राजस्थान के अलवर जिले में स्थित प्रमुख पर्यटन केंद्र सिलीसेढ़ झील से एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है। अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए पहचानी जाने वाली इस ऐतिहासिक जल संरचना में अचानक भारी संख्या में मछलियां मृत पाई गई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान समय में झील में लगभग 27 फीट गहरा पानी भरा हुआ है, इसके बावजूद इतनी बड़ी तादाद में जलीय जीवों का दम घुट रहा है। पानी की ऊपरी सतह पर तैरती बेजान मछलियों को साफ देखा जा सकता है, जिससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया है और वहां पहुंचे लोगों में भारी असंतोष देखने को मिल रहा है।
सड़ांध और दुर्गंध से किनारे रुकना हुआ दूभर
झील के भीतर बड़े पैमाने पर मछलियों के सड़ने की वजह से पूरे वातावरण में भीषण दुर्गंध फैल गई है। पानी से उठने वाली सड़ांध इतनी तीखी और असहनीय हो चुकी है कि तट के समीप कुछ मिनट भी खड़े रहना आम लोगों के लिए चुनौती बन गया है। सिलीसेढ़ झील में नौकायन का आनंद लेने और प्राकृतिक छटा को निहारने पहुंचे लोगों का उत्साह पूरी तरह फीका पड़ चुका है। दुर्गंध के भयावह स्तर को देखते हुए लोग झील तक पहुंचने के बाद भी दूर से ही वापस अपने घरों की तरफ लौटने पर विवश हैं।
पड़ोसी राज्यों से पहुंचे सैलानियों के अरमानों पर फिरा पानी
अलवर की यह झील केवल स्थानीय नागरिकों के बीच ही नहीं, बल्कि पड़ोसी क्षेत्रों के निवासियों के लिए भी एक लोकप्रिय वीकेंड डेस्टिनेशन मानी जाती है। दिल्ली, गुरुग्राम और हरियाणा के विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में लोग इंटरनेट पर सिलीसेढ़ की मोहक तस्वीरें देखकर यहां सुकून के पल बिताने खिंचे चले आते हैं। इस बार जब वे मौके पर पहुंचे, तो चारों तरफ तैरती मरी हुई मछलियां और हवा में फैली असहनीय बदबू देखकर उनका पूरा भ्रमण खराब हो गया। आगंतुकों का कहना है कि वे परिवार के साथ सुकून तलाशने आए थे, लेकिन यहां की बदहाली ने उन्हें बेहद आहत किया है। कई लोगों ने आगाह किया है कि अगर व्यवस्था में तत्काल सुधार नहीं हुआ और झील के पानी की पड़ताल नहीं करवाई गई, तो अलवर के पर्यटन उद्योग को गंभीर नुकसान झेलना पड़ेगा।
होटलों के दूषित अपशिष्ट को बताया जा रहा जिम्मेदार
इस अप्रत्याशित त्रासदी को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और झील से जुड़े बाशिंदों ने कड़े आरोप लगाए हैं। क्षेत्रवासियों का कहना है कि झील के निकटवर्ती इलाकों में संचालित व्यावसायिक होटलों से निकलने वाला गंदा नाला बिना किसी शोधन प्रक्रिया के सीधे झील में बहाया जा रहा है। लोगों का मानना है कि रसायनों से युक्त इस गंदे पानी के अनवरत प्रवाह की वजह से झील का जल विषैला हो चुका है, जिसके चलते पानी में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा खतरनाक स्तर तक घट गई और मछलियों ने दम तोड़ दिया। दूसरी तरफ, प्रशासनिक अमले का कहना है कि मौत के सटीक और आधिकारिक कारणों की पुष्टि तभी हो पाएगी जब पानी के नमूनों की प्रयोगशाला में विस्तृत जांच पूरी होगी।
सिंचाई विभाग और स्थानीय प्रशासन से त्वरित कदम उठाने की अपील
झील की इस दयनीय स्थिति को देखकर पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय निवासियों में जबर्दस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों और जिला प्रशासन से इस मामले में फौरन सख्त कदम उठाने का आग्रह किया है। लोगों ने तीन प्रमुख मांगें उठाई हैं: पहली यह कि पानी के नमूनों को तुरंत लैब भेजकर जांच कराई जाए, दूसरी यह कि वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों से झील में गिर रहे गंदे पानी के रास्तों को फौरन बंद किया जाए, और तीसरी यह कि पानी की सतह पर तैर रही मरी मछलियों को जल्द से जल्द बाहर निकाला जाए। स्थानीय लोगों ने आगाह किया है कि यदि मृत मछलियों को शीघ्र नहीं हटाया गया, तो दुर्गंध से आसपास की बस्तियों में संक्रामक बीमारियों और महामारी का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

















