मानसून के शुरुआती दौर में जोरदार बारिश से उत्साहित होकर किसानों ने खरीफ फसलों की व्यापक बुवाई की थी, मगर अब मौसम के बदले रुख ने खेतों में संकट खड़ा कर दिया है। अगस्त बीतने के बाद सितंबर के शुरुआती पखवाड़े में वर्षा का अंतराल काफी लंबा खिंच गया, जिससे खेतों की ऊपरी और भीतरी नमी तेजी से सूखने लगी है। इस सूखे का सीधा नकारात्मक प्रभाव अक्टूबर के दौरान फसलों के विकास, नए फूल खिलने तथा फलियों में दाने के सही भराव पर पड़ रहा है। खेतों में खड़ी फसलों में इस समय सबसे ज्यादा नुकसान ग्वार में महसूस किया जा रहा है।
शुरुआती मानसूनी बारिश के बाद बदला मौसम का चक्र
जिले भर में सावन और भादो की शुरुआत के समय पर्याप्त बारिश दर्ज की गई थी, जिसके चलते बारानी क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर बुवाई पूरी कर ली गई थी। शुरुआती नमी के सहारे खेत लहलहा उठे और ग्वार, बाजरा, मूंग, मोठ और कपास की प्रारंभिक बढ़वार बेहद शानदार रही। इस अनुकूल स्थिति को देखकर किसानों को बंपर पैदावार की पूरी उम्मीद बंध गई थी। हालांकि बारिश के अचानक थम जाने और एक लंबे शुष्क दौर के शुरू होने से अब खेतों में मेहनत करने वाले किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।
नमी के अभाव से ग्वार के पौधों पर प्रतिकूल प्रभाव
वर्तमान समय में ग्वार की फसल फलियां तैयार होने और दानों के विकास की अत्यंत नाजुक अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ के अनुसार इस चरण में जमीन के भीतर संतुलित नमी का होना बेहद जरूरी होता है। यदि मिट्टी में नमी का स्तर घटता है, तो पौधों की स्वाभाविक बढ़वार बाधित हो जाती है और उनमें फूल तथा फलियां कम संख्या में बनते हैं। इसके अलावा फलियों के भीतर दाना ठीक से नहीं पक पाता और उसका आकार छोटा रह जाता है। इसी तकनीकी कारण से खेतों में ग्वार के पौधों पर मौसम की बेरुखी का सबसे गहरा असर देखने को मिल रहा है।
मूंग और मोठ की फसलों में भी कमजोरी के संकेत
पानी के इस लंबे अंतराल की मार केवल ग्वार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दलहनी फसलों जैसे मूंग और मोठ पर भी इसका साफ असर दिखाई देने लगा है। इन फसलों में भी फलियां बनने का दौर शुरू होने की कगार पर है, परंतु जमीन में नमी की भारी कमी के कारण कई इलाकों में पौधों की तंदुरुस्ती कमजोर पड़ने लगी है। लगभग दो माह की हो चुकी इन खरीफ फसलों को इस समय सिंचाई या हल्की बारिश की सख्त आवश्यकता है। यदि आने वाले दिनों में अनुकूल बारिश नहीं हुई, तो कुल उत्पादन में तीव्र गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की महीनों की लागत और परिश्रम पर पानी फिर जाएगा।
सीकर जिले में फसलों का रकबा और उत्पादन का गणित
इस खरीफ सीजन में जिले के भीतर कुल 4,25,464 हेक्टेयर कृषि भूमि पर विभिन्न फसलों की बुवाई संपन्न हुई है। इस कुल रकबे में प्रमुख फसलों का वितरण इस प्रकार है
- बाजरा: 2,25,733 हेक्टेयर में बोया गया है।
- ग्वार: 1,14,845 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है।
- मूंगफली: 36,342 हेक्टेयर रकबे में दर्ज की गई है।
- मूंग: 31,009 हेक्टेयर भूमि पर आच्छादित है।
- चंवळा: 16,810 हेक्टेयर में इसकी खेती की गई है।
- मोठ: 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है।
जिले में इस बार खरीफ की कुल उपज का अनुमान लगभग 5,95,610 मीट्रिक टन आंका गया है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में मौसम का रुख ही यह तय करेगा कि यह अनुमानित आंकड़ा हासिल हो पाता है या नहीं।
मंडी भावों से थोड़ी उम्मीद और बारिश के संतुलन की चुनौती
फसलों को नुकसान की आशंका के बीच खुले बाजार में ग्वार के बढ़ते भावों ने किसानों को थोड़ी राहत अवश्य पहुंचाई है। किसान शिशुपाल सिंह बेरी ने बताया कि बुवाई के उपरांत लगातार बारिश मिलने से ग्वार की बढ़वार काफी अच्छी हुई थी, लेकिन अब बारिश बंद होने से ग्वार के साथ-साथ बाजरे की फसल को भी गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि अचानक बहुत भारी या तूफानी बारिश होती है, तो ग्वार के पौधे जमीन पर गिर सकते हैं, जिससे नुकसान और बढ़ जाएगा। इसी वजह से किसानों को इस समय केवल हल्की और संतुलित बारिश की दरकार है।
संयुक्त निदेशक कृषि शिवजीराम कटारिया के अनुसार विपरीत मौसमी परिस्थितियों की वजह से खरीफ फसलों की गुणवत्ता में गिरावट आई है। जब फलियों में दाना बनने की प्रक्रिया चल रही थी, उसी समय बारिश रुक जाने से कई कृषि क्षेत्रों में उत्पादन पर असर पड़ा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इस समय हल्की फुहारें फसलों को नया जीवन दे सकती हैं, जबकि तेज और मूसलाधार बारिश से खेतों में जलभराव, जड़ों में ऑक्सीजन की कमी तथा फलियों में फफूंद और सड़न जैसी नई व्याधियां पैदा होने का खतरा बना रहेगा।


















