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9 अगस्त 1947: जब एक हिंदू कवि के आगे झुके मोहम्मद अली जिन्ना, जानिए अमृतसर क्यों सुलग रहा थापंजाब
9 अग॰ 2026, 8:01 pm (6 घंटे पहले)· 0

9 अगस्त 1947: जब एक हिंदू कवि के आगे झुके मोहम्मद अली जिन्ना, जानिए अमृतसर क्यों सुलग रहा था

आजादी से छह दिन पहले नौ अगस्त 1947 के दिन देश के कई हिस्सों में हिंसा भड़की थी, जबकि मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान का कौमी तराना लिखने के लिए एक हिंदू कवि को चुना था।

नौ अगस्त 1947 का दिन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में एक ऐसा मोड़ था जब स्वतंत्रता की दहलीज पर जश्न के बजाय गहरी आशंका और हिंसा का साया मंडरा रहा था। देश के विभाजन की प्रक्रिया अपने अंतिम चरणों में थी और इस बीच पंजाब के विभिन्न इलाकों में सांप्रदायिक तनाव इस हद तक बढ़ चुका था कि मानवता शर्मसार हो रही थी। एक तरफ जहां पाकिस्तान नामक नए राष्ट्र के गठन की औपचारिक तैयारियां तेजी से चल रही थीं, वहीं दूसरी तरफ अमृतसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में लगातार खून बह रहा था। इस बेहद तनावपूर्ण और सुलगते माहौल के बीच पाकिस्तान के होने वाले पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना अपने आवास पर बैठकर नए देश के भविष्य और उसकी रूपरेखा पर विचार कर रहे थे। उस समय तक न तो पाकिस्तान के पास कोई आधिकारिक कौमी तराना था और न ही इस विषय पर कोई गंभीर या ठोस चर्चा शुरू हुई थी। अचानक मोहम्मद अली जिन्ना के मन में एक युवा पंजाबी हिंदू कवि का ख्याल आया, जिनका नाम जगन्नाथ आजाद था।

मोहम्मद अली जिन्ना की पसंद और जगन्नाथ आजाद

मोहम्मद अली जिन्ना पहले से ही जगन्नाथ आजाद की उर्दू शायरी के गहरे प्रशंसक थे और उन्हें लगता था कि वे नए मुल्क के लिए एक बेहतरीन नज्म तैयार कर सकते हैं। हालांकि एक पल के लिए उनके मन में यह विचार भी आया कि क्या किसी हिंदू से पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखवाना उचित होगा, लेकिन उन्होंने इस संकोच को तुरंत दरकिनार कर दिया क्योंकि उस वक्त उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता एक उम्दा और प्रभावशाली रचना हासिल करना थी। जगन्नाथ आजाद को तुरंत मोहम्मद अली जिन्ना के बंगले पर तलब किया गया और वे निर्धारित समय से काफी पहले ही वहां पहुंच गए। जब जिन्ना ने उन्हें अपने सामने देखा तो वे कुछ क्षणों के लिए आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि इतनी शानदार और उच्च कोटि की उर्दू लिखने वाला कोई अनुभवी और उम्रदराज शायर होगा, जबकि उनके सामने बमुश्किल तीस साल का एक युवा खड़ा था। मोहम्मद अली जिन्ना ने उनसे पाकिस्तान के कौमी तराने के लिए एक नज्म लिखने का अनुरोध किया और उस वक्त जगन्नाथ आजाद के पास कोई पहले से तैयार कविता नहीं थी। उन्होंने अपनी कल्पना और तात्कालिक प्रेरणा से कुछ पंक्तियां सुनाईं जिन्हें सुनकर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि बस यही चाहिए था मुझे। इस प्रकार पाकिस्तान के शुरुआती दौर का आधिकारिक तराना रचने की जिम्मेदारी एक पंजाबी हिंदू कवि के कंधों पर आ गई।

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महात्मा गांधी का कलकत्ता आगमन और शांति की कोशिशें

