उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी विसात बिछाना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने के मकसद से पीडीए रणनीति पर लगातार जोर दे रहे हैं। इस सामाजिक समीकरण का मुकाबला करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने एक विस्तृत 10 सूत्रीय योजना तैयार की है। इस खाके के जरिए पार्टी जातीय विभाजन की राजनीति से ध्यान हटाकर प्रशासनिक सुशासन, कानून के राज, विकास कार्यों और अपने मजबूत संगठनात्मक तंत्र को मुख्य विमर्श बनाना चाहती है। राजनीतिक हलकों में इस समय इस बात की पड़ताल की जा रही है कि इस पूरी योजना में वह कौन सा मुख्य दांव है जिसे विपक्ष के लिए भेदना सबसे कठिन माना जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति के प्रमुख 10 बिंदु
पार्टी की 10 सूत्रीय योजना में चुनावी विमर्श को पूरी तरह बदलने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत जातिगत ध्रुवीकरण का मुकाबला करने के लिए सुशासन और आर्थिक प्रगति के मुद्दों को केंद्र में लाया जाएगा। कानून-व्यवस्था की पुरानी स्थिति को याद दिलाने के लिए मुजफ्फरनगर के दंगों, गेस्ट हाउस कांड और संगठित माफिया के प्रभाव जैसे पूर्व विवादों पर फिर से चर्चा शुरू की जाएगी। इसके साथ ही राज्य के सभी छह संगठनात्मक संभागों में जनसैलाब जुटाने के लिए बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय रैलियां की जाएंगी।
चुनावी प्रचार में केंद्र और राज्य दोनों स्तरों की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, कड़े कानून प्रवर्तन और मोदी-योगी के सुशासन मॉडल को प्रमुखता से पेश किया जाएगा। मतदाताओं के सामने वर्ष 2017 से पहले और उसके बाद के हालात का तुलनात्मक ब्योरा रखा जाएगा, जिसमें बिजली वितरण, पक्की सड़कों के निर्माण और सुरक्षा माहौल का फर्क रेखांकित किया जाएगा।
विपक्ष के पीडीए अभियान के बरक्स विकास योजनाओं की हर वर्ग तक पहुंच को रखा जाएगा। किसानों, महिलाओं, युवाओं तथा दलित व पिछड़े वर्गों के सरकारी लाभार्थियों का एक समर्पित कोर वर्ग तैयार करने पर काम हो रहा है। इसके साथ ही पन्ना प्रमुखों के जरिए बूथ स्तर पर सूक्ष्म चुनावी प्रबंधन मजबूत किया जाएगा, ताकि हर मतदाता तक व्यक्तिगत पहुंच बनाई जा सके। संगठन के भीतर मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के आपसी मतभेदों को सुलझाकर आंतरिक समन्वय साधा जाएगा। युवाओं के लिए निष्पक्ष सरकारी नियुक्तियों, रोजगार के नए अवसरों, गन्ना उत्पादक किसानों के बकाए भुगतान और पीएम किसान योजना के प्रत्यक्ष लाभ को प्रचार के केंद्र में रखा जाएगा।
रैलियों से लेकर बूथ स्तर तक का जमीनी अभियान
इस कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी कई स्तरों पर एक साथ गतिविधियां चला रही है। उत्तर प्रदेश के सभी छह प्रमुख संगठनात्मक क्षेत्रों, जिनमें पश्चिमी यूपी, ब्रज, रोहिलखंड, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल शामिल हैं, में विशाल रैलियों और सघन जनसंपर्क अभियानों की रूपरेखा बनाई गई है। इन बड़े सम्मेलनों में नए एक्सप्रेसवे, अंतरराष्ट्रीय स्तर के हवाई अड्डों और औद्योगिक निवेश के जरिए तैयार विकास मॉडल को जनता के सामने पेश किया जाएगा।
पार्टी का प्रयास चुनाव को केवल आरक्षण और जातिगत गोलबंदी तक सीमित रखने की बजाय सुशासन पर केंद्रित करना है। इसके लिए एक आक्रामक तुलनात्मक अभियान चलाया जाएगा, जिसमें वर्ष 2017 से पहले के समाजवादी पार्टी के शासनकाल और मौजूदा योगी सरकार की कार्यशैली का सीधा अंतर मतदाताओं को समझाया जाएगा।
ग्रामीण और युवा मतदाताओं को साधने के लिए सरकारी नौकरियों में पारदर्शी भर्ती प्रणाली को प्रमुख उपलब्धि के तौर पर सामने रखा जाएगा। देहाती इलाकों में गन्ना किसानों को समय पर मिलने वाले भुगतान और पीएम किसान सम्मान निधि के जरिए सीधे बैंक खातों में जमा होने वाली आर्थिक सहायता को व्यापक रूप से प्रचारित किया जाएगा।
व्यापक जनसभाओं के साथ-साथ पार्टी अपने पारंपरिक मजबूत तंत्र यानी बूथ प्रबंधन को नए सिरे से सक्रिय कर रही है। पन्ना प्रमुखों की निगरानी व्यवस्था को धार दी जा रही है ताकि प्रत्येक परिवार से सीधा संवाद बना रहे। इसके अलावा पार्टी नेतृत्व आंतरिक गुटबाजी और स्थानीय असंतोष को खत्म करने के लिए नेताओं के बीच निरंतर तालमेल बिठाने में जुटा है।
सबसे मजबूत दांव: अचूक लाभार्थी वर्ग
तमाम संगठनात्मक तैयारियों के बीच जिस एक फॉर्मूले को पार्टी के लिए सबसे बड़ा आधार माना जा रहा है, वह है विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का व्यापक नेटवर्क। समाजवादी पार्टी जहां सामाजिक न्याय के आधार पर जातियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी का मुख्य जोर इस बात पर है कि शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का फायदा जाति या वर्ग देखकर नहीं पहुंचता।
दलित और पिछड़े समुदायों के बीच मौजूद उन करोड़ों नागरिकों को लामबंद किया जा रहा है जिन्हें मुफ्त अनाज, पक्के आवास, व्यक्तिगत शौचालय और आयुष्मान योजना के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा मिली है। पार्टी इस लाभार्थी समूह को एक निष्ठावान और शांत मतदाता आधार के रूप में विकसित करना चाहती है ताकि जातिगत नारों का असर कम किया जा सके। हालांकि, इस सामाजिक ताने-बाने के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय तक प्रभावी संवाद स्थापित करना पार्टी के लिए एक अलग राजनीतिक चुनौती बना हुआ है।



















