महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का गंभीर आरोप लगाया है। यह तीखी प्रतिक्रिया मीडिया में सामने आई उन अंदरूनी खबरों के बाद आई है, जिनमें चुनाव आयोग के भीतर वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को लेकर गहरे मतभेदों का दावा किया गया था। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद से देश के कई प्रमुख शहरों में राजनीतिक माहौल गरमा गया है और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।
पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के ताजा संपादकीय में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र की नींव पर सीधा प्रहार बताया गया है। संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग निष्पक्ष रहने के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए काम कर रहे हैं। पार्टी का दावा है कि चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में मोड़ने के मकसद से महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्यों में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं।
लेख में तीखे शब्दों में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली ने एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था की साख को बट्टा लगाया है। निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय निर्वाचन आयोग पर राजनीतिक दबाव के तहत काम करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, और शीर्ष अधिकारियों से तुरंत इस्तीफा देने के साथ जवाबदेही तय करने की मांग की गई है। संपादकीय के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम ने आम नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।
राजधानी दिल्ली में हाल ही में इस मुद्दे को लेकर तीखा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। सप्ताहांत के दौरान हजारों की संख्या में छात्र, विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ता और आम नागरिक जंतर-मंतर पर एकत्र हुए और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर जोरदार नारेबाजी की। भारी पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों ने विरोध स्थल के साथ-साथ मध्य दिल्ली के कई संवेदनशील इलाकों को पूरी तरह से घेर लिया था, जहां प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ तीखी तनातनी भी हुई और कई लोगों की गिरफ्तारियां भी की गईं।
विरोध की यह आंच केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रही, बल्कि महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी इसका असर साफ दिखाई दिया। मुंबई के प्रमुख मेट्रो स्टेशनों, रेलवे प्लेटफार्मों और कई अन्य सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने जमा होकर चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। इन प्रदर्शनों ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन के एक खुलासे ने इस विवाद को और हवा दे दी है। संपादकीय में जिक्र किया गया है कि जिजी थॉमसन ने सार्वजनिक तौर पर बताया था कि जब ज्ञानेश कुमार एक वरिष्ठ नौकरशाह के रूप में सेवारत थे, तब उन्होंने उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने और केरल से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मनाने का प्रयास किया था। साथ ही, चुनाव जीतने की स्थिति में केंद्र सरकार में मंत्री पद दिए जाने का आश्वासन देने का भी दावा किया गया था।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले इस राजनीतिक दल का कहना है कि इन ताजा घटनाक्रमों के बाद देश का विपक्ष एकजुट होता नजर आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अलावा विभिन्न वामपंथी दलों के शीर्ष नेताओं से संपर्क साधा है। विपक्षी दलों से यह आग्रह किया गया है कि वे ‘इंडिया’ गठबंधन के बैनर तले एक साझा मोर्चा तैयार करें ताकि सरकार की नीतियों के खिलाफ एक मजबूत और संयुक्त रणनीति बनाई जा सके।
दूसरी तरफ, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं और भाजपा शासित राज्यों के प्रमुख नेताओं ने चुनाव आयोग का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने इन तमाम आरोपों को विपक्ष की केवल राजनीतिक बयानबाजी करार देते हुए खारिज कर दिया है। इसके बावजूद, विपक्षी दलों का मानना है कि जनता का यह असंतोष अब एक निर्णायक मोड़ की तरफ बढ़ रहा है। संपादकीय में साफ चेतावनी दी गई है कि जब तक देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और निष्पक्षता बहाल नहीं की जाती, तब तक जनता का यह व्यापक रोष मौजूदा सरकार की राजनीतिक वैधता के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।



