नौ अगस्त 1947 को महात्मा गांधी नोआखली की अपनी यात्रा के क्रम में कलकत्ता पहुंचे और सोदपुर आश्रम में विश्राम किया। उस कालखंड में कलकत्ता भी गंभीर हिंदू-मुस्लिम तनाव और हिंसा की विभीषिका से अछूता नहीं था और वहां भी लगातार खतरे के बादल मंडरा रहे थे। महात्मा गांधी का यह दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का उत्सव तभी वास्तविक अर्थों में सार्थक हो सकता है जब देश के आम नागरिक शांति और सौहार्द के साथ जीवनयापन कर सकें। उन्होंने तमाम राजनीतिक गतिविधियों और आयोजनों से कहीं अधिक महत्व सांप्रदायिक सद्भाव को दिया और कलकत्ता की सड़कों तथा बस्तियों में जाकर लोगों के बीच शांति स्थापित करने के लिए अथक प्रयास शुरू कर दिए।

शरणार्थियों का भारी सैलाब और रेलवे स्टेशनों के हालात

विभाजन की आसन्न अनिश्चितता और खौफ के साए में हजारों की संख्या में लोगों ने अपने पुश्तैनी घरों को अलविदा कहना शुरू कर दिया था और वे सुरक्षित स्थानों की तलाश में पलायन कर रहे थे। देश के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर शरणार्थियों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा था और लोग अपना थोड़ा-बहुत सामान तथा छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे ट्रेन या किसी अन्य साधन का इंतजार करने को मजबूर थे। जमीनी हालात इतने अधिक भयावह और अनियंत्रित हो चुके थे कि शरणार्थियों को सुरक्षित रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए रेलवे मार्गों और चलने वाली गाड़ियों पर अतिरिक्त सैन्य सुरक्षा बल तैनात करने की सख्त आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी।

जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के बीच पत्राचार

भारत और पाकिस्तान के औपचारिक जन्म में अब गिने-चुने दिन ही शेष बचे थे और दोनों ही सीमाओं के भीतर भड़की हुई हिंसा को रोकना उस समय की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती बन गया था। बिगड़ती हुई परिस्थितियों के मद्देनजर नौ अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक पत्र प्रेषित किया। इस महत्वपूर्ण पत्र के माध्यम से उन्होंने पश्चिमी पंजाब के सुलगते और गंभीर हालातों पर गहरी चिंता व्यक्त की थी और साथ ही वहां से गुजरने वाले शरणार्थियों की सुरक्षा तथा उनकी सुरक्षित आवाजाही के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।

कराची में मुस्लिम लीग की प्रशासनिक गतिविधियां

पाकिस्तान के आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आने से ठीक कुछ दिन पहले कराची शहर में मुस्लिम लीग की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच चुकी थीं। नए राष्ट्र की प्रशासनिक संरचना और उसकी संवैधानिक व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए लगातार उच्च स्तर की बैठकें और विचार-विमर्श किए जा रहे थे। पाकिस्तान की संविधान सभा भी अपने शुरुआती दौर के विधायी और प्रशासनिक कामकाज को संभालने की तैयारियों में जुटी हुई थी। सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की निर्धारित तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही थी, मुस्लिम लीग के नेतृत्व के सामने एक बिल्कुल नए और विशाल देश की शासन व्यवस्था को शून्य से खड़ा करने की भारी जिम्मेदारी आन पड़ी थी।

पंजाब में प्रेस पर सेंसरशिप का कड़ा शिकंजा

लाहौर में बैठे पंजाब के गवर्नर ईवॉन मेरेडिथ जेनर्किस को जैसे ही अमृतसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में भड़के भीषण दंगों और हिंसक घटनाओं की सूचना मिली, उन्होंने पूरे पंजाब प्रांत में सख्त प्रेस सेंसरशिप लागू करने का फरमान जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप नौ अगस्त को अमृतसर में हुई भयंकर हिंसा और उसमें हुए भारी रक्तपात की कोई भी खबर अगले दिन पंजाब के किसी भी समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं हो सकी। ब्रिटिश प्रशासन का यह दमनकारी निर्णय केवल खबरों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य जमीनी हिंसा की खौफनाक सच्चाई को आम जनता की नजरों से पूरी तरह छिपाना था।

