राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में आगामी पंचायती राज चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होते ही सियासी तापमान लगातार चढ़ने लगा है। गांवों की चौपालों, चाय की थड़ियों और सार्वजनिक स्थलों पर चुनावी समीकरणों और उम्मीदवारों की सक्रियता पर गहन बहस छिड़ी हुई है। संभावित दावेदारों ने मतदाताओं को साधने के लिए जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया है, जिसमें सरपंच, वार्ड पंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान और जिला प्रमुख जैसे प्रमुख पदों के लिए गठजोड़ बनने लगे हैं। ग्रामीण मतदाता भी नई सरकार चुनने के साथ-साथ बीते पांच वर्षों के विकास कार्यों का लेखा-जोखा तैयार कर रहे हैं। ग्रामीणों की मुख्य चिंता यह है कि वोट हासिल करने के बाद चुने गए नुमाइंदे उनकी रोजमर्रा की दिक्कतों को सुलझाने में कितनी गंभीरता दिखाएंगे।
शेरपुर में परिसीमन और बदला हुआ सियासी दायरा
सवाई माधोपुर जिले के अंतर्गत आने वाली शेरपुर ग्राम पंचायत का भूगोल और राजनीतिक समीकरण पहले जैसा नहीं रहा है। इस पंचायत को पहले खिलचीपुर के नाम से जाना जाता था। प्रशासनिक परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसमें बदलाव हुआ और अब रामसिंहपुरा तथा कुतलपुरा गांवों को भी शेरपुर पंचायत में जोड़ दिया गया है। इन तीन गांवों के संयोजन के बाद वर्तमान समय में इस पूरी पंचायत में करीब 3600 मतदाता पंजीकृत हैं। नए समीकरणों के तहत 3600 वोटरों की यह आबादी आगामी पंचायती राज चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाली है। गांवों के भीतर संभावित चेहरों को लेकर मंथन चल रहा है और तमाम दावेदार मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए घर-घर दस्तक दे रहे हैं।
प्रतिनिधियों की मौजूदगी पर सवाल और पूर्व नेतृत्व का आकलन
शेरपुर पंचायत क्षेत्र में पिछले कार्यकाल के काम को लेकर जनता की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पूर्व सरपंच ओमप्रकाश सैनी के कार्यकाल को लेकर स्थानीय स्तर पर कई लोग संतोष व्यक्त करते हैं। लोगों का कहना है कि पंचायत स्तर पर अपनी समस्याएं लेकर जाने पर पूर्व सरपंच सुनवाई करते थे और स्थानीय स्तर पर काम आगे बढ़ता था। हालांकि, उच्च स्तरीय जनप्रतिनिधियों को लेकर ग्रामीणों के मन में भारी कसक बनी हुई है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि प्रधान और जिला प्रमुख जैसे बड़े पदों पर आसीन जनप्रतिनिधियों की गांवों में मौजूदगी बेहद कम देखने को मिलती है। लोगों की मांग है कि जो भी प्रतिनिधि चुना जाए, वह केवल वोट मांगने के समय हाथ जोड़ने न आए, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान धरातल पर मौजूद रहकर ग्रामीणों के दुख-दर्द में साझीदार बने। राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो सवाई माधोपुर पंचायत समिति में पूर्व में कांग्रेस की निरमा मीणा प्रधान पद पर रह चुकी हैं, वहीं जिला प्रमुख की कमान भी पूर्व में कांग्रेस की सुदामा मीणा संभाल चुकी हैं। अब आगामी चुनावों की सुगबुगाहट के साथ ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक जोड़-तोड़ का सिलसिला और तेज हो गया है।
सड़कें तो बनीं पर नालियों के अभाव से गंदगी का अंबार
पंचायत के रामसिंहपुरा गांव में विकास कार्यों की हकीकत बेहद पेचीदा नजर आती है। एक तरफ जहां गांव में पक्की सड़कों का निर्माण कराया गया है, वहीं जल निकासी की सुनियोजित व्यवस्था न होना ग्रामीणों के लिए जी का जंजाल बन चुका है। सड़कों के साथ उचित नालियों का निर्माण नहीं कराए जाने से घरों से निकलने वाला गंदा पानी रास्तों पर जमा हो जाता है। गंदे पानी का ठहराव होने से चारों ओर बदबू और गंदगी फैल रही है, जिसके चलते संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा लगातार मंडरा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बुनियादी ढांचे के नाम पर केवल सड़क बिछा देने से काम नहीं चलता, बल्कि उसके साथ नाली निर्माण की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए ताकि जलभराव और गंदगी के संकट से स्थायी छुटकारा मिल सके।
जल जीवन मिशन की अधूरी हकीकत और तीन साल से प्यासे बाशिंदे
रामसिंहपुरा गांव में सबसे ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दा स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति से जुड़ा है। केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के तहत करीब तीन साल पहले गांव में लाखों रुपये की लागत से पानी की विशाल टंकी बनकर तैयार हो गई थी। विडंबना यह है कि निर्माण कार्य पूरा हुए तीन साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी इस टंकी से अब तक घरों में जलापूर्ति शुरू नहीं की जा सकी है। इतना ही नहीं, ग्रामीणों के घरों तक पानी के आवश्यक नल कनेक्शन तक नहीं पहुंचाए गए हैं। लाखों रुपये के सरकारी बजट से तैयार हुआ यह ढांचा पिछले तीन वर्षों से सफेद हाथी बनकर खड़ा है और ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। ग्रामीणों का वाजिब सवाल है कि जब ढांचा बनकर खड़ा हो चुका था, तो प्रशासनिक स्तर पर पानी की नियमित आपूर्ति शुरू कराने में इतनी लंबी देरी क्यों की जा रही है। अब आगामी पंचायती राज चुनाव की चौखट पर खड़े शेरपुर के मतदाता बुनियादी सुविधाओं की इस उपेक्षा को चुनावी बहस के केंद्र में ला चुके हैं। देखना यह होगा कि पेयजल संकट और गंदगी जैसी जमीनी समस्याओं पर मतदाता पुराने चेहरों पर दांव लगाते हैं या फिर किसी नए नेतृत्व को चुनकर व्यवस्था बदलने का फैसला करते हैं।



















