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अमेरिकी संसद में जीते हुए डेमोक्रेट्स को रोकने के लिए दक्षिणपंथी संस्था ने पेश किया नया कानूनी फॉर्मूलाराजनीति
2 नव॰ 2026, 11:25 pm (2 घंटे पहले)· 1

अमेरिकी संसद में जीते हुए डेमोक्रेट्स को रोकने के लिए दक्षिणपंथी संस्था ने पेश किया नया कानूनी फॉर्मूला

सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने चुनाव जीतने के बावजूद प्रगतिशील और मुस्लिम सांसदों को शपथ लेने से रोकने की एक विवादास्पद रणनीति पेश की है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान के बुनियादी नियमों और धार्मिक स्वतंत्रता के सीधे खिलाफ है।

अमेरिकी विधायी व्यवस्था में एक असाधारण संवैधानिक टकराव की जमीन तैयार की जा रही है, जहां चुनाव में जनता का समर्थन हासिल करने के बाद भी विपक्षी उम्मीदवारों को सदन में प्रवेश से वंचित करने का फॉर्मूला गढ़ा गया है। वॉशिंगटन स्थित दक्षिणपंथी थिंक टैंक सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने एक विस्तृत प्रस्ताव के जरिए यह दलील पेश की है कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ खास नेता चुनाव जीत भी जाते हैं, तब भी उन्हें संसद की सदस्यता ग्रहण करने से रोका जा सकता है। संस्था की इस नई कार्ययोजना ने कानूनी हलकों और नीति निर्माताओं के बीच तीखी बहस छेड़ दी है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की वैधता को चुनौती दी गई है।

प्रगतिशील और मुस्लिम नेताओं को निशाना बनाने की दलील

संस्था के कानूनी फेलो बेंजामिन ओसबोर्न द्वारा तैयार किए गए इस दस्तावेज में मुख्य रूप से उन राजनेताओं पर निशाना साधा गया है जिन्हें वे एक कथित वैचारिक गठजोड़ का हिस्सा बताते हैं। इस प्रस्ताव का शीर्षक यह सवाल उठाता है कि क्या अमेरिकी संसद किसी ऐसे निर्वाचित सदस्य को शपथ दिला सकती है जो संविधान को कमजोर करने का इरादा रखता हो। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तर्क दिया है कि जो उम्मीदवार वामपंथी या प्रगतिशील विचारों के साथ साथ मुस्लिम पृष्ठभूमि से आते हैं, उन्हें सदन की दहलीज पार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। लेखक का दावा है कि इस समूह के लोग जिस वैचारिक बदलाव की वकालत करते हैं, वह संवैधानिक ढांचे के अनुकूल नहीं है, इसलिए वे पद की सच्ची निष्ठा की शपथ नहीं ले सकते।

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इससे पहले संस्था के कार्यकारी निदेशक वेड मिलर ने भी एक अलग दस्तावेज में इसी सोच को विस्तार दिया था। उसमें चार महिला सांसदों के उस चर्चित समूह का खास तौर पर उल्लेख किया गया था, जिन्होंने वर्ष 2018 में संसद में पहली बार जीत दर्ज की थी। इन नेताओं में एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज, रशीदा तलीब, अयाना प्रेस्ली और इल्हान उमर शामिल हैं। इसके अलावा न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और मिशिगन से सीनेट पद के दावेदार अब्दुल अल-सईद का नाम भी इस श्रेणी में रखा गया है। दस्तावेज का दावा है कि ये नेता पूंजीवाद, ईसाई मान्यताओं और पारंपरिक पश्चिमी राजनीतिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली विचारधारा के पोषक हैं। हालांकि जिन नेताओं के नाम लिए गए हैं, उनमें से किसी ने भी खुद को मार्क्सवादी नहीं बताया है, यद्यपि ओकासियो-कोर्टेज और ममदानी लोकतांत्रिक समाजवादी के रूप में अपनी पहचान रखते हैं।

संस्था के संस्थापक और बजटीय शक्तियों का विवाद

सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका की नींव रसेल वॉट ने रखी थी, जो प्रोजेक्ट 2025 के मुख्य रणनीतिकारों में शुमार रहे हैं और इस समय ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जब रसेल वॉट को इस पद के लिए नामित किया गया था, तब मुस्लिम समुदाय पर उनकी पुरानी टिप्पणियों को लेकर भारी विरोध हुआ था। उस समय उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर यह दावा किया था कि इस्लाम धर्म को मानने वालों की धार्मिक समझ में खोट है और वे ईश्वर को सही मायने में नहीं पहचानते।

