उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां पूरी तेजी पर पहुंच चुकी हैं। बीते तीन से चार महीनों के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच लगातार तीखी राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी पैंतरेबाजी सामने आ रही थी। अब इस सियासी संग्राम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की प्रत्यक्ष भागीदारी के बाद राज्य का राजनीतिक माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंग गया है। भारतीय जनता पार्टी राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने के मकसद से संगठनात्मक तैयारी में जुटी है और पार्टी ने आगामी चुनाव के लिए 325 से 350 सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। लखनऊ में आयोजित बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं से वर्ष 2017 के उस प्रदर्शन को दोहराने का आह्वान किया, जब बीजेपी ने अपने बलबूते 312 विधानसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी सत्तारूढ़ दल को सत्ता से बेदखल करने के लिए जमीनी स्तर पर अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रहे हैं। अखिलेश यादव ने बीजेपी के इस बड़े लक्ष्य के सामने एक ऐसा रणनीतिक खाका तैयार किया है, जिसका मुख्य आधार सामाजिक प्रतिनिधित्व और पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण है। समाजवादी पार्टी इस सामाजिक गठबंधन को मात्र नारों या चुनावी रैलियों तक सीमित न रखकर वास्तविक टिकट वितरण और संगठन की संरचना में बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का प्रस्ताव
समाजवादी पार्टी की इस चुनावी योजना में सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामान्य यानी गैर-आरक्षित सीटों पर भी अनुसूचित जाति के चेहरों को चुनाव लड़ाने का विचार है। पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के अनुसार, सपा राज्य की कम से कम 100 विधानसभा सीटों पर दलित और आदिवासी उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने की विस्तृत योजना पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 कुल सीटें हैं, जिनमें अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें आरक्षित हैं। इन सभी 86 आरक्षित सीटों के साथ-साथ पार्टी 14 सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी दलित प्रत्याशियों को उतारने के विकल्प पर सक्रियता से विचार कर रही है।
यह कवायद अंतिम प्रत्याशी सूची नहीं बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे गहरे मंथन का हिस्सा है। इस रणनीति के क्रियान्वयन के लिए सपा नेतृत्व उपयुक्त, जीतने योग्य और मजबूत सामाजिक आधार वाले प्रत्याशियों की पहचान करने में लगा है। इस कदम के जरिए पार्टी उन क्षेत्रों में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है जहां उसका संगठनात्मक ढांचा अपेक्षाकृत कमजोर रहा है अथवा जहां दलित प्रत्याशी के उतरने से जातियों का नया और प्रभावी चुनावी गठबंधन खड़ा किया जा सकता है।
बहुजन समाज पार्टी के कमजोर आधार में नई संभावनाओं की तलाश
उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास में दलित मतदाता दशकों तक बहुजन समाज पार्टी का मुख्य आधार रहे हैं। कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी ने राज्य की राजनीति में दलित समुदाय को सशक्त पहचान और निर्णायक सत्ता दिलाई थी। हालांकि हालिया विधानसभा और आम चुनावों में बीएसपी के जनाधार और चुनावी नतीजों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इस बदलते परिदृश्य में समाजवादी पार्टी उस राजनीतिक खालीपन को भरने और दलित मतदाताओं को अपने पाले में जोड़ने का गंभीर प्रयास कर रही है।
अखिलेश यादव के समक्ष मुख्य चुनौती यह है कि दलित मतदाता मात्र बीजेपी का विरोध करने के नाम पर सपा के साथ न आएं, बल्कि उन्हें यह ठोस भरोसा हो कि समाजवादी पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी, मान-सम्मान और नेतृत्व सुरक्षित रहेगा। सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के प्रतिनिधियों को अवसर देना इसी व्यापक संदेश को समुदाय के बीच पहुंचाने का जरिया माना जा रहा है।
लोकसभा 2024 के सफल प्रयोग को विधानसभा स्तर पर दोहराने की तैयारी
समाजवादी पार्टी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व की इस रूपरेखा का सफल परीक्षण वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में किया था। उस चुनाव में पार्टी ने अपनी पारंपरिक छवि के विपरीत केवल पांच यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जो सपा संस्थापक परिवार के सदस्य थे। उनके स्थान पर गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समाज के उम्मीदवारों को बड़े पैमाने पर अवसर दिया गया। इस रणनीति के दम पर समाजवादी पार्टी ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 37 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी।
अखिलेश यादव की पूरी राजनीतिक रणनीति का केंद्र अब पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठबंधन है। इसका प्राथमिक उद्देश्य पार्टी की पुरानी मुस्लिम और यादव केंद्रित पहचान को पीछे छोड़ते हुए एक व्यापक सामाजिक मंच तैयार करना है। उत्तर प्रदेश के 403 सीटों वाले विधानसभा सदन में स्पष्ट बहुमत पाने के लिए केवल यादव और मुस्लिम मत पर्याप्त नहीं हैं। यही कारण है कि पार्टी अब कुर्मी, मौर्य, शाक्य, निषाद और अन्य पिछड़ी जातियों के साथ दलित वर्गों के बीच अपना जनाधार निरंतर बढ़ा रही है। इसके साथ ही पार्टी ने इस सामाजिक समीकरण को और विस्तार देते हुए उन पिछड़ी जातियों तक भी पहुंच बनाई है जो लंबे समय से बीजेपी के साथ मजबूती से जुड़ी रही हैं। अखिलेश यादव ने पीडीए की व्याख्या में सामाजिक संतुलन साधते हुए 'पिछड़ा' के साथ 'पंडित' यानी ब्राह्मण समाज को भी जोड़ने की बात कही है।
बीजेपी के 350 सीटों के लक्ष्य और पीडीए की सीधी टक्कर
भारतीय जनता पार्टी ने 2027 के चुनाव में 325 से 350 सीटें जीतने का विशाल लक्ष्य सामने रखा है। लखनऊ की बैठक में अमित शाह द्वारा 2017 के 312 सीटों वाले प्रदर्शन को दोहराने के निर्देश के बाद बीजेपी अपने मजबूत संगठन, पन्ना प्रमुख स्तर तक के बूथ प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व और केंद्र तथा राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार को मुख्य हथियार बना रही है। ऐसी स्थिति में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक को एकजुट रखने की होगी, जबकि अखिलेश यादव का पीडीए मॉडल इसी समर्थन आधार में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रहा है।
















