लोक आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के प्रतीक लोक देवता वीर तेजाजी महाराज के पावन पर्व तेजा दशमी पर समूचे राजस्थान में श्रद्धा का व्यापक उत्साह देखने को मिला। कोटा सहित प्रदेश के शहरी इलाकों और दूरदराज के ग्रामीण अंचलों में सुबह के शुरुआती पहर से ही तेजाजी महाराज के थानकों तथा मंदिरों में दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं। श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर विधिपूर्वक देव प्रतिमाओं के दर्शन किए, विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए और अपने परिवार की उन्नति, सुख-शांति एवं समृद्धि के लिए प्रार्थना की। यह अवसर सामाजिक सौहार्द, अटूट जनआस्था और लोक संस्कृति का सजीव उदाहरण बनकर सामने आया।
धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक तेजा गायन और भव्य झंडा जुलूस
पर्व के उपलक्ष्य में राज्य के विभिन्न कस्बों और ग्राम पंचायतों में स्थित पारंपरिक थानकों को विशेष रूप से रंग-बिरंगी रोशनियों और फूलों से सुसज्जित किया गया। अनेक क्षेत्रों में पारंपरिक तेजा गायन, रात्रि जागरण और भजन संध्याओं का आयोजन हुआ, जहां स्थानीय गायकों ने वीर तेजाजी महाराज के जीवन चरित्र और वचनों पर आधारित यशोगान प्रस्तुत किए। नगाड़ों और ढोल की गूंज के साथ विशाल झंडा जुलूस निकाले गए, जिनमें हर उम्र के लोगों ने बड़े उत्साह से भागीदारी निभाई। जयकारों के उद्घोष से पूरे गांव और मोहल्ले गुंजायमान हो उठे, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बन गया।
सर्पदंश से रक्षा की जनश्रुति और तांती खोलने की रीत
जनमानस में वीर तेजाजी महाराज को नागवंशीय देवता और अपने वचन के पक्के महापुरुष के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पूजा जाता है। प्राचीन लोक धारणा के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को सांप या कोई विषैला कीट डस ले, तो सच्चे मन से तेजाजी का नाम लेकर बांधी जाने वाली तांती या डस्सी विष के घातक असर को निष्प्रभावी कर देती है। इस दृढ़ विश्वास के तहत पूर्व में मन्नत लेकर सुरक्षा धागा बांधने वाले सैकड़ों पीड़ित तेजा दशमी के दिन थानकों पर पहुंचे। पुजारियों की मौजूदगी में मंत्रोच्चार व रीतियों के साथ यह तांती कटवाई गई और भक्तों ने शीश नवाकर देव चरणों में कृतज्ञता व्यक्त की।
ग्रामीण मेलों में सांस्कृतिक छटा और सामाजिक सौहार्द
तेजा दशमी के उपलक्ष्य में अनेक मुख्य स्थानों पर पारंपरिक पशु एवं लोक मेलों का आयोजन हुआ। मेलों में पारंपरिक परिधानों से सजे आसपास के दर्जनों गांवों के ग्रामीणों की आवाजाही रही। तरह-तरह के पारंपरिक पकवानों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं के बाजारों और बच्चों के झूलों ने उत्सव की रौनक दोगुनी कर दी। इन आयोजनों ने न केवल लोक परंपराओं को जीवंत रखा, बल्कि आपसी सद्भाव और भाईचारे को भी सशक्त किया। पीढ़ियों से चली आ रही यह आस्था आज भी ग्रामीण संस्कृति के मूल में रची-बसी दिखाई देती है।





