रसेल वॉट और उनके करीबी सहयोगी खुद को कट्टर संवैधानिक परंपरावादी कहते हैं, लेकिन उन पर प्रशासनिक सत्ता को मजबूत करने के लिए विधायिका के अधिकारों पर अतिक्रमण करने के आरोप लगते रहे हैं। अमेरिकी व्यवस्था के तहत संघीय सरकार के कामकाज के लिए धनराशि मंजूर करने और उसका आवंटन तय करने का अधिकार पूरी तरह संसद के पास है। इसके बावजूद उन्होंने संसद से पारित खरबों डॉलर के फंड को रोकने, उसमें देरी करने या उसे खारिज करने के कई कदम उठाए हैं। पिछले वर्ष उन्होंने पांच अरब डॉलर की विदेशी सहायता राशि पर रोक लगा दी थी, जबकि चालू वर्ष में आठ सौ मिलियन डॉलर से अधिक की रकम वापस छीन ली गई। मेन राज्य की सीनेटर सुसान कॉलिन्स ने सितंबर माह के अंत में आगाह किया था कि यह वित्तीय फैसला इंपाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट का सीधा उल्लंघन हो सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय और संवैधानिक सुरक्षा

संवैधानिक मामलों के जानकारों ने इस पूरे कानूनी विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के प्रोफेसर रिचर्ड पिल्डेस का कहना है कि यह पुरानी व्यवस्थाओं को राजनीतिक स्वार्थ के लिए मोड़ने की एक नई कोशिश है। उनके अनुसार अदालतें इस तरह की व्याख्या को कभी मान्यता नहीं देंगी। वहीं ब्राउन यूनिवर्सिटी में राजनीति और संवैधानिक कानून के प्रोफेसर कोरी ब्रेटशनाइडर ने भी स्पष्ट किया कि यह पूरी कवायद संविधान की आड़ लेकर विरोधियों पर हमला बोलने जैसी है, जिसे कोई भी अदालत तुरंत खारिज कर देगी।

विशेषज्ञों का जोर इस बात पर भी है कि किसी भी सांसद को उसके मजहब या आस्था के आधार पर अयोग्य ठहराना अमेरिकी कानून के तहत पूरी तरह असंभव है। संविधान का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी सरकारी या निर्वाचित पद पर बैठने के लिए कोई धार्मिक कसौटी तय नहीं की जा सकती। प्रोफेसर ब्रेटशनाइडर का मानना है कि दक्षिणपंथी विचारक केवल माहौल का परीक्षण करने के लिए ऐसे विचार उछाल रहे हैं ताकि यह देखा जा सके कि जनता और व्यवस्था में इसकी कितनी स्वीकार्यता बनती है। इस पूरे मामले पर अब्दुल अल-सईद के चुनावी कार्यालय या संस्था की ओर से किसी भी तरह की औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

सदन के संख्याबल और ऐतिहासिक मिसाल का असर

यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर क्रिश्चियन ग्रोस का विश्लेषण है कि इस प्रकार की योजना की सफलता सीधे तौर पर चुनावों के बाद सीटों के अंतर पर निर्भर करेगी। यदि सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी केवल एक या दो सीटों के मामूली अंतर से बढ़त बनाती है, तो रिपब्लिकन सदस्य सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए चुनावी परिणामों को चुनौती देने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यदि यह अंतर चार सीटों या उससे अधिक का होता है, तो ऐसे हथकंडे अपनाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा, क्योंकि बड़े पैमाने पर जीते हुए उम्मीदवारों को रोकने की योजना बेहद हास्यास्पद साबित होगी।

प्रतिनिधि सभा में भी इसका पूरा दारोमदार बहुमत के समीकरण पर टिकेगा। यदि रिपब्लिकन पार्टी अपना संख्याबल बचाने में सफल रहती है, तो वह जीते हुए डेमोक्रेट्स को सदन में आने से रोकने के लिए मतदान का सहारा ले सकती है। इतिहास में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है। वर्ष 1967 में हार्लेम से चुने गए एडम क्लेटन पॉवेल जूनियर को सदन में बैठने से रोक दिया गया था। वह न्यूयॉर्क राज्य से संसद पहुंचने वाले पहले अश्वेत प्रतिनिधि थे और उन पर वित्तीय हेराफेरी के आरोप लगाकर यह कदम उठाया गया था। प्रोफेसर ग्रोस का कहना है कि यदि वर्ष 2027 की नई संसद शुरू होने तक यह विवाद अदालतों में खिंचता है, तो अंततः जजों के स्थगन आदेश से ही तय होगा कि निर्वाचित सदस्य शपथ ले पाएंगे या नहीं, जिससे न्यायपालिका और विधायिका के बीच सीधा टकराव पैदा हो सकता है।

