उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ धाम की यात्रा हर श्रद्धालु के लिए बेहद पावन मानी जाती है, लेकिन राजस्थान के शेखावाटी अंचल में भी आस्था का एक ऐसा ही दिव्य केंद्र स्थापित है। झुंझुनूं जिले में टीटनवाड़ ग्राम पंचायत के अंतर्गत महला की ढाणी के समीप अनोखला की ढाणी में भगवान बद्रीनाथ का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस पावन स्थल का इतिहास लगभग 700 वर्ष पुराना माना जाता है। उत्तरकाशी के राजा सूर्यमल की श्रद्धा से जुड़ा यह तीर्थ आज पूरे क्षेत्र में श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
राजा सूर्यमल की भक्ति और मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार उत्तरकाशी के शासक राजा सूर्यमल भगवान बद्रीनाथ के अनन्य उपासक थे। वे हर साल अक्षय तृतीया यानी आखातीज के पावन पर्व पर पूजा-अर्चना के लिए उत्तराखंड के चमोली स्थित मुख्य धाम पहुंचते थे। करीब सात सौ साल पहले राजा सूर्यमल राजस्थान के लोहार्गल तीर्थ की यात्रा पर आए हुए थे। लोहार्गल से वापसी के दौरान आखातीज की तिथि आ गई। भौगोलिक दूरियों और समय के अभाव के कारण वे तय समय पर चमोली स्थित धाम तक नहीं पहुंच पा रहे थे।
अपनी नियमित पूजा और संकल्प के टूटने की आशंका से व्याकुल होकर राजा ने अनोखला की ढाणी के पास अपना पड़ाव डाला। भगवान के प्रति उनकी अगाध निष्ठा ऐसी थी कि उन्होंने उसी ठहराव स्थल पर प्रभु का एक छोटा मंदिर निर्मित कराया। आखातीज के शुभ दिन उन्होंने विधि-विधान से भगवान बद्रीनाथ की आराधना की। उसी ऐतिहासिक घटना के बाद से इस स्थान पर प्रतिवर्ष आखातीज पर भगवान बद्रीनाथ की पूजा-अर्चना की अटूट परंपरा निरंतर चली आ रही है।
साल 2008 में पुनर्निर्माण और भव्य धाम का स्वरूप
शुरुआती दौर में यह एक सामान्य और लघु मंदिर के रूप में जाना जाता था। कालान्तर में इस स्थल की आध्यात्मिक महत्ता आसपास के इलाकों में फैलती गई। स्थानीय ढाणी निवासी बालूराम की भगवान बद्रीनाथ में गहरी आस्था थी। अपने पिता की इसी श्रद्धा को सम्मान देते हुए उनके पुत्र मामराज सोहू ने वर्ष 2008 में इस मंदिर के जीर्णोद्धार और भव्य पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया।
लगभग दो वर्षों तक लगातार निर्माण कार्य चलने के बाद वर्ष 2010 में मंदिर को विशाल एवं भव्य रूप प्रदान किया गया। इसी वर्ष यहां वैदिक मंत्रोच्चार के साथ नवीन विग्रहों की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न कराई गई। बद्रीनाथ धाम की वास्तुकला और धार्मिक स्वरूप पर आधारित होने के कारण इस पावन स्थल को स्थानीय स्तर पर देश के दूसरे बद्रीनाथ धाम के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।
केरल से लाई गईं देव प्रतिमाएं और नंबूदरी पूजा पद्धति
मंदिर का गर्भगृह धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद अनूठा है। यहां मुख्य वेदी पर भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमा सुशोभित है। मुख्य विग्रह के साथ नर-नारायण, उद्धव, गरुड़, देवर्षि नारद और धनपति कुबेर की भव्य प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठापित हैं। इन समस्त प्रतिमाओं की सामूहिक रूप से बद्रीश पंचायत के रूप में उपासना की जाती है।
मंदिर में स्थापित इन अलौकिक विग्रहों को विशेष रूप से केरल के पारंपरिक शिल्पकारों से तैयार करवाकर यहां मंगवाया गया था। बद्रीनाथ धाम की मूल पूजा परंपरा को बनाए रखने के लिए आखातीज के पर्व पर केरल से आने वाले नंबूदरी ब्राह्मण यहां विशेष अनुष्ठान और पारंपरिक पूजा-अर्चना संपन्न करते हैं। इस पद्धति के चलते मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण उत्तराखंड के मूल धाम जैसा अनुभव कराता है।
वार्षिक मेला, खेल प्रतियोगिताएं और नोख के पूजनीय वृक्ष
अनोखला की ढाणी में आखातीज का पर्व वर्ष का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव होता है। इस अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं और प्रांगण के बाहर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में शेखावाटी और आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की तादाद में श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं। इस दौरान युवाओं और ग्रामीणों के लिए विभिन्न पारंपरिक खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।
मंदिर परिसर के बाहर बने जोहड़ के तट पर नोख के बेहद प्राचीन वृक्ष खड़े हैं, जो जनमानस की आस्था से गहरे जुड़े हुए हैं। ग्रामीण इन वृक्षों को अत्यंत पवित्र और पूजनीय मानते हैं। स्थानीय परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के अनूठे नियम के तहत इन प्राचीन पेड़ों को कभी काटा नहीं जाता और न ही इनकी लकड़ियों का किसी घरेलू या व्यावसायिक कार्य में उपयोग किया जाता है।
नवलगढ़ का बद्रीनारायण मंदिर: साल में केवल एक दिन खुलते हैं पट
शेखावाटी की पावन धरा पर भगवान बद्रीनाथ से जुड़ी एक और दुर्लभ परंपरा नवलगढ़ कस्बे में जीवंत है। कस्बे में रामदेवजी मंदिर के पास स्थित भगवान बद्रीनारायण के मंदिर के कपाट साल भर में केवल एक बार ही खोले जाते हैं। अक्षय तृतीया के दिन ही श्रद्धालु इस मंदिर में प्रवेश पा सकते हैं, जबकि वर्ष के शेष 364 दिन मंदिर के पट पूरी तरह बंद रखे जाते हैं।
इस मंदिर में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप की आराधना की जाती है। मंदिर के महंत मातादीन शर्मा के अनुसार इस देवस्थान की नींव सैकड़ों साल पहले रखी गई थी। उनके पूर्वजों ने उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम की मान्य पूजा पद्धति को अपनाते हुए इस परंपरा की शुरुआत की थी, जिसे वर्तमान पीढ़ी भी पूरी निष्ठा से निभा रही है। जहां अनोखला की ढाणी में राजा की अनन्य भक्ति ने एक धाम का रूप लिया, वहीं नवलगढ़ में साल में केवल एक बार खुलने वाले पट भक्तों के अटूट विश्वास का प्रतीक बने हुए हैं।























