घरों के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाई जाने वाली नेम प्लेट अब केवल निवास का पता दर्शाने का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह गृहस्वामियों की सांस्कृतिक पहचान और आंतरिक साज-सज्जा का अहम हिस्सा बन चुकी है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में पारंपरिक ऐपण लोककला से सुसज्जित नेम प्लेट इन दिनों लोगों के बीच काफी आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। सदियों पुरानी पहाड़ी विरासत और समकालीन कलात्मक शैली के इस अनूठे संगम ने सामान्य नेम प्लेट्स की तुलना में इन कलाकृतियों को एक विशिष्ट और आकर्षक पहचान दिलाई है।
उच्च शिक्षा के साथ स्वरोजगार की अनूठी मिसाल
बागेश्वर जिले की निवासी रिचा जोशी अपनी उच्च शिक्षा की पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ इस पारंपरिक लोककला को नए रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। उन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा को एक उद्यम का रूप देते हुए 'कुमाऊं क्राफ्ट' नाम से एक ऑनलाइन पेज की शुरुआत की है। इस डिजिटल मंच के माध्यम से ग्राहक अपने व्यक्तिगत स्वाद, पसंदीदा नाम, मनचाहे रंग और विशेष आकृतियों के अनुसार कस्टमाइज्ड नेम प्लेट तैयार करवा सकते हैं। इन हस्तनिर्मित नेम प्लेट्स की शुरुआती कीमत लगभग 999 रुपये निर्धारित की गई है।
पारंपरिक कला में आधुनिक सजावट का समावेश
रिचा जोशी मूल रूप से बागेश्वर की पृष्ठभूमि से आती हैं और वे पारंपरिक ऐपण शैलियों में अपनी रचनात्मक कल्पनाशीलता को पिरोकर नेम प्लेट्स तैयार करती हैं। इन कलाकृतियों में शीशे जैसी चमक बिखेरने वाले विशेष सजावटी तत्व और कई प्रकार के मनभावन पैटर्न शामिल किए जाते हैं। ऐपण की पारंपारिक और महीन रेखाओं के साथ आधुनिक सजावटी सामग्रियों का यह संतुलन नेम प्लेट को बेहद प्रीमियम और सुरुचिपूर्ण स्वरूप प्रदान करता है। यही कारण है कि घर की चौखट पर सजने के बाद यह किसी सामान्य नेम बोर्ड के मुकाबले काफी अलग और मनमोहक दिखाई देती है।
ऑनलाइन मंच से मनपसंद नेम प्लेट का चयन
'कुमाऊं क्राफ्ट' ऑनलाइन पेज के जरिए ग्राहकों को अपनी जरूरत और पसंद के मुताबिक ऑर्डर देने की पूरी सुविधा मिलती है। ग्राहक किस तरह का नाम लिखवाना चाहते हैं, उन्हें किस प्रकार के डिजाइन चाहिए और रंगों का क्या संयोजन होना चाहिए, इन सभी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर नेम प्लेट तैयार की जाती है। हालांकि इन नेम प्लेट्स की शुरुआती दर करीब 999 रुपये रखी गई है, लेकिन डिजाइन की जटिलता, बोर्ड के आकार और उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की विविधता के आधार पर अंतिम मूल्य में अंतर आ सकता है।
आंगन और देहरी से सजावटी उत्पादों तक का सफर
ऐपण मूल रूप से उत्तराखंड की एक समृद्ध और प्राचीन लोककला है, जिसे पारंपरिक रूप से चावल के भीगे घोल और प्राकृतिक गेरू अथवा लाल मिट्टी के उपयोग से शुभ प्रतीकों व जटिल ज्यामितीय आकृतियों के साथ उकेरा जाता है। प्राचीन काल से ही इस कला का उपयोग मुख्य रूप से मकानों के आंगन, पूजा गृहों, विवाह समारोहों और मांगलिक अवसरों पर देहरी सजाने के लिए किया जाता रहा है। अब समय के बदलाव के साथ यह लोककला सजावटी वस्तुओं, परिधानों, खूबसूरत पेंटिंग्स और नेम प्लेट्स जैसे कई आधुनिक उत्पादों का अभिन्न अंग बन चुकी है। नए उत्पादों से जुड़ने के कारण यह लोककला घरों की आधुनिक सजावट में भी तेजी से जगह बना रही है।
छह महीने के भीतर स्वरोजगार को मिली नई रफ्तार
रिचा जोशी कई वर्षों से ऐपण कला के अभ्यास से जुड़ी हुई हैं, लेकिन पिछले लगभग छह महीनों से उन्होंने इसे औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र स्वरोजगार के तौर पर आगे बढ़ाया है। डिजिटल और ऑनलाइन माध्यमों की मदद लेने से न केवल स्थानीय ग्राहकों का रुझान बढ़ा है, बल्कि अन्य जिलों और विभिन्न राज्यों से भी निरंतर नए ऑर्डर मिलने के रास्ते खुल गए हैं। रिचा का मुख्य उद्देश्य इस पारंपरिक पहाड़ी कला को आधुनिक जरूरतों और नए डिजाइनों के साथ जीवंत बनाए रखना है। घर की चौखट पर टंगी यह नेम प्लेट केवल नाम बताने का काम नहीं करती, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विरासत का परिचय भी देती है।





















