राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाई जाती है, जिस दौरान कई विशेष आयोजनों की रूपरेखा तैयार की जाती है. इस अवसर पर राजस्थान के सिरोही जिले के स्थानीय नागरिकों ने चर्चा की कि वे आधुनिक दौर में बापू के विचारों और आदर्शों को किस प्रकार अपने आचरण में ढाल रहे हैं. समाज के अलग-अलग वर्गों से जुड़े लोगों ने सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और स्वच्छता के संदेशों को आज के समय में बेहद प्रासंगिक बताते हुए अपने निजी अनुभव साझा किए.
सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश
सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं वरिष्ठ नागरिक डॉ. दामोदर प्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार, गांधीजी के पूरे जीवन दर्शन के केंद्र में तीन प्रमुख स्तंभ रहे, जिनमें सत्य, अहिंसा और धर्म शामिल हैं. उनका मानना है कि इन्हीं आधारभूत सिद्धांतों के सहारे राष्ट्रपिता ने देश के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था. वर्तमान पीढ़ी को इन आदर्शों को केवल किताबों में पढ़ने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इनमें से कम से कम किसी एक सिद्धांत को अपने दैनिक आचरण में उतारने का गंभीर प्रयास अवश्य करना चाहिए.
डॉ. चतुर्वेदी ने विद्यार्थियों के संदर्भ में बात करते हुए कहा कि यदि कोई छात्र सत्य के रास्ते पर अडिग रहता है, तो उसे अपनी पढ़ाई और ज्ञानार्जन में कभी किसी बड़ी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. इसके साथ ही उन्होंने धन और शक्ति के उपयोग पर जोर दिया. उनके अनुसार, अर्जित धन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र और समाज की प्रगति में योगदान देना होना चाहिए, जबकि शारीरिक अथवा सामाजिक शक्ति का सही उपयोग दूसरों के सहयोग और मदद के लिए किया जाना चाहिए.
सत्याग्रह और सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी की भावना
स्थानीय व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता नवीन सांखला ने वर्तमान डिजिटल युग में गांधीवादी मूल्यों की महत्ता पर प्रकाश डाला. उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि सोशल मीडिया के दौर में लोग अक्सर संदेशों की सत्यता की पुष्टि किए बिना उत्तेजक अथवा भड़काऊ सामग्री आगे बढ़ा देते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को भारी क्षति पहुंचती है. उन्होंने बताया कि वे स्वयं कभी भी बिना जांच-परख किए कोई संदेश आगे फॉरवर्ड नहीं करते हैं और यही बापू के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा है.
नवीन सांखला ने आगे बताया कि गांधीजी ने अन्याय के विरुद्ध हमेशा अहिंसा और सत्याग्रह को सबसे बड़ा हथियार माना था. इसी प्रेरणा के चलते उन्होंने सिरोही नगर के विकास, बेहतर सड़कों के निर्माण और शिक्षा के स्तर में सुधार की खातिर आमरण अनशन का सहारा लिया था. शांतिपूर्ण सत्याग्रह की इसी राह पर चलते हुए उन्होंने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों को मजबूती से रखकर अपनी मांगें मनवाई थीं.
बुराई के विरोध और भ्रष्टाचार के खिलाफ सतर्कता
सांतपुर इलाके के दुकानदार संजय जानी ने महात्मा गांधी के प्रसिद्ध तीन बंदरों वाले विचार का स्मरण कराया, जिसमें बुरा न बोलने, बुरा न देखने और बुरा न सुनने की नसीहत दी गई है. उन्होंने बताया कि वे इस नैतिक सीख का पालन समाज में व्याप्त गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर करते हैं. अपने क्षेत्र में विकास कार्यों की निगरानी करते हुए वे निरंतर सक्रिय रहते हैं. चाहे सड़क निर्माण की गुणवत्ता का सवाल हो अथवा इलाके की नियमित सफाई व्यवस्था, वे हर स्तर पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रशासन से सीधे सवाल करते हैं और जनसमस्याओं को हल कराने का प्रयास करते हैं.
सांतपुर तालाब और सार्वजनिक स्थलों पर सफाई का अभियान
वरिष्ठ नागरिक दीपक त्रिवेदी ने बापू के स्वच्छता संबंधी विचारों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि गांधीजी ने हमेशा स्वच्छता को राष्ट्र सेवा का अनिवार्य अंग माना और देशवासियों को इसके प्रति जागरूक किया. इसी भावना से प्रेरित होकर वे स्वयं सार्वजनिक स्थानों पर साफ-सफाई बनाए रखने के लिए लगातार प्रयत्नशील रहते हैं. दीपक त्रिवेदी ने गांव के ऐतिहासिक और प्रमुख सांतपुर तालाब को स्वच्छ रखने के लिए न केवल व्यक्तिगत स्तर पर श्रमदान और सफाई के प्रयास किए, बल्कि स्थानीय प्रशासन को भी इसकी स्थिति से लगातार अवगत कराया ताकि इस सार्वजनिक जलस्रोत की दशा में आवश्यक सुधार किया जा सके.



















