राजस्थान के कोटा में करीब पांच महीने पहले सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी के बाद महिलाओं की जान जाने के गंभीर मामले में प्रशासन ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। वहां उपचार के दौरान पांच महिलाओं की मृत्यु और गुर्दे खराब होने की घटनाओं के बाद जिन तीन वरिष्ठ चिकित्सकों को सेवा से निलंबित किया गया था, उनकी बहाली के आदेश जारी कर दिए गए हैं। पूरे प्रकरण की पड़ताल के लिए गठित चार अलग-अलग उच्च स्तरीय जांच कमेटियों के निष्कर्ष सामने आने के बाद यह बहाली की गई है, क्योंकि किसी भी समिति ने इलाज करने वाले डॉक्टरों या अस्पताल के प्रशासन पर सीधे तौर पर लापरवाही का ठीकरा नहीं फोड़ा।
तेरह दिनों के भीतर घटी थीं दुखद घटनाएं
यह गंभीर स्वास्थ्य संकट कोटा स्थित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में देखने को मिला था। लगभग 13 दिन के अंतराल में पांच प्रसूताओं ने दम तोड़ दिया था, जबकि कई अन्य भर्ती महिलाओं में गुर्दे फेल होने जैसी अत्यधिक गंभीर मेडिकल दिक्कतें पैदा हो गई थीं। एक साथ कई माताओं की जान जाने और मरीजों की हालत बिगड़ने की घटनाओं ने पूरे राज्य में चिकित्सा तंत्र और निगरानी प्रणाली पर तीखे सवाल खड़े कर दिए थे। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने उस समय त्वरित कदम उठाते हुए डॉ. नवनीत कुमार, डॉ. बी.एल. पाटीदार और डॉ. खुशबू मीणा को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया था।
जांच कमेटियों की विस्तृत पड़ताल और मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण
इस पूरे मामले की तह तक जाने और मौतों की असली वजह तलाशने के लिए सरकार ने चार विशेष उच्च स्तरीय जांच समितियों को जिम्मेदारी सौंपी थी। इन जांच दलों ने अस्पतालों में मौजूद क्लिनिकल सुविधाओं, दवाओं, हर एक महिला की पुरानी बीमारी व मेडिकल हिस्ट्री और डिलीवरी के बाद उभरी शारीरिक जटिलताओं का बिंदुवार अध्ययन किया। विशेषज्ञों ने प्रत्येक मरीज की केस फाइल को अलग रखकर यह जांचा कि क्या इलाज के प्रोटोकॉल में कोई जानबूझकर की गई कोताही थी अथवा यह सब गंभीर स्वास्थ्य संकट के अप्रत्याशित परिणाम थे।
समितियों ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में दर्ज किया कि जिन महिलाओं की जान गई, वे अस्पताल पहुंचने के समय ही बेहद नाजुक स्थिति में थीं। उनमें से कई महिलाएं पहले से ही भिन्न-भिन्न प्रकार की गंभीर शारीरिक समस्याओं और बीमारियों से जूझ रही थीं। जांच निष्कर्षों के अनुसार, प्रसव के दौरान और उसके फौरन बाद अचानक उपजी अत्यंत जटिल चिकित्सीय परिस्थितियों के कारण महिलाओं की स्थिति बिगड़ी। इसके बावजूद, किसी भी जांच कमेटी ने तीनों सस्पेंड डॉक्टरों अथवा अस्पताल के प्रबंधन तंत्र को मौतों के लिए सीधा कसूरवार नहीं ठहराया।
जांच निष्कर्षों के बाद निलंबन वापसी का फैसला
चारों उच्च स्तरीय समितियों द्वारा सौंपी गई तकनीकी रिपोर्टों के आधार पर सरकार ने डॉ. नवनीत कुमार, डॉ. बी.एल. पाटीदार और डॉ. खुशबू मीणा का निलंबन निरस्त कर उन्हें सेवा में वापस लेने का निर्णय लिया। जांच में यह रेखांकित हुआ कि चिकित्सकों की तरफ से ऐसी कोई प्रत्यक्ष चिकित्सीय चूक या सीधी व्यक्तिगत जिम्मेदारी सिद्ध नहीं हुई, जिसके चलते उनके खिलाफ अनुशासनात्मक निलंबन को आगे भी बरकरार रखा जाता।
शुरुआत में जब 13 दिनों के भीतर पांच महिलाओं की जान जाने की खबर सामने आई थी, तब अस्पतालों में वार्ड स्तर पर निगरानी, इमरजेंसी देखभाल और मरीजों के प्रबंधन को लेकर भारी असंतोष पैदा हुआ था। प्रशासन ने जनता के भरोसे और चिकित्सकीय पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए ही बहुस्तरीय जांच बैठाई थी। अब जब विस्तृत क्लिनिकल ऑडिट में चिकित्सकों पर सीधा दोष साबित नहीं हुआ, तब सरकार ने उनके खिलाफ चल रही दंडात्मक निलंबन कार्रवाई को समाप्त कर दिया है।

















