पाकिस्तान की राजनीति में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अगुवाई वाली सरकार के लिए मुश्किलें हर दिन के साथ गंभीर होती जा रही हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि सरकार को एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि संसद के भीतर, सहयोगी दलों के बीच और अदालत के गलियारों में एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के स्वास्थ्य और इलाज से जुड़े मामलों को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका आमने-सामने आ गई हैं, तो दूसरी तरफ सत्तारूढ़ गठबंधन की मुख्य सहयोगी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी बगावती तेवर अपना लिए हैं। इसके साथ ही देश के विपक्षी दल भी हाथ मिलाकर सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिससे सत्ता के गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है।
इमरान खान के इलाज पर अदियाला जेल से पिक्स अस्पताल तक का विवाद
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में इमरान खान का इलाज और उनकी चिकित्सीय जांच का मुद्दा सबसे ऊपर बना हुआ है। पिछले महीने की 18 तारीख को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्ट निर्देश जारी किया था कि अदियाला जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री को इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में भर्ती कराया जाए। अदालत की मंशा थी कि विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड बनाकर अगले 48 घंटों के भीतर उनकी व्यापक स्वास्थ्य जांच और इलाज सुनिश्चित किया जाए। हालांकि सरकार ने इस आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दाखिल कर दी और तर्क दिया कि किसी भी निजी अस्पताल के बजाय उनकी जांच किसी सरकारी मेडिकल संस्थान में कराई जानी चाहिए।
इसी कानूनी पशोपेश के बीच जब इमरान को जेल से बाहर लाया गया, तो उन्हें अदालत के बताए शिफा अस्पताल की जगह सरकारी PIMS अस्पताल ले जाया गया। वहां औपचारिकता पूरी करने के बाद कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें वापस अदियाला जेल भेज दिया गया। इस घटना के सामने आने के बाद इमरान के परिवार और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने सरकार पर अदालत के आदेशों की खुली अवहेलना करने का गंभीर आरोप लगाया है। दूसरी तरफ सरकार ने इस कदम के पीछे सुरक्षा से जुड़े पुख्ता कारणों का हवाला दिया है। यदि यह मामला दोबारा सुप्रीम कोर्ट की देहरी पर पहुंचता है और अदालत इसे अपने आदेश की अवमानना मानती है, तो शहबाज सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों के लिए बड़ी कानूनी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
सहयोगी पीपुल्स पार्टी की नाराजगी और बिलावल भुट्टो का कड़ा रुख
शहबाज सरकार के लिए केवल अदालत और विपक्ष का दबाव ही सिरदर्द नहीं है, बल्कि उसका अपना घर भी बिखरता नजर आ रहा है। सरकार को बाहर से समर्थन दे रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए ऐलान कर दिया है कि जब तक उनकी पार्टी की जायज शिकायतों का संतोषजनक समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक पीपीपी सीनेट और नेशनल असेंबली में सरकार के किसी भी विधेयक या कानून का समर्थन नहीं करेगी। दोनों दलों के बीच हाल ही में संपन्न हुए पीओके चुनाव को लेकर गहरी खाई पैदा हो गई है। पीपीपी ने इस चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली और साजिश का आरोप लगाया है और इन परिणामों को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर ली है।
बिलावल भुट्टो ने केवल अपनी नाराजगी जाहिर करने तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्होंने अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से भी संपर्क साधना शुरू कर दिया है। उनका साफ कहना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के साथ किसी भी तरह का वास्तविक और भरोसेमंद गठबंधन चलाना संभव नहीं रह गया है। इसके अलावा देश में नए प्रांतों के गठन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी पीपीपी ने एक व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने पर जोर दिया है, जिससे सरकार की मुश्किलें और अधिक बढ़ गई हैं।
विपक्षी दलों की एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक चालें
एक तरफ जहां सरकार अपने ही सहयोगियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ देश का बिखरा हुआ विपक्ष अब एकजुट होने की कवायद में जुट गया है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने मीडिया के सामने यह खुलासा किया है कि तमाम विपक्षी दलों ने मिलकर एक साझा मोर्चा बनाने के सिद्धांत पर अपनी सहमति दे दी है। इस राजनीतिक गोलबंदी में नेशनल असेंबली के नेता प्रतिपक्ष महमूद खान अचकजई और सीनेट के नेता प्रतिपक्ष अल्लामा राजा नासिर अब्बास समेत कई कद्दावर नेता अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
ये सभी विपक्षी दल संसद के भीतर सरकार को घेरने के लिए एक साझा रणनीति तैयार करने में जुटे हैं और राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक आने वाले सोमवार को एक बहुत ही अहम बैठक भी आयोजित होने जा रही है। इस पूरी रणनीति में सबसे बड़ा और निर्णायक कारक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का रुख रहने वाला है। अगर आने वाले दिनों में विपक्ष शहबाज सरकार के खिलाफ संसद में कोई अविश्वास प्रस्ताव लाने का गंभीर कदम उठाता है, तो ऐसी स्थिति में पीपीपी का रुख ही यह तय करेगा कि सरकार बचेगी या गिरेगी।





