रैडक्लिफ सीमा आयोग का अंतिम चरण और नक्शों का निर्धारण

नौ अगस्त 1947 तक भारत और पाकिस्तान के बीच की नई भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करने वाले रैडक्लिफ सीमा आयोग का कार्य अपने निर्णायक और अंतिम दौर में पहुंच चुका था। पंजाब और बंगाल जैसे बड़े प्रांतों के विभाजन की अत्यंत संवेदनशील और जटिल जिम्मेदारी सर सिरिल रैडक्लिफ को सौंपी गई थी। इस आयोग के फैसलों का असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ने वाला था और उनकी पूरी दुनिया बदलने वाली थी। हालांकि सीमाओं का औपचारिक और सार्वजनिक ऐलान सत्रह अगस्त को किया गया, लेकिन नौ अगस्त तक नक्शों को अंतिम रूप देने और सीमा रेखाओं को स्पष्ट करने की प्रक्रिया लगभग पूरी की जा चुकी थी।

पांडिचेरी में फ्रांसीसी शासन के खिलाफ तेज हुआ विरोध

नौ अगस्त 1947 के ही दिन पांडिचेरी में फ्रांसीसी आधिपत्य से पूर्ण मुक्ति पाने और भारत गणराज्य में अपने विलय की मांग ने एक बार फिर जोरदार रूप ले लिया। फ्रेंच इंडिया स्टूडेंट्स कांग्रेस और विभिन्न स्थानीय संगठनों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की मुकम्मल तैयारियां की थीं। स्थानीय प्रशासन ने किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सभाओं और रैलियों के आयोजन पर कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, लेकिन इसके बावजूद छात्र, कामगार और आम नागरिक सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को प्रशासनिक हिरासत में भी लिया गया। मजदूरों द्वारा की गई सुनियोजित हड़तालों ने फ्रांसीसी हुक्मरानों के खिलाफ लगातार बढ़ते जा रहे जनदबाव को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था।

ध्रांगध्रा रियासत का भारत संघ में विलय का निर्णय

सौराष्ट्र क्षेत्र की ध्रांगध्रा रियासत के भारत संघ में ऐतिहासिक विलय को लेकर देश के गृहमंत्री सरदार पटेल और वीपी मेनन के साथ चल रही बातचीत अब अपने अंतिम और निर्णायक पड़ाव पर पहुंच चुकी थी। देश के तेजी से बदलते हुए राजनीतिक परिदृश्य और हालातों का आकलन करते हुए ध्रांगध्रा रियासत के महाराजा श्रीराज ने अंततः भारत के साथ जुड़ने का महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया।

सवाल-जवाब

9 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का तराना लिखने के लिए किसे चुना गया था?
मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान का शुरुआती कौमी तराना लिखने के लिए युवा पंजाबी हिंदू कवि जगन्नाथ आजाद को चुना था।
नौ अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कहां पहुंचे थे?
महात्मा गांधी नोआखली जाने के क्रम में नौ अगस्त 1947 को कलकत्ता पहुंचे थे और सोदपुर आश्रम में ठहरे थे।
जवाहरलाल नेहरू ने नौ अगस्त 1947 को किसे पत्र लिखा था?
जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखकर पश्चिमी पंजाब के हालातों पर चिंता जताई थी।
पंजाब में प्रेस सेंसरशिप किसने लागू की थी?
पंजाब के गवर्नर ईवॉन मेरेडिथ जेनर्किस ने अमृतसर और आसपास के इलाकों में हिंसा की खबरों के बाद पूरे पंजाब में प्रेस सेंसरशिप लागू की थी।
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