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पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से पहले टीएमसी और कांग्रेस आमने-सामने, ममता बनर्जी गुट के प्रस्ताव पर छिड़ी सियासी जंगराजनीति
16 सित॰ 2026, 11:21 am (41 दिन पहले)· 0

पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से पहले टीएमसी और कांग्रेस आमने-सामने, ममता बनर्जी गुट के प्रस्ताव पर छिड़ी सियासी जंग

पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने दावा किया है कि ममता बनर्जी के दल ने नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर तालमेल के लिए संपर्क किया था, जिसे टीएमसी ने खारिज कर दिया है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में उपचुनाव की सुगबुगाहट के बीच एक बार फिर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। इस बार सरगर्मी भारतीय जनता पार्टी की वजह से नहीं, बल्कि विपक्षी गठबंधन के दो प्रमुख घटकों तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के आपसी रिश्तों में आए तनाव के कारण बढ़ी है। राज्य में होने वाले आगामी उपचुनावों के मद्देनजर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले दल ने कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल बिठाने की पहल की थी, लेकिन कांग्रेस की ओर से अकेले ही मैदान में उतरने के फैसले के चलते यह कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी। खास बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा तब की जब कांग्रेस पार्टी पहले ही अपने प्रत्याशियों के नामों का एलान कर चुकी थी।

सीटों के लेन-देन को लेकर सामने आए दावे

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस ने उपचुनाव के समीकरणों को साधने के लिए कांग्रेस से संपर्क साधा था। योजना के तहत यह प्रस्ताव रखा गया था कि नंदीग्राम सीट पर कांग्रेस अपने उम्मीदवार उतारेगी जबकि रेजीनगर सीट तृणमूल कांग्रेस के खाते में रहेगी। हालांकि, कांग्रेस के प्रदेश संगठन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी इस प्रस्ताव पर राजी नहीं हुई क्योंकि वह राज्य स्तर पर अपना खोया हुआ आधार फिर से मजबूत करने की प्रक्रिया में जुटी है और इस वक्त किसी भी तरह का गठबंधन इस रणनीति को कमजोर कर सकता है। इसी को लेकर दोनों दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है और एक-दूसरे पर राजनीतिक स्वार्थ के आरोप लगाए जा रहे हैं।

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कांग्रेस नेताओं के तीखे बयान और पुरानी बातें

यह पूरा घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही उस रणनीति से अलग नजर आता है, जिसमें पार्टी यह दावा करती रही है कि वह पश्चिम बंगाल में अकेले ही भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने में पूरी तरह सक्षम है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने सार्वजनिक तौर पर दावा किया कि ममता बनर्जी के खेमे से जुड़े एक प्रतिनिधि ने करीब पंद्रह दिन पहले नई दिल्ली में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से मुलाकात कर यह प्रस्ताव रखा था कि नंदीग्राम सीट कांग्रेस लड़े और रेजीनगर सीट तृणमूल के पास रहे।

प्रदीप भट्टाचार्य ने अपनी बात रखते हुए कहा, "प्रस्ताव यह था कि तृणमूल कांग्रेस रेजीनगर से चुनाव लड़ेगी और नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ देगी।" उन्होंने यह भी बताया कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस मामले पर वक्त मांगा और बाद में प्रांतीय नेताओं के साथ इस पर गहन चर्चा की। प्रदेश इकाई का साफ मानना था कि गठबंधन के लिए यह सही वक्त नहीं है और भविष्य में उचित समय आने पर इस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना ही बेहतर फैसला है। कांग्रेस के प्रांतीय प्रवक्ता सुमन रॉय चौधरी ने भी इस बात की पुष्टि की कि सीटों के तालमेल का यह प्रस्ताव तृणमूल कांग्रेस की तरफ से ही आया था।

सुमन रॉय चौधरी ने आगे जोड़ते हुए कहा कि जब तृणमूल सत्ता में मजबूत स्थिति में थी, तब उसने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया था, जबकि उस वक्त भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने की बहुत अधिक संभावना थी। अब जब पार्टी अकेली पड़ चुकी है और पराजय का सामना कर रही है, तो उसे अचानक कांग्रेस के राजनीतिक महत्व का अहसास होने लगा है। कांग्रेस खेमे के एक अन्य नेता ने यह भी आरोप लगाया कि नंदीग्राम आज भी तृणमूल के लिए बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण सीट है, और यह प्रस्ताव देना इस बात का साफ प्रमाण है कि पार्टी वहां अपनी संभावित हार को भांप चुकी है।

