नागौर जिले में परबतसर के अंतर्गत आने वाले बडू गांव में मानवीय संवेदना और सामाजिक एकजुटता का एक अभूतपूर्व उदाहरण देखने को मिला है। परिवार के एकमात्र कमाने वाले 38 वर्षीय सदस्य रामदेव चोटिया के आकस्मिक निधन के बाद जब घर के बुजुर्गों और मासूम बच्चों पर संकट के बादल घिर आए, तब स्थानीय समाज और ग्रामीणों ने मिलकर सहारा देने का बीड़ा उठाया। यह जनसहयोग महज दो दिनों के भीतर एक बड़ी आर्थिक मुहिम में तब्दील हो गया और पीड़ित परिजनों के लिए लगभग 24 लाख रुपये की राशि जुटा ली गई।
घर के इकलौते कमाऊ सदस्य के अचानक जाने से गहराया संकट
बडू गांव निवासी 38 वर्षीय रामदेव चोटिया का निधन 25 सितंबर 2026 को अप्रत्याशित रूप से हो गया था। रामदेव अपने माता-पिता के अकेले बेटे थे और समूचे परिवार का भरण-पोषण उन्हीं के कंधों पर टिका हुआ था। उनके जाने से घर में आर्थिक और भावनात्मक दोनों ही मोर्चों पर गहरा शून्य पैदा हो गया। यह दुखद सूचना फैलते ही सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्कों के माध्यम से परिवार की गंभीर आर्थिक स्थिति के बारे में लोगों को जानकारी मिलने लगी।
घर में कमाने वाले किसी अन्य सदस्य के न होने की बात जब सामने आई, तो उगमाराम बडारडा तुरंत बडू गांव पहुंचे। उन्होंने शोकाकुल चोटिया परिवार से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की, परिजनों को सांत्वना दी और इस विकट घड़ी में परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक आर्थिक सहयोग अभियान शुरू करने का निर्णय लिया।
बुजुर्गों की गंभीर बीमारी और बच्चियों की परवरिश की दोहरी चुनौती
रामदेव चोटिया के परिवार की स्थिति बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण बनी हुई थी। परिवार के सदस्यों में 105 वर्ष की वयोवृद्ध दादी, 75 वर्ष की आयु के बुजुर्ग माता-पिता, उनकी धर्मपत्नी सीमा देवी और 11 वर्ष व 6 वर्ष की दो नन्हीं बेटियां शामिल हैं। इसके अलावा रामदेव की वृद्ध मां लंबे समय से गठिया रोग से ग्रसित हैं, जिनका नियमित इलाज और देखभाल बेहद जरूरी है।
पति के अचानक चले जाने से सीमा देवी के सामने न केवल अपनी दोनों बेटियों के लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी आ पड़ी, बल्कि घर के तीन बुजुर्ग सदस्यों की सेवा का भार भी आ गया। बताया गया कि ससुराल पक्ष में भी सास-ससुर और सगे सालों का कोई अतिरिक्त सहारा उपलब्ध नहीं था। ऐसी विषम परिस्थितियों में रोजमर्रा के खर्चों और भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए परिवार को तत्काल आर्थिक संबल की सख्त दरकार थी।
भामाशाहों और परिचितों ने दो दिनों में तैयार किया संबल
उगमाराम बडारडा द्वारा की गई सार्वजनिक अपील के बाद मदद का एक बड़ा सिलसिला शुरू हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों के भामाशाहों, ग्रामीणों और परिचितों ने निर्धारित बैंक खातों में सीधे अपनी सामर्थ्य अनुसार सहयोग राशि भेजनी शुरू की। मदद की यह लहर इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि केवल दो दिनों की अल्पावधि में ही करीब 24 लाख रुपये का कोष इकट्ठा हो गया।
यह सामूहिक प्रयास साबित करता है कि किसी भी परिवार पर अचानक आई आपदा के समय सामाजिक ताना-बाना किस प्रकार एक मजबूत ढाल बन सकता है। जुटाई गई यह 24 लाख रुपये की राशि अब रामदेव के आश्रितों के लिए बच्चों की शिक्षा, वृद्ध परिजनों की चिकित्सा और दैनिक जीवन यापन के खर्चों को सुचारू रखने में बड़ा सहारा बनेगी, जिससे परिवार इस कठिन दौर से उबर सके।
















