जयपुर के राजस्थान हाईकोर्ट में एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां कारोबारी ज्ञान चंद अग्रवाल और दो अन्य आरोपियों से जुड़ी अदालती फाइलें गायब पाई गई हैं। ये जरूरी फाइलें हाईकोर्ट की क्रिमिनल ब्रांच में सुरक्षित रखी जानी थीं, लेकिन 10 अप्रैल 2026 को इनके गायब होने की बात सामने आई। इस घटना के बाद से हाईकोर्ट में रिकॉर्ड के रख-रखाव और उनकी समय पर उपलब्धता को लेकर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि ये फाइलें किसी साजिश के तहत गायब हुई हैं या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक लापरवाही है।
फाइलों की तलाश और रजिस्ट्री की रिपोर्ट
ज्ञान चंद अग्रवाल और अन्य आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों को रद्द करवाने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया था और याचिकाएं दायर की थीं। जब इन याचिकाओं से जुड़े दस्तावेजों की जरूरत पड़ी तो 10 अप्रैल को रजिस्ट्री की क्रिमिनल ब्रांच में फाइलें नहीं मिलीं। इस बड़ी चूक का पता चलने पर हाईकोर्ट ने तुरंत रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) से इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की। रजिस्ट्री विभाग की तरफ से अदालत में रिपोर्ट पेश भी की गई, लेकिन 22 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने इसे नाकाफी माना। इस सारी कागजी कार्रवाई और फाइलों के गायब होने के बावजूद आरोपी को मिलती आ रही गिरफ्तारी से अंतरिम राहत पर कोई रोक नहीं लगी और मामले की सुनवाई नियमित रूप से आगे बढ़ती रही।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और एसएलपी खारिज
जब यह पूरा विवाद आगे बढ़ा तो मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। तारीख 10 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट की चल रही न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह का दखल देने से साफ इनकार कर दिया और एसएलपी को खारिज कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को यह कानूनी छूट दी कि वह हाईकोर्ट में लंबित पड़े इस मामले की जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करने की मांग कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि जरूरी रिकॉर्ड हाईकोर्ट की सामान्य रजिस्ट्री में नहीं मिल रहे हैं, तो याचिकाकर्ता सीधे रजिस्ट्रार जनरल से संपर्क साध सकता है। रजिस्ट्रार जनरल के स्तर पर इन खोए हुए दस्तावेजों को तलाशने के प्रयास किए जा सकते हैं और यदि वे मिल जाते हैं, तो उन्हें तुरंत हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया जा सकता है।
एसओजी ने 2023 में दर्ज की थी एफआईआर
यह पूरा कानूनी विवाद उस मूल मामले से जुड़ा है जिसे साल 2023 में राजस्थान पुलिस की स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप यानी एसओजी ने एक एफआईआर के जरिए दर्ज किया था। इस एफआईआर में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और गंभीर साजिश रचने जैसे संगीन आरोप शामिल किए गए थे। याचिका के दौरान यह बात भी सामने आई कि हाईकोर्ट के पुराने निर्देशों के बावजूद ज्ञान चंद अग्रवाल ठीक से जांच प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए थे, फिर भी उन्हें लगातार गिरफ्तारी से अंतरिम राहत का लाभ मिलता रहा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने 10 अगस्त के आदेश में इन तमाम आरोपों की सत्यता पर कोई मुहर नहीं लगाई और यह तय नहीं किया कि ये आरोप सही हैं या गलत। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय नहीं किया कि हाईकोर्ट से रिकॉर्ड आखिर क्यों गायब हुआ या इसके लिए असल में कौन जिम्मेदार है।
जस्टिस मेहता के बयानों से सीधा संबंध नहीं
यह मामला इसलिए भी खासी चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि हाल ही में जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज और कार्यप्रणाली को लेकर कुछ अलग तरह के गंभीर आरोप उठाए थे। इसके बावजूद, अब तक उपलब्ध आधिकारिक अदालती रिकॉर्ड में जस्टिस मेहता के उन आरोपों और ज्ञान चंद अग्रवाल के मामले की फाइलें गायब होने के बीच कोई भी सीधा संबंध या लिंक सामने नहीं आया है। अदालत में पेश की गई जानकारी में जस्टिस मेहता के दावों का जिक्र जरूर किया गया है, लेकिन इस विशेष मामले में अदालत ने उन दावों पर कोई भी स्वतंत्र निर्णय नहीं सुनाया है। फाइलों के इस तरह गायब होने की घटना यह जरूर साबित करती है कि अदालत में विचाराधीन मामलों के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत उपलब्ध कराना कितना जरूरी है। खासकर उन संवेदनशील मामलों में जहां किसी आरोपी को पहले ही गिरफ्तारी से राहत मिल चुकी हो और मुकदमा अदालत में लंबित हो, वहां संबंधित दस्तावेज समय पर मिलना और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है। इस मामले में आगे की नई जानकारियां अब रजिस्ट्री की गहराई से चल रही जांच और अदालत की आगामी कार्यवाहियों के बाद ही पूरी तरह से सामने आ पाएंगी।




