तृणमूल का खंडन और विपक्षी खेमे में असमंजस

दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस ने इन तमाम दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। जब इस कथित प्रस्ताव के बारे में पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष से पूछा गया, तो उन्होंने इसे नकार दिया। इसके अलावा तृणमूल के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने इस पर कोई भी विस्तृत टिप्पणी करने से मना कर दिया, लेकिन यह जरूर कहा कि इस तरह के बयानों और आपसी खींचतान का फायदा केवल भारतीय जनता पार्टी को ही मिलेगा। कांग्रेस और तृणमूल के इन विरोधी बयानों ने पश्चिम बंगाल के पहले से ही बिखरे हुए विपक्षी समीकरणों को और अधिक उलझा कर रख दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल, कांग्रेस और वाम दल भले ही विपक्षी गठबंधन इंडिया के घटक दल माने जाते हैं, लेकिन धरातल पर राज्य के चुनावों में वे लगातार एक-दूसरे के आमने-सामने चुनाव लड़ते आए हैं।

बदले हालात और उम्मीदवारों की सूची

प्रदीप भट्टाचार्य ने सवालिया लहजे में कहा कि जो तृणमूल कभी दावा करती थी कि वह अकेले ही भाजपा से लोहा ले सकती है, उसे आज अचानक कांग्रेस की मदद की दरकार क्यों पड़ रही है। उनके मुताबिक, तृणमूल के संगठनात्मक संकट और विधानसभा चुनावों में मिले झटके ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। भारतीय जनता पार्टी के हाथों पराजय मिलने और वर्तमान में तृणमूल के तीन अलग-अलग धड़ों में बंट जाने के कारण ही पार्टी को राज्य में कांग्रेस की ताकत का अहसास हुआ है।

राजनीतिक घटनाक्रम के तहत प्रमुख विपक्षी दलों में कांग्रेस ने सबसे पहले उपचुनाव के लिए अपने पत्ते खोले और 11 सितंबर को नंदीग्राम से मिलन प्रधान तथा रेजीनगर से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी को उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसके बाद वाम दलों ने भी अपने प्रत्याशियों के नाम सामने रख दिए। वहीं, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मुख्य तृणमूल दल ने बाद में नंदीग्राम सीट से संचिता प्रधान डे को टिकट दिया। इसके साथ ही ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी तृणमूल गुट ने भी चुनावी मैदान में कूदने का ऐलान कर दिया है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। अंत में भारतीय जनता पार्टी ने हसीरानी रथ को अपना उम्मीदवार बना दिया है। गौरतलब है कि 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों ही सीटों से चुनाव लड़ा था और दोनों पर जीत दर्ज की थी। बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण ही अब वहां उपचुनाव कराना पड़ रहा है।

सवाल-जवाब

पश्चिम बंगाल में उपचुनाव किन सीटों पर हो रहे हैं?
उपचुनाव मुख्य रूप से नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों के लिए हो रहे हैं।
कांग्रेस ने नंदीग्राम से किसे अपना उम्मीदवार बनाया है?
कांग्रेस ने नंदीग्राम सीट से मिलन प्रधान को अपना उम्मीदवार घोषित किया है।
तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम से किस उम्मीदवार को उतारा है?
टीएमसी ने नंदीग्राम सीट से संचिता प्रधान डे को मैदान में उतारा है।
नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव की मुख्य वजह क्या है?
शुभेंदु अधिकारी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर जीतने के बाद नंदीग्राम सीट से इस्तीफा दे दिया था, जिससे यह उपचुनाव कराना पड़ा।
प्रदीप भट्टाचार्य कौन हैं?
प्रदीप भट्टाचार्य कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·40 दिन पहले

