शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर देशभर के शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। राजस्थान के सीकर जिले की अरावली पर्वतमाला में स्थापित जीण माता सिद्ध पीठ में नवरात्र के दिनों में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है। प्राकृतिक पहाड़ियों की गोद में बसा यह प्राचीन तीर्थ अपनी आध्यात्मिक आस्था, समृद्ध लोककथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं के लिए पूरे देश में विख्यात है। नवरात्र के नौ दिनों तक चलने वाले मेले में दूर-दराज के इलाकों से लाखों श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं, जहां सदियों पुरानी परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं।
सीकर से 30 किलोमीटर दूर स्थित है सिद्ध पीठ
जीण माता का यह धाम सीकर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जीणमाता गांव में बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर हजारों साल पुराना है। हालांकि, इसके प्रारंभिक निर्माण काल से जुड़े कोई स्पष्ट और प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह माना जाता है कि लगभग 300 साल पहले इस भव्य मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार कराया गया था।
धार्मिक परंपरा में जीण माता को साक्षात मां दुर्गा का रूप मानकर पूजा जाता है। राजस्थान के शेखावाटी अंचल में कई समुदायों और जातियों के लोग उन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं। यही वजह है कि राजस्थान के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु नियमित रूप से यहां आते हैं। इस सिद्ध पीठ में नवजात शिशुओं के मुंडन यानी जड़ूले उतारने की भी गहरी परंपरा है, जिसे परिवार की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
हर्ष और जीण माता के स्नेह से जुड़ी लोककथा
माता के प्राकट्य और उनकी कठोर तपस्या के पीछे एक अत्यंत मार्मिक लोककथा प्रचलित है। परंपरा के अनुसार, जीण माता का जन्म चौहान वंश के एक प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में हुआ था। वह अपने भाई हर्ष से अगाध स्नेह रखती थीं। एक बार वह अपनी भाभी के साथ गांव के तालाब पर पानी भरने गईं। वहां दोनों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि हर्ष अपनी बहन और पत्नी में से किसे अधिक चाहता है।
आपसी सहमति से दोनों ने तय किया कि घर पहुंचने पर हर्ष जिसके सिर से पानी का घड़ा पहले उतारेगा, वही उसे अधिक प्रिय होगी। जब दोनों घर पहुंचीं, तो हर्ष ने अनजाने में पहले अपनी पत्नी के सिर से मटका उतार दिया। इस घटना से जीण माता के हृदय को गहरी ठेस पहुंची। वह घर छोड़कर सीधे अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित काजल शिखर पर चली गईं और वहां कठिन तपस्या में लीन हो गईं।
जब भाई हर्ष को इस पूरे विवाद और गलतफहमी का पता चला, तो वह अपनी बहन को मनाने के लिए काजल शिखर पहुंचा। लाख समझाने के बावजूद जीण माता ने गृहस्थ जीवन और घर लौटने से साफ मना कर दिया। बहन के अटल निश्चय को देखकर हर्ष ने भी वहीं रुकने का फैसला किया और पास की पहाड़ी पर भगवान भैरव की कठोर साधना शुरू कर दी। वर्तमान समय में भी जीण माता मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित ऊंची पहाड़ी की चोटी पर हर्ष भैरव नाथ का मंदिर मौजूद है, जहां श्रद्धालु दर्शन करने जाते हैं।
मुगल सेना पर मधुमक्खियों का हमला और अखंड ज्योत की शुरुआत
इस सिद्ध पीठ से जुड़ी सबसे ऐतिहासिक और लोकप्रिय किंवदंती मुगल शासक औरंगजेब के दौर की है। कहा जाता है कि जब औरंगजेब की सेना मंदिरों को ध्वस्त करते हुए इस इलाके तक पहुंची, तो उसने पहले हर्षनाथ भैरव मंदिर में तोड़फोड़ कराई। इसके बाद मुगल सैनिक जीण माता के मुख्य मंदिर की ओर आगे बढ़ने लगे।
मंदिर को संकट में देख स्थानीय निवासियों और पुजारियों ने माता से रक्षा की गुहार लगाई। लोककथा के अनुसार, उसी क्षण विशाल मधुमक्खियों के झुंड ने मुगल सेना पर अचानक हमला बोल दिया। मधुमक्खियों के डंक और आक्रामक प्रहार के आगे सैनिक टिक नहीं सके और उन्हें जान बचाकर उल्टे पैर भागना पड़ा। इस अप्रत्याशित घटना से प्रभावित होकर औरंगजेब ने अपनी भूल स्वीकार की और मंदिर में अखंड ज्योत प्रज्वलित करवाई।
दिल्ली दरबार से लेकर जयपुर राजघराने तक का ऐतिहासिक नाता
मान्यताओं के अनुसार, उस घटना के बाद से दिल्ली दरबार की ओर से मंदिर की अखंड ज्योत के लिए नियमित रूप से तेल भेजा जाता था। कालांतर में यह व्यवस्था जयपुर के राजघराने के अधीन आ गई। जयपुर के महाराजा ने इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए हर महीने के स्थान पर साल में दो बार, नवरात्र के पावन अवसरों पर तेल भेजने का नियम तय किया। आज भी जीण माता के मंदिर में जलने वाली यह अखंड ज्योत भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जिसके दर्शन के लिए नवरात्र मेले में विशाल जनसमूह उमड़ता है।



















