पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ईरान के साथ टकराव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ईंधन बाजार पर बहुत गहरा दिखने लगा है। खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता के चलते जहां तेल आपूर्ति बाधित हुई है, वहीं अमेरिका खुद अपने घरेलू मोर्चे पर ईंधन की अभूतपूर्व महंगाई का सामना कर रहा है। हूतियों द्वारा किए गए हमलों के कारण दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल निर्यातक सऊदी अरब से होने वाली सप्लाई काफी हद तक प्रभावित हुई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है। इसका सीधा असर अमेरिकी खुदरा बाजार पर पड़ा है, जहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें 40 से 50 फीसदी तक उछल चुकी हैं। इस भारी मूल्यवृद्धि के कारण अमेरिका में राजनीतिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है और इसी स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अपने करीबी यूरोपीय सहयोगियों की ओर रुख किया है।
सर्दियों का मौसम करीब आने के साथ ही अमेरिका में ऊर्जा की खपत और बढ़ने वाली है। आगामी मिड टर्म चुनावों के मद्देनजर ईंधन की महंगाई डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है। घरेलू बाजार को राहत देने और अंतरराष्ट्रीय कीमतों को नीचे लाने के मकसद से अमेरिकी प्रशासन ने फ्रांस और जर्मनी से अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग करने का आह्वान किया है। अमेरिका चाहता है कि दोनों यूरोपीय देश अपने आपातकालीन डिस्टिलेट और डीजल रिजर्व से भारी मात्रा में ईंधन बाजार में जारी करें, ताकि वैश्विक स्तर पर मची अफरा-तफरी को नियंत्रित किया जा सके।
यूरोपीय संघ से 12 करोड़ बैरल डीजल जारी करने की मांग
अमेरिकी प्रशासन ने फ्रांस और जर्मनी के सामने एक बहुत बड़ी मांग रखी है। योजना के तहत यूरोपीय संघ से अगले छह महीनों के भीतर लगभग 120 मिलियन बैरल यानी 12 करोड़ बैरल डीजल खुले बाजार में उपलब्ध कराने को कहा गया है। यह मात्रा इतनी विशाल है कि यह पूरे यूरोपीय संघ के आपातकालीन डीजल और गैसोइल भंडार के 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्से के बराबर बैठती है। पूरे यूरोप में सामरिक भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं दो देशों के पास सुरक्षित है, जिसमें जर्मनी के पास करीब 56 लाख टन और फ्रांस के पास लगभग 82 लाख टन का डीजल भंडार मौजूद है।
सिर्फ अनुरोध करने के बजाय अमेरिका ने इस मामले में कड़ा रुख भी दिखाया है। अमेरिकी प्रशासन ने यह संकेत दिया है कि यदि यूरोपीय देश इस दिशा में सहयोग नहीं करते हैं, तो अमेरिका यूरोप को किए जाने वाले अपने डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने या उसे सीमित करने जैसे कड़े कदम उठा सकता है। यानी अमेरिका अपने स्वयं के निर्यात को रोकने की चेतावनी देकर सहयोगियों को उनके रणनीतिक रिजर्व खोलने के लिए विवश करने की रणनीति अपना रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची अमेरिकी डीजल कीमतें
अमेरिका की इस आक्रामक कूटनीति के पीछे वहां की वास्तविक आर्थिक मजबूरी छिपी हुई है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि देश में डीजल की खुदरा कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। 28 सितंबर को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान अमेरिका में औसत खुदरा डीजल की कीमत 6.382 डॉलर प्रति गैलन दर्ज की गई। इससे ठीक एक सप्ताह पहले 21 सितंबर को यह आंकड़ा 6.529 डॉलर प्रति गैलन तक जा पहुंचा था। पूरे सितंबर महीने में खुदरा दरें अपने सर्वकालिक उच्चतम स्तरों के इर्द-गिर्द बनी रहीं।
EIA के विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक रिफाइनिंग नेटवर्क में व्यवधान और आपूर्ति की कमी ने अमेरिकी बाजार पर यह दबाव बनाया है। रूस, चीन और पश्चिम एशिया में रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित होने और आपूर्ति शृंखला टूटने का सीधा नुकसान अंतरराष्ट्रीय बाजार को उठाना पड़ा है। इसका सीधा असर अमेरिकी घरेलू इन्वेंट्री पर पड़ा है, जहां स्टॉक लगातार घट रहा है। आने वाले महीनों में सर्दियां शुरू होने पर कृषि कार्यों, भारी माल ढुलाई और विशेष रूप से अमेरिका के उत्तर-पूर्वी राज्यों में हीटिंग के लिए भारी मात्रा में डीजल की आवश्यकता होगी। EIA का अनुमान है कि 2026 की शेष अवधि में अमेरिकी डिस्टिलेट इन्वेंट्री अपने पांच साल के औसत स्तर से काफी नीचे ही बनी रहेगी।
उत्पादक होने के बावजूद अमेरिका में क्यों गहराया संकट?
