उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की औपचारिक तारीखों का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ है, लेकिन प्रदेश की सियासी बिसात पर मोहरे सजने लगे हैं। चुनाव में अब मुश्किल से 10 महीने बचे हैं और हर पार्टी अपने वोट बैंक को साधने में जुटी है। इसी होड़ में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव एक बार फिर रथ यात्रा की रणनीति अपनाने जा रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार उनकी पीडीए रथयात्रा की शुरुआत इटावा स्थित उनके बनवाए केदारेश्वर मंदिर से चारों शंकराचार्यों की मौजूदगी में होगी, यानी अखिलेश यादव पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटरों के साथ अब सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा भी लेने जा रहे हैं।
403 सीटों को साधने की तैयारी, सितंबर में शंखनाद संभव
समाजवादी पार्टी ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों तक पहुंचने के लिए पीडीए यात्रा निकालने का फैसला किया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक यह भव्य रथ यात्रा सितंबर महीने में शुरू हो सकती है, हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक तारीख तय नहीं हुई है। सियासी हलकों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि यात्रा कहां से शुरू होगी और इसका स्वरूप कैसा रहेगा। संकेत मिल रहे हैं कि अखिलेश यादव इसकी शुरुआत अपने गृह जिले इटावा से करेंगे, जो उनकी राजनीतिक जड़ों से भी जुड़ा है और जहां उन्होंने खुद एक भव्य मंदिर बनवाया है।
केदारेश्वर मंदिर से शंकराचार्यों के आशीर्वाद के साथ शुरुआत
इटावा में अखिलेश यादव ने जिस केदारेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया है, सूत्रों के अनुसार रथ यात्रा का आगाज उसी मंदिर परिसर से चारों शंकराचार्यों की उपस्थिति और उनके आशीर्वाद के साथ किया जा सकता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अखिलेश यादव इस चुनाव में खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति करने के मूड में हैं। पार्टी अब पीडीए के सामाजिक समीकरण के साथ-साथ धार्मिक आस्था का चेहरा भी सामने लाना चाहती है, ताकि हिंदू वोटरों के बीच यह संदेश जाए कि समाजवादी पार्टी सनातन परंपरा के खिलाफ नहीं है।
राम मंदिर विवाद के बाद विपक्ष की सक्रियता
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी से जुड़े आरोपों और उसके बाद उठे विवादों के बाद से पूरा विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी, खुद को सबसे बड़ा रामभक्त और असली सनातनी साबित करने की कोशिश में जुटा है। अखिलेश यादव का केदारेश्वर मंदिर से यात्रा शुरू करने का फैसला इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी प्रवक्ता अमीक जमाई और फखरुल हसन चांद भी लगातार इस रणनीति को सामने रखते हुए पार्टी के पीडीए विजन और हिंदुत्व के प्रति उसके रुख को जनता तक पहुंचाने में लगे हैं।
कांग्रेस को भी सपा के कंधों का सहारा
अखिलेश यादव के इस चुनावी अभियान और आने वाली रथ यात्रा को गठबंधन सहयोगी कांग्रेस का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। असल में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का अपना जमीनी संगठन इस वक्त लगभग ना के बराबर है, इसलिए पार्टी समाजवादी पार्टी के मजबूत ढांचे के सहारे अपना खोया हुआ जनाधार दोबारा तलाशने में जुटी है। कांग्रेस प्रवक्ता सचिन रावत ने भी सपा की इस यात्रा का स्वागत करते हुए गठबंधन की एकजुटता का संदेश दिया है।
बीजेपी का पलटवार, माफियाराज की याद दिलाई
सपा की इस रथ यात्रा और सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने तीखा पलटवार किया है। यूपी बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह और अल्पसंख्यक मोर्चा के महामंत्री इसरार अहमद ने कहा कि अखिलेश यादव चाहे जितने मंदिर घूम लें या जितनी रथ यात्राएं निकाल लें, उत्तर प्रदेश की जनता 2017 से पहले के माफियावाद और गुंडाराज को अभी नहीं भूली है। बीजेपी का दावा है कि जनता इन दिखावटी यात्राओं के झांसे में आने वाली नहीं है।
पीटीसी अमित कुमार सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में शह और मात का यह खेल अब खुलकर सामने आ गया है और सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों आमने-सामने हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे चतुर किरदार जनता ही होती है, जो खामोशी से हर दांव-पेच देखती रहती है और आखिरी वक्त तक अपने पत्ते नहीं खोलती। अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव का यह नया सियासी दांव चुनावी मैदान में कितना असर दिखा पाता है।
केदारेश्वर मंदिर की खासियत, जो इसे खास बनाती है
उत्तर प्रदेश के इटावा में यमुना नदी के तट पर बना केदारेश्वर महादेव मंदिर अखिलेश यादव की ही पहल पर तैयार हुआ है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी परंपरागत निर्माण शैली है, जिसमें लोहे और सीमेंट की जगह गुड़, चना और केले के पेस्ट का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर में नेपाल से लाई गई पवित्र शालिग्राम शिला और तमिलनाडु के खास पत्थर जड़े गए हैं। इसका मुख्य भवन हूबहू उत्तराखंड के केदारनाथ धाम जैसा नजर आता है, जबकि पूरा परिसर तमिलनाडु के तंजौर स्थित बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित होकर बनाया गया है। इसे खास तौर पर शिव-शक्ति अक्ष रेखा पर स्थापित किया गया है और इसके गर्भगृह की ऊंचाई केदारनाथ मंदिर से महज एक इंच कम, यानी 84 फीट रखी गई है। यहां पूजा-अर्चना के लिए तमिलनाडु से विशेष पुरोहित बुलाए गए हैं और मंदिर परिसर में बालस्वरूप भगवान श्रीराम भी विराजमान हैं।











