राजस्थान के भरतपुर जिले में मानसूनी बारिश ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि गतिविधियों को नई रफ्तार दी है। जिले के बंद बरेठा और उसके आस-पास के देहाती इलाकों में स्थित छोटे-बड़े तालाब इस समय लबालब भरे हुए हैं। पानी की भरपूर आवक को देखते हुए स्थानीय किसानों ने जलस्रोतों में बड़े स्तर पर सिंघाड़े की खेती शुरू कर दी है। पारंपरिक फसलों की तुलना में सिंघाड़े की खेती में शुरुआती लागत काफी कम आती है, जिससे काश्तकारों को कम समय में बढ़िया मुनाफा मिलने की पूरी उम्मीद है।
जलस्रोतों में सिंघाड़े की रोपाई और फसल चक्र
बंद बरेठा इलाके के कई प्राकृतिक और कृत्रिम जलाशयों में बारिश के बाद पर्याप्त जलस्तर बन चुका है। किसान इन जलस्रोतों की सतह पर सिंघाड़े की स्वस्थ बेलें फैलाकर खेती को आगे बढ़ाते हैं। यह बेल पानी की ऊपरी सतह पर तैरती हुई तेजी से विकसित होती है और कुछ ही हफ्तों में फल तैयार होने लगते हैं। अनुकूल वातावरण और जल की निरंतर उपलब्धता मिलने पर रोपाई के तकरीबन डेढ़ महीने के भीतर फसल से फल निकलना शुरू हो जाता है। तैयार फलों को सावधानीपूर्वक निकालकर स्थानीय मंडियों और हाट-बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है।
अनुकूल मौसम, मिट्टी और जल प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सिंघाड़े की खेती के लिए गर्मी और बारिश का मिलाजुला मौसम सबसे मुफीद माना जाता है। रोपाई का कार्य मुख्य रूप से तब किया जाता है जब तालाबों या पोखरों में पर्याप्त जलभराव सुनिश्चित हो जाए। अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु और वर्षा चक्र के हिसाब से रोपाई की समय सारिणी में थोड़ा बदलाव संभव है। सिंघाड़े की बेलों को भरपूर धूप की आवश्यकता होती है, इसलिए बहुत अधिक गहरे पानी की बजाय 1 से 1.5 मीटर तक की गहराई वाले जलाशय इसके लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। साफ पानी और तलहटी में मौजूद उपजाऊ चिकनी-दोमट मिट्टी पौधों के बेहतर विकास में सहायक होती है। पौधों की सही बढ़वार के बाद अक्टूबर से दिसंबर के दौरान बड़े पैमाने पर फलों की तुड़ाई की जाती है।
बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक देखरेख
सिंघाड़े की गुणवत्तापूर्ण पैदावार हासिल करने के लिए किसानों को प्रमाणित और स्वस्थ बीजों अथवा बेलों का चयन करना चाहिए। बेलों के फैलाव के दौरान जलाशय में उगने वाली अनावश्यक जलीय घास और खरपतवार को समय रहते हटाना बेहद जरूरी है। यदि बेलें जरूरत से ज्यादा घनी हो जाती हैं, तो निचली शाखाओं तक समुचित धूप और वायु का संचार नहीं हो पाता, जिससे फलन प्रभावित हो सकता है। फसल पर किसी कीट या रोग के लक्षण दिखाई देने पर कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क कर उचित उपचार अपनाना चाहिए। इसके साथ ही फलों की तुड़ाई करते समय विशेष सावधानी बरतनी होती है ताकि मुख्य बेल को नुकसान न पहुंचे और आगे भी उत्पादन जारी रहे।
त्योहारी मांग और बाजार में अच्छी कीमत की उम्मीद
सिंघाड़े का उपयोग न केवल ताजे फल के रूप में किया जाता है, बल्कि हिंदू धार्मिक व्रतों और उपवासों में भी इसकी भारी मांग रहती है। व्रत के दिनों में सिंघाड़े के आटे और कच्चे फल की खपत बढ़ जाती है, जिससे उत्पादकों को स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में अच्छे दाम मिलने का भरोसा है। बंद बरेठा क्षेत्र के किसानों का मानना है कि इस वर्ष जलाशयों में निरंतर जल की उपलब्धता से फसल को लगातार नमी मिल रही है, जो पैदावार को बढ़ाने में सीधे मदद करेगी। इस मौसमी खेती ने स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार और अतिरिक्त आमदनी के नए रास्ते खोले हैं।




