यह एक विरोधाभास लग सकता है कि अमेरिका स्वयं दुनिया में डीजल का एक प्रमुख उत्पादक और बड़ा निर्यातक है, फिर भी वह गंभीर कमी से जूझ रहा है। इसकी मुख्य वजह वैश्विक बाजार में पैदा हुआ भारी मुनाफा और आपूर्ति अंतर है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डीजल की भारी किल्लत हुई, तो अमेरिकी रिफाइनरियों और उत्पादक कंपनियों को विदेशी खरीदारों से अत्यधिक ऊंची कीमतें मिलने लगीं। नतीजतन, अधिक लाभ कमाने के लिए बड़े पैमाने पर ईंधन बाहर भेजा गया।
EIA के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के दौरान कई महीनों में अमेरिकी डिस्टिलेट का शुद्ध निर्यात पिछले पांच वर्षों के उच्चतम स्तर पर या उससे भी ऊपर पहुंच गया। इस अंधाधुंध निर्यात के कारण अमेरिका के अपने घरेलू डिपो खाली होते चले गए। अब स्थिति यह बन गई है कि यदि ट्रंप प्रशासन घरेलू कीमतें घटाने के लिए निर्यात पर रोक लगाता है, तो विश्व बाजार में भारी तबाही मचेगी और मित्र देशों में ईंधन का हाहाकार मच जाएगा। दूसरी तरफ, यदि निर्यात पहले की तरह जारी रखा जाता है, तो अमेरिका की जनता को महंगाई से राहत दिलाना असंभव हो जाएगा। इसी दोराहे पर फंसे होने के कारण ट्रंप प्रशासन यूरोप के भंडारों का सहारा तलाश रहा है।
फ्रांस और जर्मनी के सामने क्या हैं चुनौतियां?
यूरोपीय संघ के लिए अपने रणनीतिक और आपातकालीन भंडारों को खोलना आसान निर्णय नहीं है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और राष्ट्रीय नीतियों के तहत ये भंडार सामान्य व्यापारिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि युद्ध या गंभीर प्राकृतिक आपदा जैसी अप्रत्याशित आपात स्थितियों के लिए बचाकर रखे जाते हैं। यूरोपीय आयोग ने 29 सितंबर को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि यूरोप में डीजल और जेट ईंधन की कीमतें पहले से ऊंची हैं और बाजार में आपूर्ति की तंगी बनी हुई है।
हालांकि आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि यूरोपीय संघ के रणनीतिक भंडार वर्तमान में मजबूत स्तर पर हैं और यदि बाजार में कोई गंभीर आपूर्ति बाधा उत्पन्न होती है तो उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बावजूद, यूरोपीय नीति नियंता इस बात को लेकर बेहद सतर्क हैं कि इन भंडारों को कब, किस मात्रा में और किन शर्तों के तहत बाजार में उतारा जाए। अपनी सुरक्षा कवच को अमेरिकी राजनीतिक दबाव के चलते इस तरह खाली कर देना यूरोपीय देशों के लिए एक बड़ा जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है।
फ्रांस और जर्मनी ही निशाने पर क्यों?
अमेरिकी प्रशासन का खास तौर पर फ्रांस और जर्मनी पर ध्यान केंद्रित करने का एक ऐतिहासिक कारण भी है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इन दोनों देशों ने अतीत में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के तहत आपातकालीन तेल और पेट्रोलियम भंडार बाजार में जारी करने के अपने पुराने वादों को पूरी तरह से नहीं निभाया था। इसी अविश्वास और असंतोष के चलते अमेरिका अब उन पर सीधा और आक्रामक दबाव बना रहा है। इस पूरी खींचतान के बीच यूरोपीय आयोग, फ्रांस और जर्मनी की सरकारों के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बचाने और अमेरिकी गठबंधन के दबाव को संभालने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है।



















