रोजदा: जयपुर का वह गांव जिसने 367 दिन की जंग लड़कर शराब को कहा अलविदा, कभी गुलाबों से महकती थी इसकी मिट्टीrajasthan
3 घंटे पहले· 0

रोजदा: जयपुर का वह गांव जिसने 367 दिन की जंग लड़कर शराब को कहा अलविदा, कभी गुलाबों से महकती थी इसकी मिट्टी

जयपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर बसा रोजदा गांव कभी गुलाब की खेती के लिए मशहूर था और आज प्रदेश में शराब मुक्ति की मिसाल बन चुका है। 2017 के आंदोलन और लगातार 367 दिनों के संघर्ष ने इस पंचायत को पूरे राजस्थान में पहचान दिलाई।

जयपुर मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर, जयपुर-कालवाड़ रोड के पास बसा रोजदा गांव आज राजस्थान के उन चुनिंदा गांवों में गिना जाता है जिन्होंने अपनी सामाजिक सोच और इतिहास से अलग पहचान बनाई है। एक ओर यहां की मिट्टी कभी गुलाबों की खुशबू से महकती थी, तो दूसरी ओर यही गांव आज नशे के खिलाफ खड़ी एक मजबूत मिसाल बन चुका है।

शराब के खिलाफ 367 दिन का लंबा संघर्ष

रोजदा को प्रदेश में सबसे ज्यादा पहचान शराब मुक्त पंचायत के रूप में मिली है। यही वह गांव है जिसे आज नशामुक्ति के लिए रोल मॉडल माना जाता है। इसकी शुरुआत साल 2017 में हुए शराबबंदी आंदोलन से हुई, जिसने रोजदा पंचायत को पूरे प्रदेश की चर्चा का केंद्र बना दिया।

यह कोई कुछ दिनों की मुहिम नहीं थी। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर लगातार 367 दिनों तक कठोर संघर्ष किया और तभी जाकर यह आंदोलन अपने मुकाम तक पहुंचा। इस सराहनीय पहल का असर इतना बड़ा था कि उस समय के सरपंच को जिला और राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर सम्मानित किया गया।

कभी गुलाबों की खेती थी पहचान

रोजदा की पुरानी पहचान खेती से जुड़ी रही है। एक दौर में यहां बड़े पैमाने पर गुलाब की खेती होती थी, जो स्थानीय किसानों की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया हुआ करती थी। समय बीतने के साथ यह खेती काफी घट गई, लेकिन यहां के किसान पीछे नहीं रुके। आज बहुत से किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ आधुनिक तरीकों की ओर भी बढ़ रहे हैं और दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं।

पहाड़ियों से घिरा 'डूंगर वाला गांव'

इतिहासकारों की मानें तो रोजदा की बसावट करीब वर्ष 1890 के आसपास मानी जाती है और पहले यह रोजदा जागीर के रूप में जाना जाता था। गांव चारों तरफ से पहाड़ियों यानी डूंगरों से घिरा हुआ है, यही वजह है कि प्राचीन समय में इसे "डूंगर वाला गांव" कहा जाता था।

इन्हीं पहाड़ियों की देन थी यहां की खेती। बारिश का पानी डूंगरों से बहकर खेतों में जमा हो जाता था, जिससे जमीन में लगातार पर्याप्त नमी बनी रहती थी। पानी की इसी प्राकृतिक उपलब्धता के कारण डाबर और आसपास के इलाकों में बड़े स्तर पर रोज यानी गुलाब की खेती संभव हो पाई, जो उस दौर में किसानों की आय का प्रमुख स्रोत थी।

गांव की बसावट और सामाजिक तानाबाना

रोजदा पंचायत के अंतर्गत रोजदा, सरदारपुरा, जेतपुरा, हरचंदपुरा और सिंडोलाई गांव आते हैं। मुंडोता से अलग होने के बाद इस पंचायत में पहला सरपंच चुनाव वर्ष 1965-66 में हुआ था। शिक्षा और सरकारी सेवाओं के मामले में भी यह क्षेत्र आगे रहा है — वर्तमान में पंचायत क्षेत्र से 150 से अधिक लोग अलग-अलग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।

यहां के सामाजिक ढांचे की बात करें तो पंचायत में कुमावत, जाट, राजपूत, ब्राह्मण, कुम्हार, खाती, महाजन तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति समेत अलग-अलग समाजों के लोग एक साथ रहते हैं। इन लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती, पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय और व्यापार पर टिकी हुई है।

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