राजस्थान के नागौर जिले में रबी की फसलों की हलचल तेज होते ही किसान उन विकल्पों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं जो कम अवधि में तैयार होकर बाजार में जोरदार मुनाफा दे सकें। इसी कड़ी में पान मैथी की खेती को लेकर किसानों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। अक्टूबर से नवंबर के महीनों के बीच इलाके के काश्तकार खेतों को तैयार कर बुवाई की योजना बना रहे हैं। जानकारों के मुताबिक इस फसल के लिए ठंडा और शुष्क वातावरण सबसे मुफीद माना जाता है। इस पारंपरिक उपज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि काश्तकार पहले ताजी हरी पत्तियों की बिक्री कर सकते हैं और बाद में बची हुई फसल को सुखाकर सूखी मैथी के तौर पर भी बेच सकते हैं, जिससे किसानों को दोहरी आमदनी का अवसर मिलता है।
बुवाई का सही वक्त और मौसम का असर
कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार पान मैथी की बेहतर पैदावार सुनिश्चित करने के लिए अक्टूबर से नवंबर का समय सबसे उपयुक्त रहता है। अत्यधिक तेज धूप, गर्मी अथवा जमीन में लगातार अत्यधिक नमी बने रहना इस फसल की बढ़वार को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। बुवाई के दौरान यदि वातावरण में हल्की ठंडक घुली रहे, तो बीजों के अंकुरण के साथ ही छोटे पौधों का विकास बेहद तेजी से होता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने इलाके के तापमान, स्थानीय मौसम के मिजाज और खेत की वास्तविक नमी को ध्यान में रखकर ही बुवाई की तारीख निर्धारित करें।
खेत की तैयारी और जमीन को भुरभुरा बनाना
उपज को भरपूर बनाने के लिए जमीन की तैयारी प्राथमिक और बेहद निर्णायक चरण है। विशेषज्ञ का कहना है कि खेत की कई बार अच्छी जुताई की जानी चाहिए ताकि ऊपरी मिट्टी पूरी तरह भुरभुरी हो सके। जब मिट्टी बारीक और खुली होती है, तो बीजों का अंकुरण एक समान और तेजी से होता है। इसके साथ ही खेत में जलभराव की स्थिति बिल्कुल नहीं बननी चाहिए, लिहाजा जरूरत के मुताबिक जल निकासी के लिए उचित नालियां बनाना बेहद जरूरी है। जुताई के बाद खेत को पाटा लगाकर समतल कर लेना चाहिए। समतल जमीन पर सीधी कतारें बनाकर बुवाई करने से आने वाले दिनों में सिंचाई करने, खरपतवार निकालने और निराई-गुड़ाई करने में काफी सहूलियत रहती है।
बीज का चयन, कतारों में दूरी और देखभाल के नियम
फसल की गुणवत्ता सीधे तौर पर बीज की शुद्धता पर निर्भर करती है। काश्तकारों को हमेशा साफ-सुथरे और प्रमाणित बीजों का ही चयन करना चाहिए। बुवाई के दौरान बीजों को मिट्टी में बहुत ज्यादा गहराई पर दबाने से बचना चाहिए, बल्कि उन्हें एक संतुलित गहराई पर ही बोया जाए ताकि अंकुर आसानी से बाहर निकल सके। कतारबद्ध तरीके से बुवाई करने का बड़ा लाभ यह होता है कि पौधों के बीच हवा का आवागमन सुचारू बना रहता है। इससे धूप पौधों की जड़ों तक पहुंचती है और खरपतवारों की पहचान कर उन्हें निकालना बेहद आसान हो जाता है। बीज की कुल मात्रा खेत की मिट्टी के प्रकार और बुवाई की तकनीक के आधार पर तय की जानी चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन के संदर्भ में विशेषज्ञ बताते हैं कि पान मैथी को आवश्यकतानुसार केवल हल्की सिंचाई की दरकार होती है। खेत में अधिक पानी जमा होने या अत्यधिक पानी देने से पौधों की नाजुक जड़ें गलने लगती हैं और फसल सड़ सकती है। शुरुआती दौर में खेत में उगने वाले अनावश्यक खरपतवार पौधों की खुराक और रोशनी छीन लेते हैं, जिससे उनकी बढ़वार धीमी पड़ जाती है। इस कारण तय समय अंतराल पर निराई-गुड़ाई करके खेत को साफ रखना चाहिए। किसानों को चाहिए कि वे अपने खेतों का लगातार मुआयना करते रहें और जैसे ही किसी रोग या हानिकारक कीट के लक्षण दिखाई दें, बिना देर किए फौरन उनका उपचार करें।
हरी पत्तियों से लेकर सूखी मैथी तक बिक्री के खुले विकल्प
पान मैथी की सबसे खास बात यह है कि इसका बाजार केवल एक रूप में सीमित नहीं रहता। फसल तैयार होने पर काश्तकार सीधे ताजी हरी पत्तियां काटकर नजदीकी मंडियों में बेच सकते हैं। वहीं कई काश्तकार पत्तियों को वैज्ञानिक या पारंपरिक तरीके से सुखाकर सूखी मैथी तैयार करते हैं और फिर उसे बाजार में उतारते हैं। इस लचीलेपन की वजह से किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव को भांपकर अपनी उपज बेचने का पूरा मौका मिलता है। नागौर की पान मैथी की खुशबू और गुणवत्ता के चलते स्थानीय बाजारों के अलावा देश के कई राज्यों में इसकी जबरदस्त मांग बनी रहती है। हालांकि इसके दाम हमेशा एक जैसे नहीं रहते। मंडियों में आवक की तेजी या खरीदारों की मांग में सुस्ती आने पर इसके भावों में लगातार फेरबदल देखने को मिलता है।


















