राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर के बाजारों में इन दिनों एक खास किस्म की महक राहगीरों को अपनी ओर खींच रही है। थार के रेगिस्तानी इलाके में यह मिठास स्थानीय पारंपरिक व्यंजनों की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की पारंपरिक मिठाई पंचमेवा की है। सरहदी बाड़मेर में इस पारंपरिक मिष्ठान ने जबरदस्त पहचान बनाई है। सड़क किनारे सजे ठेले से उठती सोंधी खुशबू के कारण लोग खुद-ब-खुद वहां पहुंच रहे हैं और इस अनूठे स्वाद को चख रहे हैं। काजू और बादाम जैसे मेवों से तैयार होने के बावजूद इसका दाम सामान्य व्यक्ति की पहुंच में होना इसकी लोकप्रियता की सबसे अहम वजह बनकर उभरा है।
बरेली से बाड़मेर तक स्वाद का सफर
बाड़मेर की गलियों में उत्तर प्रदेश की यह सौगात पहुंचाने के पीछे बरेली के रहने वाले कारीगर फूल सिंह और उनके सहयोगी हैं। फूल सिंह के साथ इस काम में धर्मवीर और विपिन भी पूरी निष्ठा से हाथ बंटा रहे हैं। अपना गृह राज्य छोड़कर राजस्थान के इस पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में पहुंचे ये कारीगर अपनी पाक कला के जरिए लोगों के दिलों में जगह बना रहे हैं। सड़क से गुजरने वाले नागरिक जब ताजी तैयार हो रही मिठाई की खुशबू महसूस करते हैं, तो वे कदम रोककर ठेले की तरफ मुड़ जाते हैं।
सेहत और स्वाद का बेहतरीन संगम
इस पंचमेवा की खासियत इसमें इस्तेमाल की जाने वाली शुद्ध और पौष्टिक सामग्री है। इसे बनाने में बारीक पिसा नारियल का बुरादा, पौष्टिक सिंघाड़ा, काजू, बादाम, चीनी और महकती इलायची का भरपूर प्रयोग किया जाता है। सूखे मेवों और नारियल के इस मेल से यह मिठाई न केवल स्वाद में लाजवाब बनती है, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी फायदेमंद मानी जाती है। ग्राहक इस मिठाई का आनंद मौके पर तो ले ही रहे हैं, साथ ही अपने घर-परिवार और बच्चों के लिए भी इसके पैकेट बंधवाकर ले जा रहे हैं। बाजार में सामान्य मिठाइयों के बढ़े हुए दामों के बीच यह पौष्टिक मेवा लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन गया है।
धीमी आंच पर ढाई घंटे की कड़ी मेहनत
कारीगर फूल सिंह का कहना है कि इस पंचमेवा को तैयार करना धैर्य और कौशल की मांग करता है। सामग्री के एक बैच को पूरी तरह तैयार होने में लगभग दो से ढाई घंटे का वक्त लगता है। प्रक्रिया के दौरान नारियल बुरादा, सिंघाड़े का आटा, काजू, बादाम, शक्कर और इलायची को एक तय मात्रा में मिलाया जाता है और फिर धीमी आंच पर पकाया जाता है। इस काम में शारीरिक मेहनत और समय दोनों अधिक लगते हैं, मगर पकने के बाद इसका जो स्वाद निकलकर आता है, वह खरीदारों का मन मोह लेता है। स्थानीय मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके ठेले से प्रतिदिन 50 से 60 किलो पंचमेवा हाथों-हाथ बिक जाता है।
किफायती दाम बना सबसे बड़ा आकर्षण
वर्तमान बाजार में सूखे मेवों विशेषकर काजू और बादाम की कीमतें काफी ऊपर चल रही हैं। इसके बावजूद बाड़मेर में यह पंचमेवा मात्र 200 रुपये प्रति किलो की दर से ग्राहकों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसी मुनासिब कीमत और उम्दा स्वाद की वजह से हर वर्ग का व्यक्ति इसे सहजता से खरीद पा रहा है। रेगिस्तानी शहर बाड़मेर में उत्तर प्रदेश के इस पारंपरिक स्वाद ने तेजी से अपनी धाक जमाई है और स्थानीय निवासी इस जायके की दिल खोलकर सराहना कर रहे हैं।





















