भरतपुर जिले के देहाती इलाकों में इन दिनों खेतों से ताजा बाजरा किसानों के घरों तक पहुंचते ही पारंपरिक देशी खान-पान का दौर फिर शुरू हो गया है। नई फसल के दानों से बनने वाले देशी पकवानों की सौंधी खुशबू गांव की रसोईयों में बिखरने लगी है। इन तमाम देशी व्यंजनों में ताजे बाजरे का दलिया सबसे प्रमुख स्थान रखता है। खेतों से अनाज घर लाने के बाद किसान परिवार पूरी निष्ठा के साथ पारंपरिक तौर-तरीकों से इसे तैयार करते हैं। यह देशी दलिया न केवल अपनी अनोखी मिठास और स्वाद के लिए सराहा जाता है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ग्रामीण जीवनशैली और खान-पान की सांस्कृतिक विरासत को भी जिंदा रखे हुए है।
सफाई और कुटाई की अनूठी देशी विधि
देहाती रसोइयों में बाजरे का दलिया तैयार करने की विधि आधुनिक मशीनी तरीकों से बिल्कुल अलग और बेहद खास होती है। सबसे पहले खेत से आए ताजे बाजरे के दानों को छांटकर अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद दानों को साफ पानी से धोया जाता है और फिर कुछ देर के लिए धूप या खुली हवा में सूखने रख दिया जाता है। जब दानों की बाहरी नमी छंट जाती है और अतिरिक्त पानी सूख जाता है, तब इसे पारंपरिक ओखली में डालकर कूटा जाता है। निरंतर कुटाई के जरिए साबुत बाजरा छोटे-छोटे बारीक दानों में टूट जाता है, जिसके बाद यह दलिया पकाने के लिए पूरी तरह मुफीद बन जाता है।
धीमी आंच पर पकने का सधा हुआ अंदाज
कुटाई पूरी होने के बाद बारीक बाजरे को खौलते हुए गर्म पानी में डालकर पकाने का सिलसिला शुरू होता है। आंच पर चढ़े बर्तन में बाजरा धीरे-धीरे पानी को अपने भीतर सोखता जाता है और गाढ़ा होकर दलिया का रूप धरने लगता है। पकने के इस दौर में इसमें स्वादानुसार सादा नमक और पिसी काली मिर्च जैसे जरूरी मसाले शामिल किए जाते हैं। कई ग्रामीण घरों में लोग अपनी रुचि के अनुसार कुछ अन्य देशी मसाले भी मिलाते हैं, जिससे इस पकवान का स्वाद और महक दोनों कई गुना निखर जाते हैं।
दूध और छाछ के साथ परोसने की परंपरा
तैयार बाजरे के दलिये को आमतौर पर गर्मागर्म दूध या फिर ठंडी छाछ के साथ परोसा जाता है। खेत से सीधे आए ताजे दानों से बनने के कारण इसका प्राकृतिक स्वाद बेहद उम्दा होता है। खासकर सर्द मौसम के आगमन पर देहात के लोग इसे चाव से खाते हैं और इसे अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा मानते हैं। पौष्टिकता, सधी हुई मेहनत और पारंपरिक स्वाद के इसी अनोखे मेल की वजह से आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में ताजे बाजरे के दलिया की मांग लगातार बनी हुई है।



















