राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर तीर्थ को भारतीय परंपरा में समस्त तीर्थस्थलों का गुरु और तीर्थराज का दर्जा प्राप्त है। हर साल कार्तिक मास के दौरान यहां लगने वाला अंतरराष्ट्रीय मेला विश्व भर के पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है, लेकिन इस विशाल आयोजन की मूल आत्मा यहां के पवित्र सरोवर में समाहित धार्मिक आस्था है। हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक की पांच दिनों की अवधि को आत्मिक शुद्धि और विशेष पुण्य संचय के लिए सर्वोत्तम कालखंड माना जाता है। इन पांच विशिष्ट दिनों में देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु सरोवर के पावन जल में डुबकी लगाने के लिए उमड़ते हैं।
सृष्टि रचयिता भगवान ब्रह्मा का महायज्ञ और पांच दिनों की पावन अवधि
पुष्कर क्षेत्र की इस सनातन परंपरा का सीधा संबंध सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है। स्थानीय तीर्थ पुरोहित जयंत राजगुरु के अनुसार प्राचीन धर्मग्रंथों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि भगवान ब्रह्मा ने संपूर्ण जगत के कल्याण और सृष्टि की भलाई के लिए इसी पावन धरा पर एक महान यज्ञ संपन्न किया था। इस ऐतिहासिक अनुष्ठान का आरंभ देवउठनी एकादशी की तिथि पर हुआ था और यह पूरे पांच दिनों तक अनवरत चलते हुए कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूर्णता को प्राप्त हुआ था।
यही कारण है कि एकादशी से पूर्णिमा तक की यह समयावधि अत्यंत पावन मानी जाती है। जैसे ही यह कालखंड शुरू होता है, पुष्कर की पूरी घाटी में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। चारों ओर गूंजती वेद ऋचाएं, मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत पूरे तीर्थ क्षेत्र को एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर देते हैं। इस अनुष्ठान की स्मृति में हर वर्ष इन पांच दिनों को विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का आगमन और 52 घाटों पर महास्नान
पुष्कर सरोवर के चारों ओर बने 52 घाटों पर इन दिनों आस्था का अद्भुत नजारा दिखाई देता है। पुजारी जयंत राजगुरु बताते हैं कि पौराणिक मान्यता के अनुसार देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच स्वर्ग लोक से तैंतीस करोड़ देवी-देवता स्वयं पृथ्वी पर पधारते हैं। वे सभी ब्रह्माजी के उस ऐतिहासिक यज्ञ की साक्षी बनने और सरोवर के पवित्र जल में स्नान करने के उद्देश्य से पुष्कर पहुंचते हैं।
इसी गहरी आध्यात्मिक मान्यता के वशीभूत होकर आम जनमानस भी इन पांच दिनों में पुष्कर के पावन जल में प्रवेश करता है। श्रद्धालु सरोवर के विभिन्न घाटों पर विधिवत दीपदान, तर्पण और अर्चना करते हैं। जनसामान्य में यह दृढ़ विश्वास है कि इस विशिष्ट समयावधि में पुष्कर सरोवर में लगाई गई एक डुबकी मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का क्षय कर देती है और उसे भवसागर के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
धार्मिक अनुष्ठान और जीवंत राजस्थानी संस्कृति का संगम
यह पांच दिवसीय आयोजन केवल कर्मकांडीय स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म और राजस्थान की गौरवशाली लोक परंपराओं के बीच एक जीवंत सेतु का निर्माण करता है। एक तरफ जहां पुष्कर सरोवर और भगवान ब्रह्मा के एकमात्र प्रमुख मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ मेले के मैदान में ऊंटों की दौड़, पशु मेला और स्थानीय लोक संगीत व नृत्य की छटा बिखरती है।
यह अनूठा तालमेल ही पुष्कर को दुनिया के अन्य पारंपरिक मेलों से पूरी तरह अलग पहचान दिलाता है। जहां आधुनिक और विदेशी यात्री यहां की लोक संस्कृति, कला और ग्रामीण जीवन के रंगों को देखने खिंचे चले आते हैं, वहीं श्रद्धालु पूरी निष्ठा के साथ ब्रह्माजी के पावन अनुष्ठान की स्मृति में शीश नवाकर पुण्य के भागीदार बनते हैं।

















