पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध व तर्पण का विशेष विधान माना गया है। सनातन परंपरा के तहत श्राद्ध के दिनों में कौवे को भोजन अर्पित करने का रिवाज अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। पौराणिक आस्था के अनुसार पितर कौवे का रूप लेकर धरती पर पधारते हैं और परिजनों द्वारा श्रद्धापूर्वक दिया गया ग्रास स्वीकार करते हैं। मौजूदा दौर में तेजी से फैलते शहरीकरण और पर्यावरण में आए बदलावों की वजह से अब शहरों व कस्बों में कौवों का दिखाई देना काफी दुर्लभ हो गया है। कई घरों में लोग घंटों तक छतों या मुंडेरों पर कौवों का इंतजार करते हैं, फिर भी निराशा मिलती है। ऐसी स्थिति में श्रद्धालुओं के सामने यह दुविधा खड़ी हो जाती है कि कौवा न मिलने की सूरत में श्राद्ध का अन्न किसे अर्पित किया जाए।
अन्य प्राणियों को भोजन देकर पूरी करें परंपरा
इस सामान्य समस्या पर भीलवाड़ा मुख्यालय के नगर व्यास पंडित कमलेश व्यास ने श्रद्धालुओं के संशय को दूर करते हुए मार्गदर्शन दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पितृ पक्ष पूरी तरह से पूर्वजों के प्रति निष्ठा, श्रद्धा और सेवा की भावना से जुड़ा पर्व है। हालांकि कर्मकांड में कौवे को भोजन खिलाने का खास महत्व बताया गया है, मगर कौवे की अनुपस्थिति में किसी को भी व्यर्थ चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। यदि कौवा न मिले तो श्रद्धालु अन्य बेजुबान जीवों को भोजन कराकर अनुष्ठान पूर्ण कर सकते हैं। इसके तहत गाय को ताजी रोटी या हरा चारा दिया जा सकता है, कुत्ते को सात्विक आहार कराया जा सकता है और चींटियों के लिए आटा या शक्कर मिला दाना डाला जा सकता है। इसके साथ ही घर की छत या खुले मैदान में बाजरा, ज्वार अथवा अन्य मोटे अनाज रखकर आसपास मौजूद विभिन्न पक्षियों की भूख शांत की जा सकती है।
जीव दया और परोपकार ही है अनुष्ठान का मूल भाव
पंडित कमलेश व्यास के मुताबिक पशु-पक्षियों को भोजन खिलाने का मुख्य ध्येय केवल औपचारिकता या कर्मकांड पूरा करना भर नहीं है। इस पूरी व्यवस्था की मूल आत्मा प्रकृति, जीव दया और निस्वार्थ परोपकार से जुड़ी हुई है। सनातन संस्कृति में समस्त प्राणियों और पर्यावरण की सेवा को सदैव सर्वोच्च धर्म के रूप में देखा गया है। जब कोई व्यक्ति किसी मूक जीव या पक्षी को आहार देकर तृप्त करता है, तो उससे अर्जित पुण्य सीधे पितरों तक पहुंचता है और उनकी तृप्ति का साधन बनता है। अनेक कुलों में यह व्यवस्था पीढ़ियों से चली आ रही है कि श्राद्ध की रसोई तैयार होते ही सबसे पहला भाग पशु-पक्षियों के निमित्त अलग सुरक्षित रख दिया जाता है।
भोजन अर्पित करते समय इन सावधानियों का रखें ध्यान
बेजुबान जीवों को श्राद्ध का आहार देते वक्त कुछ आवश्यक नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें सबसे मुख्य बात स्वच्छता और आहार की सात्विकता की है। प्राणियों को परोसा जाने वाला भोजन पूरी तरह स्वच्छ, ताजा और शुद्ध होना चाहिए। बासा, खराब या ऐसा कोई भी खाद्य पदार्थ जानवरों या पक्षियों को न दिया जाए जिससे उनकी सेहत को किसी प्रकार की हानि पहुंचे। पंडित व्यास ने यह भी बताया कि विभिन्न प्रांतों और कुलों में श्राद्ध से जुड़े तौर-तरीकों में थोड़ा-बहुत भेद हो सकता है। अतः हर परिवार अपनी पारंपरिक मान्यताओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार यह कर्म कर सकता है। सच्चे मन से किया गया अन्नदान और जीवों की भलाई ही पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का सबसे श्रेष्ठ जरिया है, जिससे समाज में दया का भाव भी मजबूत होता है।



















