पश्चिमी राजस्थान में भारत और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे जैसलमेर जिले में स्थित बारह सौ वर्ष प्राचीन तनोट राय मंदिर प्रांगण रविवार को भक्तिभाव और जयकारों से गूंज उठा। घट स्थापना की पावन रस्म के साथ ही इस सीमांत तीर्थ में दस दिवसीय नवरात्रि महोत्सव की विधिवत शुरुआत हो गई। धार्मिक अनुष्ठान के आरंभिक चरण में पारंपरिक वाद्ययंत्रों और ढोल की थाप के बीच भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसके बाद मुख्य मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन-यज्ञ संपन्न हुआ। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 26वीं वाहिनी के कमांडेंट लिन्जकाई सितलऊ सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों तथा जवानों ने इस पावन यज्ञ में आहुतियां अर्पित कीं। अनुष्ठान संपन्न होने के उपरांत विशाल जनसमूह ने महाआरती में सम्मिलित होकर प्रसाद ग्रहण किया।
सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों की मौजूदगी और धार्मिक अनुष्ठान
इस धार्मिक आयोजन के दौरान बीएसएफ की 26वीं बटालियन के द्वितीय कमान अधिकारी (2IC) मदन गोयल, 2IC दीपांकर शर्मा, उप कमांडेंट अनमोल भगत और सुशील कुमार सहित कई सैन्य अधिकारी और जवान उपस्थित रहे। नवरात्रि पर्व के प्रथम दिवस ही देश के अलग-अलग प्रांतों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। तय कार्यक्रम के अनुसार, रविवार को पहले दिन मां भगवती की तीन विशेष आरतियों का विधान पूरा किया गया। पूरे नवरात्रि पर्व के दौरान प्रतिदिन तीन समय नियमित आरती की जाएगी, जबकि सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं के लिए निरंतर विशाल भंडारे का संचालन किया जा रहा है।
प्रशासनिक प्रबंधन और सुगम दर्शन की व्यवस्था
श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बीएसएफ राजस्थान फ्रंटियर के महानिरीक्षक (आईजी) के मार्गदर्शन तथा बीएसएफ नॉर्थ सेक्टर के उप महानिरीक्षक (डीआईजी) जितेंद्रसिंह बिंजी के दिशा-निर्देशन में पुख्ता प्रबंध किए गए हैं। जिला मुख्यालय जैसलमेर से तकरीबन 120 किलोमीटर की दूरी पर रेत के धोरों के बीच स्थित इस देवालय में पहले ही दिन बीस हजार से अधिक दर्शनार्थियों ने शीश नवाकर परिवार व देश के लिए सुख-शांति का आशीर्वाद मांगा। लंबी कतारों के बावजूद सुरक्षा बलों की सतर्कता से दर्शन का क्रम अनवरत और शांतिपूर्ण तरीके से चलता रहा।
आकर्षक रोशनी और विशेष नागरिक सुविधाएं
त्योहार के उपलक्ष्य में पूरे मंदिर परिसर को नयनाभिराम विद्युत रोशनी और सजावटी वस्तुओं से भव्य रूप दिया गया है। प्रांगण के बाहरी हिस्से में एक विशाल एलसीडी स्क्रीन भी स्थापित की गई है, ताकि मुख्य भवन में अधिक दबाव होने पर दूर खड़े श्रद्धालु भी आरती व गर्भगृह के सीधे दर्शन कर सकें। उल्लेखनीय है कि इस पवित्र स्थल में पूजा-अर्चना का दायित्व सीमा सुरक्षा बल के जवान ही बतौर पुजारी निभाते हैं। मंदिर के रख-रखाव के अतिरिक्त भोजन वितरण, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं की देखरेख भी जवानों के जिम्मे है। किसी भी आपात स्वास्थ्य स्थिति से निपटने के लिए परिसर में समर्पित चिकित्सा शिविर लगाया गया है, जहां आवश्यक दवाइयां व स्वास्थ्य कर्मी तैनात हैं।
पैदल जत्थों का आगमन और घंटियाली माता मंदिर में पूजा
अधिकारियों के मुताबिक, सीमांत धाम के प्रति जनमानस में अगाध श्रद्धा है, जिसके चलते कई श्रद्धालु मीलों की दूरी पैदल तय करके धोक लगाने पहुंच रहे हैं। आने वाले तीर्थयात्रियों की जरूरतों को देखते हुए आसपास विभिन्न प्रकार की दुकानें भी सज गई हैं। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र होने के मद्देनजर सुरक्षा का कड़ा पहरा बैठाया गया है, जिसमें बीएसएफ कर्मियों के साथ स्थानीय पुलिस बल का समन्वय भी शामिल है। इसी धार्मिक शृंखला में निकटवर्ती घंटियाली माता मंदिर में भी घट स्थापना की रस्म संपन्न की गई, जहां भक्तों ने यज्ञवेदी में आहुतियां देकर आराधना की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युद्ध काल की मान्यताएं
तनोट माता के प्रति जनमानस और भारतीय सेना का अटूट विश्वास वर्ष 1965 तथा वर्ष 1971 के सैन्य संघर्षों की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना की ओर से मंदिर और उसके आसपास के इलाके को निशाना बनाकर सैकड़ों विस्फोटक गोले बरसाए गए थे, परंतु माता के चमत्कार के चलते परिसर के भीतर गिरा एक भी गोला फटा नहीं। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम ने स्थानीय ग्रामीणों और सीमा प्रहरियों के भीतर देवी के प्रति असीम आस्था भर दी। वर्ष 1965 के युद्ध के बाद सैन्य बलों ने इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण, विस्तार और संपूर्ण प्रबंधन की कमान अपने हाथों में ले ली।



















