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माउंट आबू में अधर देवी शक्तिपीठ: 365 सीढ़ियां चढ़कर गुफा में होती है मां कात्यायनी की पूजाराजस्थान
12 अक्तू॰ 2026, 6:25 am (19 मिनट पहले)· 1

माउंट आबू में अधर देवी शक्तिपीठ: 365 सीढ़ियां चढ़कर गुफा में होती है मां कात्यायनी की पूजा

सिरोही के प्रसिद्ध हिल स्टेशन माउंट आबू स्थित अर्बुदा देवी मंदिर में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। प्राकृतिक गुफा में स्थित इस शक्तिपीठ को राजस्थान का वैष्णो देवी भी कहा जाता है।

सिरोही जिले के खूबसूरत हिल स्टेशन माउंट आबू में स्थित अर्बुदा देवी शक्तिपीठ में नवरात्रि के पावन पर्व पर आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। इस पावन स्थल को स्थानीय परंपरा में अधर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ऊंची पहाड़ी पर प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित होने और कठिन चढ़ाई के कारण श्रद्धालु इस पावन धाम को राजस्थान का वैष्णो देवी भी कहकर पुकारते हैं। गुफा के आंतरिक गर्भगृह में मां भगवती नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विराजमान हैं, जिनके दर्शन के लिए नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक यहां मेले जैसा जीवंत वातावरण बना रहता है।

पौराणिक कथा और शक्तिपीठ का पावन इतिहास

इस पवित्र तीर्थ स्थल से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब इसी स्थान पर माता सती के अधर यानी होंठ गिरे थे। होंठ गिरने के कारण ही इस धाम का नाम अधर देवी पड़ा। एक अन्य धार्मिक मान्यता के मुताबिक, इसी पहाड़ी के निचले हिस्से में मां अर्बुदा देवी ने वास्कली नामक अत्याचारी राक्षस का संहार किया था और देवताओं तथा ऋषि-मुनियों को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। पहाड़ी पर माता के पावन चरण पादुका के निशान आज भी मौजूद हैं, जिनकी श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं।

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5500 वर्ष प्राचीन इतिहास और परमार शासकों की कुलदेवी

धार्मिक ग्रंथों में इस पावन स्थल का विशेष स्थान है, और स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में इस तीर्थ का विस्तृत उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का इतिहास लगभग 5500 वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहास के पन्नों में अधर देवी को आबू क्षेत्र के परमार वंश के शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। नवरात्रि के शुभ अवसर पर यहां केवल सिरोही जिले से ही नहीं, बल्कि समूचे राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल पदयात्रा करते हुए माता के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालु राहुल कुमार बताते हैं कि यहां माता की पूजा नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विधि-विधान से संपन्न होती है।

नक्की झील से दूरी और 365 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई

पहाड़ी पर बसे इस शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को माउंट आबू की विख्यात नक्की झील से लगभग 2 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसके उपरांत मुख्य मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर बनी करीब 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। मंदिर की मर्यादा और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से आंतरिक परिसर में कैमरा ले जाने अथवा किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी करने की सख्त मनाही है, इसलिए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाहर ही जमा करवा लिए जाते हैं।

प्राकृतिक संकरी गुफा, अमृत कुंड और दूध बावड़ी

मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश करने का मार्ग अत्यंत अनूठा और चुनौतीपूर्ण है। श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर बने एक बेहद संकरे रास्ते से झुककर प्राकृतिक गुफा के भीतर दाखिल होना पड़ता है। मंदिर में माता के पावन पद चिह्नों की आराधना की जाती है, जबकि मुख्य गर्भगृह में सिंह पर आरूढ़ मां भगवती की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मंदिर परिसर में एक दिव्य अमृत कुंड मौजूद है, जिसके बारे में मान्यता है कि भीषण सूखे के दौर में भी इसका जल कभी सूखा नहीं। वहीं पहाड़ी की तलहटी में स्थित दूध बावड़ी भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां का जल देखने में बिल्कुल सफेद दूध जैसा प्रतीत होता है।

सवाल-जवाब

माउंट आबू के अर्बुदा देवी मंदिर को अधर देवी क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि भगवान शिव के तांडव के दौरान माता सती के अधर यानी होंठ इसी स्थान पर गिरे थे, इसलिए इसे अधर देवी कहा जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं?
श्रद्धालुओं को नक्की झील से करीब 2 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं।
इस शक्तिपीठ में माता के किस स्वरूप की पूजा की जाती है?
गुफा के अंदर माता के चरण पादुका पूजे जाते हैं और नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा होती है, जिनका विग्रह सिंह पर सवार है।
मंदिर परिसर के पवित्र कुंडों की क्या विशेषता है?
मंदिर परिसर में अमृत कुंड है जो सूखे में भी नहीं सूखा था, जबकि तलहटी में स्थित दूध बावड़ी का पानी सफेद दूध जैसा दिखाई देता है।
क्या मंदिर के अंदर फोटोग्राफी की अनुमति है?
नहीं, मंदिर के अंदर कैमरा ले जाने अथवा किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी करने की सख्त मनाही है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 मिनट पहले

365 सीढ़ियां चढ़कर गुफा तक पहुंचना और फोन अंदर न ले जाना—यह सब तो ठीक है, पर 5500 साल पुराना इतिहास होने का दावा थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लगता है क्योंकि इतने पुराने पत्थरों के पक्के सबूत कहां हैं?

Rohan Verma@rohan-verma·3 मिनट पहले

करण भाई, ASI के रिकॉर्ड उठा के देख लो, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई मंदिरों में हज़ारों साल पुराना इतिहास मिलता है, प्रमाण भी हैं।

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