हालांकि पिल्डेस साफ कहते हैं कि ऐसा होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता। इसके बावजूद विशेषज्ञों की चिंता यह है कि भले ही यह रणनीति कानूनी तौर पर टिक न पाए, लेकिन विरोधियों को डराने और कानूनी तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में करने का डर बना रहता है, जैसा कि संघीय जांच एजेंसी के पूर्व निदेशक जेम्स कॉमी पर आरोप लगाने के प्रयासों में देखने को मिला था।

सवाल-जवाब

सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने अपनी रिपोर्ट में क्या दावा किया है?
संस्था का तर्क है कि चुनाव जीतने के बाद भी प्रगतिशील और मुस्लिम पृष्ठभूमि के कुछ सांसदों को अमेरिकी संसद में शपथ लेने और बैठने से रोका जा सकता है।
इस प्रस्ताव का मुख्य लेखक कौन है?
इस दस्तावेज को जॉर्जटाउन लॉ स्कूल के स्नातक और संस्था के लीगल फेलो बेंजामिन ओसबोर्न ने लिखा है।
संस्था के संस्थापक रसेल वॉट कौन हैं?
रसेल वॉट प्रोजेक्ट 2025 के प्रमुख रणनीतिकार हैं और वर्तमान में अमेरिकी सरकार के ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
किन प्रमुख राजनेताओं को इस प्रस्ताव में निशाना बनाया गया है?
इसमें अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज, रशीदा तलीब, अयाना प्रेस्ली, इल्हान उमर, जोहरान ममदानी और अब्दुल अल-सईद के नाम शामिल हैं।
क्या अमेरिकी संविधान किसी सांसद को धर्म के आधार पर रोकने की अनुमति देता है?
नहीं, अमेरिकी संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी सार्वजनिक या निर्वाचित पद के लिए कोई धार्मिक परीक्षण नहीं लिया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का इस योजना के बारे में क्या कहना है?
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विचार कानूनी रूप से टिक नहीं सकता और अदालतें इसे तुरंत खारिज कर देंगी।
संसद में जीते हुए सदस्य को रोकने की कौन सी पुरानी मिसाल दी गई है?
वर्ष 1967 में प्रतिनिधि सभा ने हार्लेम से चुने गए पहले अश्वेत प्रतिनिधि एडम क्लेटन पॉवेल जूनियर को फंड के दुरुपयोग के आरोपों के चलते बैठने से रोक दिया था।
क्या रसेल वॉट पर संसद के बजट संबंधी अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगा है?
हां, उन्होंने संसद द्वारा मंजूर 5 अरब डॉलर की विदेशी सहायता और 800 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि पर रोक लगाई थी, जिसे सीनेटर सुसान कॉलिन्स ने इंपाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट का संभावित उल्लंघन बताया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·1 मिनट पहले

चुने हुए प्रतिनिधियों को सिर्फ़ उनकी सोच या धर्म की वजह से रोकना लोकतंत्र की मूल भावना के ही खिलाफ़ है। जनता के फ़ैसले को ऐसे कानूनी दांव-पेंच से पलटना समाज में सिर्फ़ नफ़रत और दूरियां ही बढ़ाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·29 मिनट पहले

अरे भाई, जनता जिसे चुनकर भेज रही है, उसे सिर्फ इसलिए रोकना कि उनका धर्म या विचार अलग हैं, लोकतंत्र का मखौल उड़ाना है। जनता का फैसला सबसे ऊपर होता है।

Michael Anderson@michael-anderson·28 मिनट पहले

रविकीर्ण जी, बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। वॉशिंगटन में जब मैंने ऐसे ही एक चुनावी विरोध को कवर किया था, तब लगा था कि जनता के फैसले से बड़ा कुछ नहीं होता।

Rohan Verma@rohan-verma·51 मिनट पहले

जनता ने जिन्हें चुनकर भेजा है, उन्हें सिर्फ विचारधारा के आधार पर रोकने की ऐसी कोशिश क्या वाकई कानूनन टिक पाएगी? अगर ऐसा होने लगा, तो फिर चुनाव कराने का मतलब ही क्या बचेगा?

Karan Malhotra@karan-malhotra·50 मिनट पहले

रोहन भाई, वही तो! बेन ओसबोर्न ने जो ये नया फॉर्मूला निकाला है, वो सीधे जनता के वोट की तौहीन है।

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