विश्व बाघ दिवस के अवसर पर राजस्थान के मेवाड़ अंचल को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। लंबे समय से प्रस्तावित कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व की स्थापना का कार्य अपने अंतिम दौर में प्रवेश कर चुका है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा इस परियोजना से जुड़ी सभी आवश्यक प्रक्रियाओं और तकनीकी पड़तालों को पूरा कर लिया गया है। अब केवल राज्य सरकार की ओर से अंतिम आधिकारिक अधिसूचना जारी होने का इंतजार किया जा रहा है। जैसे ही यह अधिसूचना सार्वजनिक की जाएगी, कुंभलगढ़ भारत का 59वां और राजस्थान राज्य का चौथा घोषित बाघ अभयारण्य बन जाएगा। इसके साथ ही भौगोलिक दृष्टि से यह संपूर्ण भारतवर्ष के सबसे पश्चिमी छोर पर स्थित पहला टाइगर रिजर्व होने का गौरव भी प्राप्त करेगा।
तीन जिलों में फैला 600 वर्ग किलोमीटर का समृद्ध वन क्षेत्र
कुंभलगढ़ अभयारण्य का विस्तार राजसमंद, उदयपुर और पाली जिलों के विशाल भूभाग में फैला हुआ है। लगभग 600 वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे में फैले इस अरावली वन क्षेत्र को प्राकृतिक जैव विविधता का अनुपम केंद्र माना जाता है। इस अरण्य क्षेत्र में बाघों के सुरक्षित पुनर्वास के साथ-साथ पहले से ही तेंदुओं, भालुओं, लकड़बग्घों, जंगली बिल्लियों, लोमड़ियों, सियारों, चिंकारों, सांभर और नीलगाय समेत कई प्रजातियों के वन्यजीव बहुतायत में मौजूद हैं। यहां की सघन पहाड़ियां, घने प्राकृतिक जंगल और पानी के स्थायी स्रोत वन्यजीवों की जीवनशैली और उनके अस्तित्व के लिए एक अत्यंत सुरक्षित और उपयुक्त प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं।
वन संरक्षण और अवैध गतिविधियों पर कसेगा शिकंजा
पर्यावरण और वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे अंचल को टाइगर रिजर्व का औपचारिक दर्जा मिलने से अरावली की वन श्रृंखला को प्रशासनिक और वैज्ञानिक संरक्षण की नई ताकत मिलेगी। बाघों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित होने के साथ ही क्षेत्र में अन्य दुर्लभ वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जाएगी। आधिकारिक दर्जा मिलने के बाद वन विभाग को केंद्र और राज्य स्तर से अतिरिक्त वित्तीय संसाधन, आधुनिक उपकरण और विशिष्ट संरक्षण योजनाएं प्राप्त होंगी। इससे जंगलों में होने वाले अवैध शिकार, पेड़ों की कटाई और वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण जैसी गतिविधियों पर कड़ाई से प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।
पर्यटन विस्तार और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी यह महत्वाकांक्षी परियोजना संपूर्ण मेवाड़ क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकती है। बाघ अभयारण्य का स्वरूप लेते ही देश के साथ-साथ विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटकों, वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं का आगमन इस क्षेत्र में बढ़ेगा। इससे स्थानीय ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार और रोजगार के व्यापक नए अवसर सृजित होंगे। विशेष रूप से आतिथ्य क्षेत्र के तहत होटल व्यवसाय, होम स्टे, टूर गाइड, जंगल सफारी संचालन, स्थानीय हस्तशिल्प और खान-पान के पारंपरिक उद्योगों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियां तेज होने से समग्र विकास को नई गति हासिल होगी।
जनप्रतिनिधियों के सुझाव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यद्यपि इस परियोजना की घोषणा को लेकर स्थानीय स्तर पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक विचार सामने आए हैं। कुछ जनप्रतिनिधियों ने पर्यावरण एवं वन्यजीव सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय निवासियों और पारंपरिक पशुपालकों के आजीविका संबंधी अधिकारों को संतुलित रखने की आवश्यकता जताई है। वहीं दूसरी ओर, अनेक जनप्रतिनिधियों और विचारकों का मानना है कि यह निर्णय मेवाड़ के दीर्घकालिक सतत विकास के लिए ऐतिहासिक सिद्ध होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 1953 तक कुंभलगढ़ के जंगलों में बाघों की नियमित मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। ऐसे में बाघों का यह पुनरागमन अरावली के जंगलों के पुनरुद्धार और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।



















