शक्ति उपासना के पावन पर्व शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया है। हरियाणा के अंबाला में स्थित ऐतिहासिक मां अंबिका देवी मंदिर में तड़के से ही भक्तों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। यह पावन धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अंबाला के अस्तित्व और उसकी सदियों पुरानी पहचान से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे शहर का नामकरण ही मां अंबा देवी के पावन नाम पर हुआ था। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान इस पावन धाम के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को कई गुना बढ़ा देती है।
शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की पूरी अवधि में नौ दिनों तक मां भगवती की आराधना करने से परिवार में सुख, शांति तथा आर्थिक संपन्नता का वास होता है। इसी अटूट विश्वास के सहारे श्रद्धालु बड़ी संख्या में मां अंबिका देवी के चरणों में शीश नवाने पहुंच रहे हैं। नवरात्रि के इस महापर्व के सुचारू संचालन के लिए मंदिर प्रबंधन की ओर से विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं।
300 वर्ष से अधिक प्राचीन स्थापत्य और दीवारों पर उकेरी कलाकृतियां
मां अंबिका देवी का यह पावन धाम 300 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। समय के कई थपेड़े सहने के बाद भी यह स्थल अपने ऐतिहासिक वैभव को संजोए हुए है। मंदिर की छत और दीवारों पर उकेरी गई खूबसूरत पेंटिंग तथा प्राचीन वास्तुकला आज भी बीते जमाने की भव्य कलात्मकता की गवाही देती है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना के साथ-साथ क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को करीब से देखने का अवसर मिलता है।
मंदिर में देवी की पूजा किसी साधारण प्रतिमा के बजाय अत्यंत पावन पिंडी स्वरूप में की जाती है। यह पावन पिंडी मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन काल से ही विराजमान है और भक्तजन इसी स्वरूप के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
कोलकाता से आए सुगंधित पुष्प और मेवों से भव्य श्रृंगार
नवरात्रि के पावन अवसर पर माता रानी के दरबार को भव्य रूप से सजाया गया है। माता रानी के दैनिक अलौकिक श्रृंगार के लिए विशेष रूप से कोलकाता से ताजे सुगंधित फूल मंगवाए गए हैं। नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक मां अंबिका देवी का प्रतिदिन एक नए और अनूठे स्वरूप में दिव्य श्रृंगार संपन्न किया जाएगा।
फूलों के अलावा संध्या आरती के समय मेवों से माता रानी का विशेष श्रृंगार करने की एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इस विशेष श्रृंगार के संपन्न होने के बाद इन सभी मेवों को एकत्र कर दर्शन करने आए भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया जाता है। इस दिव्य श्रृंगार और पवित्र प्रसाद को प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
दुर्गम राक्षस के वध की पौराणिक कथा और शहर की उत्पत्ति
मां अंबिका देवी को साक्षात आदिशक्ति का पावन स्वरूप माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के मुताबिक, प्राचीन काल में जब दुर्गम नामक क्रूर राक्षस का आतंक बढ़ गया था, तब देवी ने उसका वध कर तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। दुर्गम का वध करने के कारण ही उन्हें मां दुर्गा के रूप में भी पूज्य स्थान प्राप्त हुआ।
धार्मिक मान्यताओं में यह तथ्य भी स्थापित है कि इस पावन मंदिर का अस्तित्व अंबाला शहर की विधिवत बसावट से भी पहले का है। शहर की समूची पहचान और इसका नाम मां अंबा देवी की इसी पावन धरा से उपजा है। इस कारण मंदिर की ऐतिहासिक बनावट और इसकी आध्यात्मिक जड़ें पूरे शहर के गौरव का प्रतीक मानी जाती हैं।
पीढ़ियों पुराना जुड़ाव और दूर-दराज से पहुंचते श्रद्धालु
इस दरबार से जुड़े भक्तों की निष्ठा पीढ़ियों पुरानी है। दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु अमरनाथ ने साझा किया कि उनका इस दरबार से लगभग 50 वर्ष पुराना अटूट रिश्ता है। वह अपने बचपन के दिनों से ही यहां निरंतर आ रहे हैं, और उनसे पहले उनके माता-पिता तथा पूर्वज भी इसी मंदिर में नियमित हाजिरी लगाते थे। उन्होंने संकल्प लिया है कि वह नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक सुबह और शाम दोनों समय मां के पावन दर्शन करने उपस्थित रहेंगे।
वहीं अंबाला शहर के मॉडल टाउन इलाके के रहने वाले अमित कुमार ने बताया कि मां अंबिका देवी के प्रति उनकी गहरी आस्था है। वह अपने मन की मुरादें लेकर मां के चरणों में आए हैं और मंदिर में शीश नवाने के बाद वह अपने घर पर विधि-विधान से मां शेरावाली के पवित्र कलश की स्थापना करेंगे।
मां अंबिका देवी के प्रति आस्था केवल अंबाला तक ही सीमित नहीं है। नवरात्रि के इस शुभ अवसर पर पड़ोसी राज्यों पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं का यह भारी जमावड़ा दर्शाता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोगों का अपनी आध्यात्मिक जड़ों और ऐतिहासिक संस्कृति के प्रति समर्पण पूरी तरह अडिग है।





















