राजस्थान का धौलपुर इलाका ऐतिहासिक वैभव, कलात्मक पहचान और शौर्य गाथाओं के लिए अलग मुकाम रखता है, लेकिन इसकी एक बेहद खास पहचान सदियों से चली आ रही यहां की मिठास भरी स्थानीय बोली भी रही है। गांवों की चौपालों और घरों के आंगनों में पीढ़ियों से गूंजने वाले पारंपरिक शब्द अब धीरे-धीरे रोजमर्रा की बातचीत से गायब होते जा रहे हैं। समय के थपेड़ों और आधुनिकता की अंधी दौड़ के चलते जिस शब्दावली के बीच पिछली कई पीढ़ियां पली-बढ़ीं, वे शब्द आज के बच्चों और युवाओं के लिए अजनबी बन चुके हैं। गांव के बुजुर्गों की बातचीत में यह भाषाई धरोहर आज भी जीवित है, परंतु उनके बाद इस सांस्कृतिक विरासत को कौन सहेजेगा, यह सवाल भाषा प्रेमियों के मन में गहरी बेचैनी पैदा कर रहा है।
गांवों में अंग्रेजी का बढ़ता चलन और जड़ों से दूरी
बदलते वक्त के साथ ग्रामीण अंचलों का सामाजिक और शैक्षणिक ढांचा भी भारी बदलाव से गुजर रहा है। गांवों में अब अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है और पढ़ाई के तौर-तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। शहरीकरण के प्रभाव और करियर की दौड़ के कारण युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक जड़ों और स्थानीय बोली से कटती जा रही है। स्थानीय ग्रामीण विशंभर दयाल शर्मा इस स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर करते हैं। उनका कहना है कि आज अगर किसी को अपनी मिट्टी के पारंपरिक और ठेठ पुराने शब्द सुनने हों, तो उसे गांव की चौपाल पर जाकर बुजुर्गों की बैठकों में शामिल होना पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि युवा पीढ़ी का अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाएं सीखना समय की अनिवार्य मांग है और यह सकारात्मक भी है, लेकिन इस आधुनिकता के चक्कर में अपनी सबसे अनमोल मातृभाषा को पीछे छोड़ देना बेहद चिंताजनक है।
नई पीढ़ी के लिए पहेली बने रोजमर्रा के पारंपरिक शब्द
धौलपुर के बुजुर्ग अपनी सामान्य बातचीत में जिन ठेठ देशी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वे नई पीढ़ी के कानों में पड़ते ही अचरज पैदा करते हैं। बच्चे अक्सर इन शब्दों का मतलब अपने बड़ों से पूछते नजर आते हैं। पहले पानी पीने के पारंपरिक पात्र को ‘गडुआ’ कहा जाता था, जो अब प्रचलन से बाहर हो चुका है। इसी तरह मौसम के मिजाज को बयां करने के लिए गर्मियों की भीषण गर्म हवा या लू को ‘ताती ब्यार’ और सर्दियों की हाड़ कंपाने वाली ठंडी बयार को ‘चिरी ब्यार’ कहा जाता था। थोड़े से हिस्से या अंश के लिए ‘नेक’ और सामान्य वस्त्रों या कपड़ों को ‘ओढ़ना’ पुकारने का रिवाज था।
घरों की बनावट और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के नाम भी बेहद अनूठे रहे हैं। घर के सामने बने खुले बरामदे को ग्रामीण ‘तिवारो’ कहते थे, जबकि चेहरा देखने वाले आईने या दर्पण को ‘बट्टा’ कहा जाता था। कुएं से पानी खींचने में काम आने वाली मजबूत रस्सी को ‘लेजु’ और छोटी कटोरी को ‘बिलिया’ पुकारा जाता था। इसके अलावा पानी रखने के मिट्टी के बड़े मटके को ‘मथना’, मकान की दीवार को ‘भीत’ और नन्हे-मुन्ने बच्चों को प्यार से ‘मोडा-मोड़ी’ कहना आम बातचीत का स्वाभाविक हिस्सा था। आज ये सारे शब्द सामान्य जनजीवन से बेदखल होते दिख रहे हैं।
किताबों से गायब विरासत को सहेजने में परिवारों की भूमिका
चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि यह समृद्ध शब्दावली आधुनिक पाठ्यक्रम की किताबों या सोशल मीडिया के मंचों पर दर्ज नहीं है, बल्कि यह सिर्फ गांव के वृद्धजनों की स्मृतियों और उनकी आपसी बातचीत में ही सांस ले रही है। सबसे बड़ा अंदेशा यह है कि जैसे-जैसे पुरानी पीढ़ी विदा होगी, उनके साथ ये पारंपरिक शब्द भी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएंगे। विशंभर दयाल शर्मा जैसे प्रबुद्ध ग्रामीणों का मानना है कि बच्चों को आधुनिक तालीम, सूचना तकनीक और विदेशी भाषाओं का ज्ञान जरूर मिलना चाहिए, लेकिन अपनी मिट्टी, मातृभाषा और क्षेत्रीय बोली की उपेक्षा किसी कीमत पर नहीं होनी चाहिए। इस जिम्मेदारी को निभाने की पहली कड़ी परिवार ही हैं।
यदि घरों के बड़े-बुजुर्ग और माता-पिता अपने बच्चों से संवाद में इन पारंपरिक शब्दों का प्रयोग करें और उन्हें अपनी लोकभाषा के महत्व से परिचित कराएं, तभी यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक कड़ी आगे बढ़ सकेगी। धौलपुर के ग्रामीण परिवेश में यह भाषा आज भी अपनी अंतिम मजबूत सांसें बुजुर्गों के सहारे ले रही है। मौजूदा दौर की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि युवा पीढ़ी बुजुर्गों के पास बैठे, उनके शब्दों और भावों को समझे और अपनी इस अनमोल धरोहर को लुप्त होने से बचाए।

















