अरावली पर्वतमाला की गोद में बसे सीकर जिले के रैवासा गांव का ऐतिहासिक दिगंबर जैन जिनालय इन दिनों अपनी अद्भुत स्थापत्य छटा और नई स्वर्णिम आभा के कारण चर्चा के केंद्र में है। सदियों पुराने इस धार्मिक स्थल के गर्भगृह, भीतरी दीवारों और नक्काशीदार खंभों पर भव्य गोल्डन वर्क किया गया है। मंदिर में प्रवेश करते ही पत्थर की बारीक नक्काशी पर पड़ने वाली रोशनी सुनहरी चमक बिखेरती है, जिससे पूरा परिसर किसी स्वर्ण मंदिर की भांति दमकने लगता है। कलात्मक नक्काशी और आध्यात्मिक शांति का यह मेल दर्शनार्थियों को पहली नजर में ही मंत्रमुग्ध कर देता है।
कारीगरों की ढाई साल की मेहनत और सोने का विशेष लेप
इस पूरे जिनालय को सुनहरी आभा प्रदान करने की प्रक्रिया बेहद धैर्य और कौशल से भरी रही है। इस विस्तृत कार्य को पूरा करने में करीब ढाई साल का लंबा वक्त लगा। इस दौरान प्रतिदिन 12 से 13 कुशल शिल्पकार मंदिर की दीवारों और खंभों पर बारीकी से काम में जुटे रहे। पत्थरों पर सदियों पहले तराशी गई आकृतियों को नुकसान पहुंचाए बिना उनकी सुंदरता को और अधिक उभारने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए समाज के 108 श्रद्धालुओं ने आगे आकर एक-एक खंभे के जीर्णोद्धार और सजावट की व्यक्तिगत जिम्मेदारी उठाई, जिससे हर खंभे पर कारीगरों का समर्पण साफ झलकता है।
मंदिर की इस कायाकल्प प्रक्रिया के बारे में सुनील बड़जात्या ने विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि खंभों पर उकेरी गई ऐतिहासिक कारीगरी को अधिक स्पष्ट और त्रिआयामी उभार देने के मकसद से यह गोल्डन वर्क कराया गया है। इसके निर्माण में शुद्ध सोने को एक खास रासायनिक घोल के साथ मिश्रित करके तैयार किए गए लेप का उपयोग किया गया। जब प्राकृतिक धूप या कृत्रिम लाइटें इन स्वर्णिम डिजाइनों से टकराती हैं, तो खंभों की एक-एक महीन आकृति निखरकर सामने आती है। रात के समय रोशनी के विशेष प्रबंधों के कारण मंदिर का आंतरिक भाग सुनहरी छटा से जगमगाता रहता है।
108 खंभों की अनसुलझी गिनती और लोक मान्यता
रैवासा जिनालय का मुख्य आकर्षण इसके 108 नक्काशीदार खंभे हैं, जिन्हें लेकर श्रद्धालुओं के बीच एक अनोखी और कौतूहल भरी मान्यता प्रचलित है। जनश्रुति के अनुसार, पूरा मंदिर परिसर 108 स्तंभों पर टिका हुआ है, लेकिन इनकी सटीक गिनती कर पाना किसी पहेली से कम नहीं है। मंदिर दर्शन के लिए आने वाले तीर्थयात्री अक्सर इन खंभों को गिनने का प्रयास करते हैं, परंतु हर बार गणना में अलग-अलग संख्या निकलकर सामने आती है। कई बार कोशिश करने के बावजूद एकमत संख्या न मिलने का यह रहस्य मंदिर की स्थापत्य कला को लेकर लोगों के आकर्षण को और अधिक गहरा कर देता है।
विक्रम संवत् 1205 का गौरवशाली इतिहास और भूगर्भ प्रतिमा
स्थापत्य सौंदर्य के अलावा रैवासा का यह पावन धाम अपने धार्मिक इतिहास के लिए भी विशेष आदर का पात्र है। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, इस विशाल जिनालय का निर्माण वीर निर्वाण संवत् 1674, यानी विक्रम संवत् 1205 में कराया गया था। मंदिर के मूल गर्भगृह में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की शांत और भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ ही, मंदिर परिसर में जमीन के नीचे से प्रकट हुई पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा भी विराजमान है। भूगर्भ से मिली इस पावन प्रतिमा के प्रति भक्तों की अटूट आस्था है और दूर-दराज से लोग इसके दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।
समीप स्थित नसियां जी का धार्मिक महत्व
जिनालय परिसर के ठीक पास में स्थित नसियां जी भी जैन समाज के लिए अत्यंत पवित्र और दर्शनीय स्थल माना जाता है। नसियां जी के मुख्य वेदी पर मूलनायक के रूप में भगवान चंद्रप्रभु की ध्यानमग्न पद्मासन प्रतिमा सुशोभित है। इसके अतिरिक्त, यहां भगवान शांतिनाथ और सहस्त्रफणी पार्श्वनाथ की लगभग सात फीट ऊंची विशाल पद्मासन प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनकी दिव्यता देखते ही बनती है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को संपूर्ण चौबीसी के एक साथ दर्शन करने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इस प्रकार रैवासा का यह तीर्थ क्षेत्र प्राचीन परंपरा, पावन भक्ति और शिल्प कला का एक अनूठा केंद्र बनकर उभरा है।


















