सिरोही जिले के खूबसूरत हिल स्टेशन माउंट आबू में स्थित अर्बुदा देवी शक्तिपीठ में नवरात्रि के पावन पर्व पर आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। इस पावन स्थल को स्थानीय परंपरा में अधर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ऊंची पहाड़ी पर प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित होने और कठिन चढ़ाई के कारण श्रद्धालु इस पावन धाम को राजस्थान का वैष्णो देवी भी कहकर पुकारते हैं। गुफा के आंतरिक गर्भगृह में मां भगवती नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विराजमान हैं, जिनके दर्शन के लिए नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक यहां मेले जैसा जीवंत वातावरण बना रहता है।
पौराणिक कथा और शक्तिपीठ का पावन इतिहास
इस पवित्र तीर्थ स्थल से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब इसी स्थान पर माता सती के अधर यानी होंठ गिरे थे। होंठ गिरने के कारण ही इस धाम का नाम अधर देवी पड़ा। एक अन्य धार्मिक मान्यता के मुताबिक, इसी पहाड़ी के निचले हिस्से में मां अर्बुदा देवी ने वास्कली नामक अत्याचारी राक्षस का संहार किया था और देवताओं तथा ऋषि-मुनियों को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। पहाड़ी पर माता के पावन चरण पादुका के निशान आज भी मौजूद हैं, जिनकी श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं।
5500 वर्ष प्राचीन इतिहास और परमार शासकों की कुलदेवी
धार्मिक ग्रंथों में इस पावन स्थल का विशेष स्थान है, और स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में इस तीर्थ का विस्तृत उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का इतिहास लगभग 5500 वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहास के पन्नों में अधर देवी को आबू क्षेत्र के परमार वंश के शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। नवरात्रि के शुभ अवसर पर यहां केवल सिरोही जिले से ही नहीं, बल्कि समूचे राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल पदयात्रा करते हुए माता के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालु राहुल कुमार बताते हैं कि यहां माता की पूजा नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विधि-विधान से संपन्न होती है।
नक्की झील से दूरी और 365 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई
पहाड़ी पर बसे इस शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को माउंट आबू की विख्यात नक्की झील से लगभग 2 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसके उपरांत मुख्य मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर बनी करीब 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। मंदिर की मर्यादा और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से आंतरिक परिसर में कैमरा ले जाने अथवा किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी करने की सख्त मनाही है, इसलिए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाहर ही जमा करवा लिए जाते हैं।
प्राकृतिक संकरी गुफा, अमृत कुंड और दूध बावड़ी
मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश करने का मार्ग अत्यंत अनूठा और चुनौतीपूर्ण है। श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर बने एक बेहद संकरे रास्ते से झुककर प्राकृतिक गुफा के भीतर दाखिल होना पड़ता है। मंदिर में माता के पावन पद चिह्नों की आराधना की जाती है, जबकि मुख्य गर्भगृह में सिंह पर आरूढ़ मां भगवती की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मंदिर परिसर में एक दिव्य अमृत कुंड मौजूद है, जिसके बारे में मान्यता है कि भीषण सूखे के दौर में भी इसका जल कभी सूखा नहीं। वहीं पहाड़ी की तलहटी में स्थित दूध बावड़ी भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां का जल देखने में बिल्कुल सफेद दूध जैसा प्रतीत होता है।




















