उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनावों का पारा अभी से चढ़ने लगा है। राज्य की सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के बीच आमने-सामने की टक्कर देखने को मिल रही है। इसी राजनीतिक माहौल के बीच, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने प्रमुख राजनीतिक अस्त्र ‘PDA’ समीकरण को एक बार फिर नया रूप देना शुरू कर दिया है। हाल ही में उन्होंने इस फॉर्मूले की एक बिल्कुल नई परिभाषा सामने रखी है, जिससे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
युवाओं और खेलों से जोड़ा गया नया समीकरण
शनिवार को सामने आए घटनाक्रम में अखिलेश यादव ने पीडीए का दायरा बढ़ाते हुए इसे खेल और युवाओं की ऊर्जा से जोड़ दिया। पीडीए शिखर अभियान के मंच से उन्होंने इसका अर्थ ‘प्ले, डेवलप और अचीव’ यानी खेलना, विकसित करना और हासिल करना बताया। सपा प्रमुख का यह नया रुख युवाओं को साहसिक गतिविधियों और राज्य के समग्र विकास से जोड़ने की कवायਦ के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी इस फॉर्मूले के जरिए पारंपरिक जातिगत सीमाओं से परे जाकर युवाओं को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रही है।
लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक बदलते रहे हैं मायने
अगर बीते कुछ समय के राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि इस फॉर्मूले के अर्थ समय के साथ लगातार बदलते रहे हैं। साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान इस शब्द का मुख्य अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित रखा गया था, जिसके बूते पार्टी ने चुनाव में बेहद शानदार प्रदर्शन किया था। इसके बाद, बीते 5 अगस्त को जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर अखिलेश यादव ने इसमें बड़ा फेरबदल करते हुए ‘पी’ का मतलब पंडित यानी ब्राह्मण से जोड़कर एक तीखा सियासी दांव चला था। इस बदलाव के जरिए पार्टी ने सवर्ण जातियों के एक बड़े वर्ग को अपने पाले में लाने की कोशिश की थी, जिसमें पीड़ित पंडितों को भी शामिल किया गया ताकि सामाजिक समीकरणों का दायरा और ज्यादा व्यापक हो सके।
बीजेपी और सपा के बीच छिड़ी आर-पार की जंग
विपक्षी खेमे की इन रणनीतियों पर सत्ताधारी दल का रुख बेहद हमलावर रहा है। भारतीय जनता पार्टी लगातार इस पूरे प्रयोग को महज एक राजनीतिक छलावा और केवल परिवारवादी या जातिवादी राजनीति करार देती आई है। सत्ता पक्ष का स्पष्ट तर्क है कि राज्य की जनता अब जातियों के इन उलझे हुए और भ्रमित करने वाले समीकरणों के बजाय केवल विकास और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर ही अपना समर्थन देगी। इसके उलट, समाजवादी पार्टी का यह दृढ़ विश्वास है कि यही वह अचूक फॉर्मूला है जो भगवा दल की हिंदुत्व और कमंडल की राजनीति के मुकाबले सामाजिक न्याय के एजेंडे को मजबूती से स्थापित करेगा। जैसे-जैसे साल 2027 का चुनावी रण करीब आ रहा है, यह तय माना जा रहा है कि यह राजनीतिक शब्द और इसके बदलते आयाम बहस के केंद्र में डटे रहेंगे। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस मोर्चे पर लगातार हमलावर हैं और उन्होंने हाल ही में शनिवार को एक बार फिर से सपा को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी करार दिया है।




















