रोशनी और खुशियों के इस पावन पर्व पर देश के विभिन्न हिस्सों से मेलजोल की कई कहानियां सामने आती हैं, लेकिन राजस्थान के बीकानेर शहर की एक परंपरा इन सबसे बेहद अलग और खास है। यहां हर साल दीपावली के अवसर पर एक ऐसा अनूठा आयोजन किया जाता है, जो आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करता है। इस कार्यक्रम में मुस्लिम शायर उर्दू जुबान में रामायण का पाठ करते हैं और इसे सुनने के लिए बड़ी संख्या में हिंदू तथा मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ बैठकर शिरकत करते हैं। इस अनूठी पहल का मुख्य उद्देश्य यही दर्शाना है कि भले ही लोगों के मजहब और भाषाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन दिलों के बीच प्रेम और अपनत्व की डोर हमेशा मजबूत रहनी चाहिए। आज के दौर में जब समाज के भीतर दूरियां बढ़ाने की कोशिशें होती हैं, तब यह आयोजन नफरत की दीवारों को गिराकर आपसी सौहार्द का मजबूत संदेश देने का काम करता है।
मौलाना बादशाह हुसैन खां राणा लखनवी की अनमोल रचना
इस पूरी परंपरा का सबसे बड़ा आकर्षण वह ग्रंथ है जिसके जरिए रामकथा का वाचन किया जाता है। आमतौर पर देश भर में रामायण का पाठ संस्कृत, हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में सुना जाता है, लेकिन बीकानेर की इस महफिल का अंदाज बिल्कुल जुदा है। इस खास रामायण को मौलवी बादशाह हुसैन खां राणा लखनवी ने उर्दू भाषा में कलमबद्ध किया था। जब मुस्लिम शायर अपनी कला और शायरी के अंदाज में उर्दू शब्दों के जरिए रामकथा के प्रसंग सुनाते हैं, तो वहां मौजूद हर शख्स मंत्रमुग्ध होकर उसे सुनता है। इस आयोजन की खूबसूरती यह है कि यहां श्रोताओं के रूप में किसी एक वर्ग के लोग नहीं बैठते, बल्कि दोनों समुदायों के तमाम लोग कंधे से कंधा मिलाकर इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मेलजोल का हिस्सा बनते हैं। भाषा की यह अनूठी शैली रामकथा को एक नया विस्तार देती है और लोगों को जोड़ने का माध्यम बनती है।
हर साल दीपावली पर सजती है महफिल
यह विशेष आयोजन किसी एक साल का वाकया नहीं है, बल्कि बीकानेर में यह हर वर्ष दीपावली के पर्व पर एक परंपरा की तरह निभाया जाता है। इस पूरे कार्यक्रम के पीछे पर्यटन लेखक संघ-महफिले अदब संस्था की अहम भूमिका होती है, जो हर साल इस महफिल का आयोजन करती है। संस्था का मुख्य ध्येय इस कलात्मक मंच के माध्यम से समाज में मेलजोल और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना है। जब एक तरफ पूरा देश दीये जलाकर खुशियां मना रहा होता है, तब बीकानेर में यह आयोजन दिलों में आपसी भरोसे और प्रेम की अलख जगाता है। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यह है कि लोग बिना किसी संकोच, भेदभाव या पूर्वाग्रह के एक साथ बैठकर रामकथा का आनंद लेते हैं। समय के साथ यह आयोजन अब बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान और सांप्रदायिक सौहार्द का एक मजबूत प्रतीक बन चुका है।
साहित्य और कला से मिटती हैं दूरियां
आयोजकों का यह स्पष्ट मानना है कि कला, साहित्य और भाषा कभी भी किसी सीमा में बंधे नहीं होते, बल्कि वे इंसान को इंसान से जोड़ने का काम करते हैं। उर्दू में रामायण का यह पाठ उसी वैचारिक सोच का जीवंत उदाहरण है, जो समाज में फैली तल्खी और दूरियों को पाटने का प्रयास करता है। जब लोग दीपावली की रात अपने घरों को रोशन करते हैं, ठीक उसी वक्त यह आयोजन आपसी रिश्तों को मजबूत करने का संदेश देता है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि किसी भी महान ग्रंथ या कथा को सुनने, समझने और सराहने के लिए धर्म की कोई दीवार मायने नहीं रखती। बीकानेर की यह परंपरा यह सिखाती है कि सच्ची संस्कृति वही है जो विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं को एक मंच पर लाकर एक नई शुरुआत करे।



