राजनीतिक गठबंधन भी किसी भी अन्य मानवीय रिश्ते की तरह विश्वास, संवाद और सही समय पर निर्भर करते हैं। टीएमसी और कांग्रेस के बीच यह खींचतान साझेदारियों में परस्पर सम्मान और स्पष्ट सीमाओं की कमी को उजागर करती है। जब कोई एक पक्ष अपनी सुविधा के अनुसार तालमेल की पेशकश करता है और दूसरा अपनी खोई पहचान व आत्म-निर्भरता हासिल करना चाहता है, तो वहां तनातनी होना स्वाभाविक है। बिना गहरे भरोसे और पारदर्शी संचार के बनी चुनावी साझेदारियां लंबे समय तक नहीं टिकतीं। यदि दोनों दल दूरगामी संतुलन चाहते हैं, तो उन्हें आपसी दोषारोपण छोड़ संवाद के स्वस्थ तरीके अपनाने होंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·40 दिन पहले

उपचुनाव से पहले टीएमसी और कांग्रेस के बीच यह सियासी टकराव जमीनी स्तर पर तनाव बढ़ा सकता है। नंदीग्राम और रेजीनगर जैसी संवेदनशील सीटों पर दो बड़े राजनीतिक घटकों का आमने-सामने आना कानून-व्यवस्था के लिहाज से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। चुनावी प्रतिद्वंद्विता तीखी होने से स्थानीय स्तर पर राजनीतिक झड़पों और हिंसा की आशंका बनी रहती है। ऐसे में निष्पक्ष व शांतिपूर्ण मतदान कराने के लिए सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रशासन को निगरानी सख्त रखनी होगी, ताकि सार्वजनिक सुरक्षा बनी रहे और कोई गैर-कानूनी गतिविधि न पनपे।

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·40 दिन पहले

करण की बात बिल्कुल सटीक है। जमीनी स्तर पर इस सियासी खींचतान का सीधा असर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता और चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा। इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख घटकों का यूं आमने-सामने आना यह दर्शाता है कि राज्य स्तर पर राजनीतिक जमीन बचाना केंद्रीय गठबंधन की मजबूरियों पर भारी पड़ रहा है। टीएमसी द्वारा सीट-बंटवारे की पहल करना वोटों के बिखराव को रोकने की रणनीति थी, जबकि कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला यह संकेत देता है कि वह बंगाल में अपना कैडर और खोया आधार वापस पाने के लिए किसी समझौते के मूड में नहीं है। दो बड़े गैर-भाजपा दलों के बीच वोटों का यह विभाजन अंततः भाजपा के लिए चुनावी रास्ते आसान कर सकता है और भविष्य के गठबंधनों की राह को और मुश्किल बनाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·40 दिन पहले

क्षेत्रीय राजनीति और चुनावी समीकरणों के नजरिए से देखा जाए तो यह घटनाक्रम विपक्षी गठबंधन के भीतर प्रांतीय स्तर पर मौजूद गहरा विरोधाभास उजागर करता है। राज्य में अकेले लड़ने का दावा करने वाली तृणमूल कांग्रेस द्वारा नंदीग्राम जैसी साख की लड़ाई वाली सीट पर कांग्रेस को साधने की कोशिश एक बड़ी रणनीतिक तब्दीली का संकेत देती है। वहीं, कांग्रेस का अकेले मैदान में उतरने का फैसला यह दिखाता है कि वह अपने जमीनी कैडर को जिंदा रखने के लिए अब छोटे-मोटे समझौते करने के मूड में नहीं है। इस जुबानी जंग और खींचतान का सीधा असर उपचुनाव के नतीजों पर पड़ेगा, जहां वोटों का बिखराव त्रिकोणीय मुकाबले को जन्म देगा।

Ravikash Gupta@ravikash·40 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह ध्यान देना ज़रूरी है कि राजनीतिक अनिश्चितता का यह माहौल केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राज्य के नीतिगत और आर्थिक माहौल को भी प्रभावित करता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस का यह टकराव विपक्षी खेमे के भीतर भरोसे की कमी को दर्शाता है। यदि वोटों के बिखराव से राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो आगामी राज्य विधान सभा सत्रों और विकास परियोजनाओं के आवंटन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। बाज़ार और निवेशक भी राज्य में राजनीतिक स्थिरता पर नज़र बनाए रखते हैं; ऐसे में प्रांतीय स्तर की यह खींचतान क्षेत्रीय शासन और प्रशासनिक निरंतरता के लिहाज़ से एक अहम संकेत है।

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