदिर की बहुमूल्य संपत्ति और उसके गौरवशाली इतिहास से जुड़ा हुआ विषय है।
ढाई दशक पुराना संघर्ष और प्रशासनिक दस्तावेज
हरीश दवे ने अपने ऊपर और अपने संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए दावा किया कि वह पिछले करीब पच्चीस साल से रामझरूखा और मंदिर से जुड़ी संपत्तियों के संरक्षण के लिए लगातार आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने अपनी पुरानी भूमिका को याद करते हुए बताया कि वह स्वर्गीय महंत जयराम दास के साथ प्रबंधक के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके अनुसार, साल 2001 में रामझरूखा परिसर के चारों ओर सुरक्षा दीवार यानी चारदीवारी के निर्माण के लिए नगर परिषद के समक्ष औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया गया था। उनका दावा है कि उस पुराने आवेदन से जुड़ी सारी पत्रावली और दस्तावेज आज भी प्रशासनिक रिकॉर्ड में सुरक्षित मौजूद हैं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी याद दिलाया कि साल 2002 में महंत किशन दास की ओर से चलाए गए आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही थी, जो इस संपत्ति की सुरक्षा के उनके लंबे प्रयासों को दर्शाता है।
आमरण अनशन, समझौता और सरकारी कार्रवाई
अपने संघर्ष के हालिया अध्यायों का जिक्र करते हुए हरीश दवे ने बताया कि कुछ महीने पहले ही वह इसी जमीन और संपत्ति के मुद्दे को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गए थे। उनके इस कदम के बाद राज्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी जिलाध्यक्ष की मध्यस्थता में प्रशासन के साथ एक अहम बैठक हुई, जिसमें उपजिलाधिकारी यानी SDM के साथ बातचीत के बाद समझौता संपन्न हुआ। उनके अनुसार, इस समझौते और प्रशासनिक दखल के बाद सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबित कर दिया और पूरे मामले की औपचारिक जांच बिठा दी। दवे ने यह भी जानकारी दी कि जिला कलेक्टर ने भी उन्हें इस मामले में निष्पक्ष जांच का पूरा भरोसा दिलाया है। हालांकि, इन सब के बावजूद राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और नगर परिषद चुनाव से ठीक पहले यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
राज्यमंत्री ओटाराम देवासी का बचाव
इस पूरे विवाद के बीच हरीश दवे ने राज्यमंत्री ओटाराम देवासी का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने कहा कि ओटाराम देवासी को इस पूरे प्रकरण में बेवजह और दुर्भावनापूर्ण तरीके से बदनाम किया जा रहा है, जो कि पूरी तरह गलत और अन्यायोचित है। दवे का कहना है कि रामझरूखा धरुका की संपत्ति और महामंदिर का पूरा ऐतिहासिक परिदृश्य आम जनता के बीच अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। ऐसे में अधूरी जानकारी और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित आरोपों के आधार पर इस मुद्दे को और अधिक उलझाने के बजाय, जमीन और मंदिर की संपत्ति से जुड़े पुख्ता तथ्यों को जनता के सामने लाया जाना चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर संपत्ति की सुरक्षा
हिंदू वेव के संयोजक ने दो टूक शब्दों में कहा कि राजनीतिक छींटाकशी और बयानबाजी के बीच मंदिर की एक इंच जमीन को भी खुर्द-बुर्द नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू वेव की इस पूरे मामले पर पैनी नजर बनी हुई है और संगठन आगे की हर कानूनी व सामाजिक कार्रवाई पर कड़ी नजर रखेगा। हरीश दवे के मुताबिक, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा स्वयं इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी उच्चस्तरीय जांच करवा रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पारदर्शी जांच के जरिए पूरी स्थिति साफ हो जाएगी, जिससे मंदिर की संपत्ति से जुड़े विवाद पर फैलने वाली किसी भी तरह की गलतफहमी का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा। नगर परिषद चुनाव की दहलीज पर खड़े सिरोही में राम मंदिर की जमीन का यह मुद्दा अब स्थानीय राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। एक तरफ जहां राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है, वहीं हरीश दवे ने इस पूरे विवाद को मंदिर की संपत्ति और उसके इतिहास से जोड़ते हुए संकल्प जताया है कि राजनीतिक रस्साकशी के बीच संपत्ति को आंच नहीं आने दी जाएगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकारी जांच से क्या नए निष्कर्ष सामने आते हैं और चुनावी सरगर्मी के बीच यह मुद्दा कितना तूल पकड़ता है।



















