राजस्थान के विस्तृत नमक उत्पादक इलाके में स्थित सांभर झील के किनारे एक बेहद विशिष्ट आस्था केंद्र मौजूद है, जहां पारंपरिक मंदिरों से इतर एक अनोखी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। नावा क्षेत्र के मारिसर गांव में स्थापित पगल्या वाले बाबा धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी देवी या देवता की मूर्ति स्थापित नहीं है। नमक के सफेद विस्तार के बीच बसे इस मंदिर में श्रद्धालु संतों के पवित्र पदचिह्नों यानी पगल्या की पूजा-अर्चना करते हैं। इस सिद्ध पीठ में आगामी 12 अक्टूबर को विशाल वार्षिक मेले का आयोजन होने जा रहा है, जिसको लेकर स्थानीय निवासियों और मंदिर प्रबंधन समिति ने व्यापक स्तर पर प्रबंध शुरू कर दिए हैं।
वार्षिक मेले के लिए व्यापक स्तर पर तैयारियां
आगामी 12 अक्टूबर को आयोजित होने वाले इस वार्षिक मेले में लाखों की संख्या में भक्तों के उमड़ने की संभावना जताई जा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन ने व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। आयोजन को सुचारू और व्यवस्थित बनाने के लिए क्षेत्र के भामाशाहों ने आगे आकर विभिन्न सेवा कार्यों का जिम्मा अपने हाथों में लिया है। मेले में दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध पेयजल, भोजन और सुरक्षित विश्राम की पुख्ता व्यवस्था की जा रही है।
यह आयोजन महज एक धार्मिक मेले तक सीमित न रहकर समूचे परिक्षेत्र के सामाजिक सरोकार और सेवा भाव का अनुपम उदाहरण बन चुका है। मारिसर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोग आगंतुक भक्तों की सुविधा और सहायता के लिए स्वेच्छा से सहयोग दे रहे हैं। स्वयंसेवकों की टोलियां विभिन्न पड़ावों पर तैनात की जा रही हैं ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े।
देर रात तक सजेगी भव्य भजन संध्या
मेले के दिन सुबह से ही सांभर झील के सुरम्य तट पर बाबा के धाम में विशेष दर्शन और अनुष्ठान का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा। दिनभर धार्मिक विधियों और पूजा-अर्चना के बाद शाम के समय मंदिर प्रांगण में एक विशाल भजन संध्या का आयोजन किया जाएगा। इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम में जाने-माने भजन गायक अपनी प्रस्तुतियां देंगे।
देर रात तक चलने वाली इस संगीत संध्या में हजारों श्रद्धालु भक्ति रस से सराबोर होंगे। मंदिर प्रबंधन की ओर से ध्वनि, प्रकाश और बैठने की व्यवस्था को भव्य रूप दिया जा रहा है ताकि यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक शांति का अहसास हो सके।
मूर्ति पूजा की जगह संतों के पदचिह्नों का आदर
पगल्या वाले बाबा धाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इसे राजस्थान के अन्य धार्मिक स्थलों से पूरी तरह अलग बनाती है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, यह पावन धरा दादू दयाल परंपरा के सिद्ध संतों की तपोभूमि रही है। यहां किसी भी देवी-देवता की पाषाण या धातु की प्रतिमा नहीं रखी गई है, बल्कि प्राचीन काल से ही यहां संतों के पवित्र पदचिह्नों की उपासना की जाती रही है। राजस्थानी लोकभाषा में पदचिह्नों को पगल्या कहा जाता है, जिससे इस स्थल का नाम पगल्या वाले बाबा धाम पड़ा। भक्तजन इन पदचिह्नों के समक्ष शीश नवाकर अपने जीवन में सुख, शांति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
लकवा पीड़ितों के लिए गहरी आस्था का केंद्र
इस पवित्र धाम की ख्याति केवल स्थानीय संतों की स्मृति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थल लकवा यानी पैरालिसिस की व्याधि से जूझ रहे मरीजों के लिए भी एक बड़ा संबल माना जाता है। मंदिर परिसर में एक प्राचीन और विशाल धूणा स्थापित है। श्रद्धालुओं में गहरी मान्यता है कि इस धूणे की पवित्र भभूत लेकर सात बार परिक्रमा की जाए और फिर उस भभूत को रोगी के शरीर पर लगाया जाए, तो गंभीर शारीरिक व्याधि में असाधारण राहत मिलती है। अनेक श्रद्धालु इसे अपनी आस्था और अनुभव का प्रमाण मानते हुए यहां खिंचे चले आते हैं।
दूर के जिलों और राज्यों से आने वाले मरीजों तथा उनके परिजनों की सुविधा के लिए धाम परिसर में एक विशाल धर्मशाला का निर्माण कराया गया है, जहां ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था रहती है। इसके अतिरिक्त, मंदिर परिसर में एक वृहद गौशाला भी संचालित की जा रही है, जिसमें सैकड़ों निराश्रित गायों का भरण-पोषण और संरक्षण किया जाता है। इस गौशाला से प्राप्त होने वाली संपूर्ण आय को सीधे मंदिर के विस्तार, विकास और गौसेवा के कल्याणकारी कार्यों में समर्पित किया जाता है।



















