मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में मानसून की दस्तक के साथ ही खानपान की आदतों में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिलता है। जहां देश के बाकी हिस्सों में बारिश का मौसम शुरू होते ही चाय के साथ गरम पकौड़े और मंगौड़ी की मांग बढ़ जाती है, वहीं बुंदेलखंड के घरों में सदियों पुरानी पारंपरिक डिश चीला बनाने का दौर शुरू हो जाता है। सागर शहर सहित पूरे क्षेत्र में बारिश की बूंदें गिरते ही हर रसोई से चीला सिकने की खुशबू आने लगती है। यह व्यंजन न केवल खाने में बेहद स्वादिष्ट और सुपाच्य होता है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी काफी फायदेमंद माना जाता है। पेट की समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह एक हल्का और पौष्टिक विकल्प साबित होता है।
बुंदेलखंडी रसोई में चीला का खास महत्व और सेहत के फायदे
बारिश के सुहावने मौसम में चीला खाने की परंपरा बुंदेलखंड में पीढ़ियों से चली आ रही है। आमतौर पर मानसून के दौरान अधिक तली भुनी चीजें खाने से पाचन तंत्र पर बुरा असर पड़ता है और पेट भारी होने लगता है। ऐसे में बुंदेलखंड के लोग डीप फ्राई पकौड़ों की जगह बेसन से तैयार हल्के चीले को तरजीह देते हैं। चीला पचाने में आसान होता है और इसे पकाने में नाममात्र का तेल इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि पाचन संबंधी परेशानियों से जूझ रहे मरीजों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह एक उत्तम आहार माना जाता है। मानसून शुरू होते ही परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर गरम-गरम चीले का स्वाद लेते हैं।
चीला बनाने का पारंपरिक तरीका: रुई से सिकाई और हल्की आंच
पारंपरिक तरीके से चीला तैयार करने की कला बुंदेलखंड के अनुभवी बुजुर्गों के पास ही देखने को मिलती है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले बेसन का एक पतला घोल तैयार किया जाता है। इस पारंपरिक घोल में सिर्फ अजवाइन, स्वादानुसार नमक और लाल मिर्च पाउडर मिलाया जाता है। इसके बाद मिट्टी या लोहे के तवे को चूल्हे की धीमी आंच पर गर्म किया जाता है। तवे पर बेसन का पतला घोल फैलाने के बाद तेल की खपत को बेहद सीमित रखने के लिए रुई के फाहे का इस्तेमाल किया जाता है। रुई में हल्का सा तेल लगाकर पराठे की तरह चीले की सिकाई की जाती है। कुछ ही मिनटों में जब चीला हल्का लाल और करकरा दिखने लगता है, तो इसे तवे से उतार लिया जाता है। इसे पारंपरिक तीखी चटनी या घर के बने अचार के साथ परोसा जाता है।
आधुनिक तड़का और मीठे चीले की अनूठी वैराइटी
बदलते दौर के साथ चीला बनाने के तरीकों और इसके स्वाद में भी कई नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। अब चूल्हे की जगह रसोई में गैस चूल्हे और इंडक्शन का इस्तेमाल होने लगा है। आधुनिक तरीके में बेसन के घोल को अधिक मसालेदार और चटपटा बनाया जाता है। इसमें बारीक कटे हुए प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और विभिन्न मसाले मिलाए जाते हैं। गर्म तवे पर घोल डालने के बाद चम्मच की मदद से हल्का-हल्का तेल किनारे पर लगाया जाता है। सिकने के बाद इसे गरम-गरम चटनी और टोमैटो केचप के कॉम्बो के साथ परोसा जाता है, जिसका स्वाद युवा पीढ़ी को खूब भाता है। इसके अलावा बुंदेलखंड में गुड़ का मीठा चीला भी काफी लोकप्रिय है। इसे बनाने के लिए पहले गुड़ को पानी में भिगोकर अच्छी तरह घोला जाता है। फिर इस मीठे पानी को बेसन में मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है और धीमी आंच पर मीठे चीले तैयार किए जाते हैं।
सागर के बाजारों में मानसून के दौरान चीले की भारी मांग
मानसून के महीनों में सागर शहर के बाजारों और खानपान की दुकानों पर चीले की मांग काफी बढ़ जाती है। बारिश के सीजन को देखते हुए स्थानीय दुकानदार और स्टॉल संचालक खास तौर पर अलग-अलग वैराइटी के चीले तैयार करते हैं। शाम के समय दुकानों पर गरम चीले का लुत्फ उठाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी मानसून के सुहावने मौसम में इन स्पेशल चीलों का स्वाद लेने पहुंचते हैं। पारंपरिक बेसन-अजवाइन चीले से लेकर आधुनिक वेज चीला और गुड़ का मीठा चीला हर वर्ग की पहली पसंद बना हुआ है।



















