राजस्थान के धौलपुर जिले में चंबल नदी के तट पर बीहड़ों के बीच स्थित सदियों पुराना शेरगढ़ दुर्ग संरक्षण की कमी के चलते अपना अस्तित्व खोने की कगार पर आ गया है। करीब नौ शताब्दियों का गौरवशाली अतीत संजोए यह विशाल किला आज कमजोर होती दीवारों और टूटे रास्तों के कारण जर्जर ढांचे जैसा नजर आने लगा है। शासन और प्रशासन स्तर पर लगातार बरती गई अनदेखी की वजह से कभी राजसी शान का गवाह रहा यह ऐतिहासिक स्थल अब खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।
चारदीवारी ढहने से मुख्य मार्ग हुआ अवरुद्ध
इस ऐतिहासिक स्मारक की वर्तमान दशा बेहद चिंताजनक हो चुकी है। किले की विशाल प्राचीरें वक्त के थपेड़ों से कमजोर पड़ चुकी हैं और उनके पत्थर दरक कर नीचे गिर रहे हैं। हाल के दिनों में सुरक्षा घेरे के रूप में मौजूद चारदीवारी का एक बड़ा हिस्सा अचानक भरभराकर गिर पड़ा। दीवार ढहने से निकला भारी मलबा किले की ओर जाने वाले प्रमुख रास्ते पर बिखर गया है। रास्ते में पड़े पत्थरों और मलबे की वजह से यहां आने वाले पर्यटकों और स्थानीय श्रद्धालुओं को आने-जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं, दुर्ग तक पहुंचने वाली पहुंच सड़क की हालत भी लंबे समय से खराब बनी हुई है। सड़क की ऊपरी परत उखड़ चुकी है और पूरे मार्ग पर गहरे गड्ढे बन गए हैं। इस वजह से दोपहिया और चारपहिया वाहनों के साथ-साथ पैदल चलने वाले लोगों के लिए भी इस मार्ग से गुजरना जोखिम भरा साबित हो रहा है।
12वीं सदी में यदुवंशी शासकों ने रखी थी मजबूत नींव
स्थानीय इतिहास के जानकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि चंबल के बीहड़ों में बना यह दुर्ग धौलपुर के समृद्ध अतीत का एक बेहद अहम दस्तावेज है। इस किले का निर्माण 12वीं शताब्दी के दौरान यदुवंशी राजा धर्मपाल सिंह द्वारा कराया गया था। अपने लंबे दौर में इस सैन्य ठिकाने ने कई भीषण युद्धों और विदेशी हमलों का सामना किया। 19वीं सदी की शुरुआत में महाराजा राना कीरत सिंह ने वर्ष 1806 से वर्ष 1811 तक इस मजबूत किले को अपनी सल्तनत की मुख्य राजधानी बनाकर शासन संचालित किया था।
उस दौर में किले की सुरक्षा के लिए विशालकाय और बेहद घातक तोपें तैनात की गई थीं। इन प्राचीन तोपों में से एक ऐतिहासिक तोप को आज भी धौलपुर स्थित सर्किट हाउस परिसर में सुरक्षित रखा गया है, जो इस दुर्ग के सामरिक महत्व की गवाही देती है।
बाबरनामा में भी दर्ज है इस दुर्ग का उल्लेख
शेरगढ़ दुर्ग का ऐतिहासिक महत्व केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिल्ली के तख्त से भी इसका गहरा जुड़ाव रहा है। पहले मुगल बादशाह बाबर ने अपनी चर्चित आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी में इस किले का विस्तार से जिक्र करते हुए इसे धौलपुर दुर्ग के नाम से पुकारा था। कालांतर में जब अफगान शासक शेरशाह सूरी का इस क्षेत्र पर अधिकार हुआ, तब इसका नाम बदलकर शेरगढ़ दुर्ग कर दिया गया। तब से यह ऐतिहासिक स्थल इसी नाम से पहचाना जाता है।
इतिहास के पन्नों में यह भी दर्ज है कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान सिकंदर लोदी ने इस किले पर भीषण सैन्य चढ़ाई की थी। उस समय शेरगढ़ पर राजा विनायक देव का शासन था, जिनके ग्वालियर के प्रतापी राजा मानसिंह तोमर के साथ बेहद करीबी संबंध थे। इन तमाम घटनाओं से स्पष्ट होता है कि मध्यकाल में यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण केंद्र था।
पर्यटन विकास और वॉच टावर निर्माण की मांग
इतिहासकार अरविंद शर्मा का कहना है कि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए अविलंब ठोस कदम उठाने चाहिए। यदि पर्यटन विभाग इस दुर्ग का सुनियोजित विकास करे, तो यहां आने वाले सैलानी चंबल नदी के प्राकृतिक दृश्यों, बीहड़ों की अनूठी भौगोलिक संरचना और धौलपुर की प्राचीन विरासत का एक साथ अनुभव कर सकते हैं।
उन्होंने तत्कालीन जिला कलेक्टर अभय कुमार को इस ऐतिहासिक स्थल पर चंबल व्यू नाम से एक आकर्षक वॉच टावर स्थापित करने का सुझाव भी दिया था। इस टावर के जरिए पर्यटक चंबल के विशाल बीहड़ों और नदी के बहाव का विहंगम नजारा देख सकते हैं। यदि समय रहते इस प्राचीन धरोहर की मरम्मत और जीर्णोद्धार पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस 900 साल पुराने गौरवशाली इतिहास के भौतिक साक्ष्यों से पूरी तरह वंचित हो जाएंगी।



















