राजस्थान के नागौर जिले में रबी के मौसम के दौरान ईसबगोल को एक प्रमुख नकदी फसल के रूप में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। कम पानी में पककर तैयार हो जाने वाली यह फसल स्थानीय किसानों के बीच खासी लोकप्रिय है। इस फसल की असली व्यवसायिक ताकत इसकी भूसी में निहित है, जिसकी मांग बाजार में निरंतर बनी रहती है। फसल से भरपूर उत्पादन और बेहतर मुनाफा लेने के लिए बुवाई की समय सारणी, खेत की तैयारी, बीज का चयन और सिंचाई के तौर-तरीकों पर विशेष सावधानी बरतना जरूरी होता है। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार इन बुनियादी पहलुओं पर दिया गया ध्यान ही फसल का अंतिम परिणाम तय करता है।
बुवाई का सही वक्त और तापमान का महत्व
ईसबगोल की खेती में बुवाई का सही समय चुनना सबसे पहला और निर्णायक कदम माना जाता है। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के मुताबिक इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर पूरे नवंबर माह के बीच कर लेनी चाहिए। यदि किसान बहुत जल्दबाजी में बुवाई करते हैं, तो उस दौरान वातावरण का अधिक तापमान बीजों के अंकुरण, पौधों के शुरुआती विकास और पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वहीं दूसरी तरफ, बुवाई में अत्यधिक देरी करने से फसल का जीवन चक्र असंतुलित हो जाता है और पैदावार में गिरावट आ सकती है। स्थानीय मौसम के मिजाज को भांपते हुए अनुकूल तापमान में बुवाई करने से अंकुरण बेहद सुचारु और मजबूत होता है।
मिट्टी का चुनाव और खेत तैयार करने का तरीका
ईसबगोल की बढ़िया फसल लेने के लिए जमीन का चयन सही होना चाहिए। इसके लिए हल्की, दोमट अथवा बलुई दोमट मिट्टी सबसे मुफीद मानी जाती है। खेत की मिट्टी में जलभराव की समस्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। यदि खेत में पानी निकासी का समुचित प्रबंध न हो और पानी ठहर जाए, तो पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और तरह-तरह के रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। बुवाई से पूर्व खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही खेत को पाटा लगाकर पूरी तरह समतल कर लेना चाहिए, जिससे सिंचाई का पानी और नमी पूरे खेत में एक समान रूप से फैल सके।
प्रमाणित बीज और कतारों में बुवाई की विधि
ईसबगोल का बीज आकार में अत्यंत सूक्ष्म और छोटा होता है, इसलिए बुवाई के समय इसकी गहराई का खास ख्याल रखना पड़ता है। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह ने स्पष्ट किया है कि बीज को जमीन में बहुत अधिक गहराई पर नहीं दबाना चाहिए, अन्यथा अंकुरण प्रभावित हो सकता है। किसानों को हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीजों का ही चयन करना चाहिए। छिटकवां विधि की जगह कतारों में बुवाई करना ज्यादा फायदेमंद रहता है। कतार विधि अपनाने से पौधों के बीच जरूरी फासला बना रहता है, धूप और हवा का आवागमन ठीक रहता है तथा बाद में निराई-गुड़ाई करने में सहूलियत मिलती है।
सिंचाई प्रबंधन और अतिरिक्त पानी से बचाव
यह फसल सीमित पानी की आवश्यकता के लिए जानी जाती है, इसलिए इसमें सिंचाई का प्रबंधन अत्यंत सावधानीपूर्वक करना पड़ता है। खेत में जरूरत के हिसाब से केवल हल्की सिंचाई ही की जानी चाहिए। खेत में जरूरत से ज्यादा पानी छोड़ना या पानी को लंबे समय तक जमा रहने देना फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इसके विपरीत, जब फसल में फूल खिल रहे हों और दाना बनने की प्रक्रिया चल रही हो, तब मिट्टी में पर्याप्त नमी होना अनिवार्य है। यदि इस नाजुक मोड़ पर पानी की कमी हो जाए तो उत्पादन घट जाता है। इसलिए मौसम और जमीन की नमी को देखकर ही पानी देना चाहिए।
खरपतवार की रोकथाम और पौधों की निगरानी
फसल के शुरुआती दिनों में खेत के भीतर खरपतवार बहुत तेजी से पनपने लगते हैं। ये अवांछित पौधे मुख्य फसल के साथ जमीन की नमी, खाद और पोषक तत्वों को लेकर होड़ करने लगते हैं, जिससे ईसबगोल के पौधों का विकास थम जाता है। इस समस्या से बचने के लिए समय रहते खुरपी से निराई-गुड़ाई कर खेत को पूरी तरह खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। किसानों को अपनी फसल की हर रोज निगरानी करनी चाहिए। यदि पत्तियों अथवा तनों पर किसी प्रकार का असामान्य लक्षण या बीमारी दिखे, तो बिना सोचे-समझे रासायनिक दवाएं छिड़कने के बजाय तुरंत कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।
परिपक्वता की पहचान, कटाई और भंडारण
यदि मौसम का साथ मिले और सभी परिस्थितियां अनुकूल रहें, तो ईसबगोल की फसल लगभग 110 से 130 दिनों के भीतर पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब पौधे सूखने लगें और उनकी बालियों का रंग बदलने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि फसल पक चुकी है। इस समय कटाई में कतई देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि देर करने पर पके हुए बीज जमीन पर झड़ने लगते हैं जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। कटाई के उपरांत बालियों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर बीजों को अलग किया जाता है। बीजों की समुचित सफाई और सुरक्षित भंडारण से ही उनकी बाजार गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है।




















