राजस्थान के शेखावाटी अंचल में सांस्कृतिक रौनक और लोक जीवन की सजीव झलक इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है। सीकर जिले के बेरी गांव में आयोजित होने वाले सालाना पशु मेले में लोक परंपराओं का अनूठा उल्लास बिखर रहा है। यह वार्षिक आयोजन सिर्फ मवेशियों की सामान्य खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पीढ़ियों पुरानी देहाती कला और समृद्ध राजस्थानी संस्कृति के जीवंत प्रदर्शन का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। मेले के विशाल मैदान में जब घुंघरुओं, रंगीन झालरों और पारंपरिक आभूषणों से सजे ऊंट और उन्नत नस्ल की घोड़ियां लोकगीतों की धुन पर कदमताल मिलाते हैं, तो वहां मौजूद दर्शक उनकी सधी हुई चाल देखकर हैरान रह जाते हैं। इस मनमोहक नजारे को अपनी आंखों में कैद करने के लिए राजस्थान के कोने-कोने के साथ ही पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी तादाद में लोग बेरी पहुंच रहे हैं।
चंग और ढोलक की गूंज पर कदमों की जुगलबंदी
इस पूरे मेले का सबसे प्रमुख और रोमांचक आकर्षण ऊंट तथा घोड़ी नृत्य की विशेष प्रतियोगिता है। इसमें अलग-अलग ग्रामीण इलाकों से आए पशुपालक अपने सधे हुए और खास तौर पर प्रशिक्षित पशुओं के साथ शिरकत कर रहे हैं। जैसे ही लाउडस्पीकर पर पारंपरिक चंग और ढोलक की थाप बजती है, लोकगीतों के सुर हवा में घुलने लगते हैं। अपने मालिकों के छोटे-छोटे इशारों को भांपते ही ये विशालकाय ऊंट संगीत की ताल के साथ लयबद्ध अंदाज में कदम आगे बढ़ाते हैं। कभी अपनी लंबी गर्दन को नजाकत से घुमाकर मटकाना और कभी आगे-पीछे घूमकर हैरतअंगेज करतब पेश करना, इन मवेशियों की कलाबाजी देखने लायक होती है। पशुपालकों और इन बेजुबानों के बीच का यह अटूट विश्वास और अचूक तालमेल पूरे मैदान में उत्साह का संचार कर देता है, जिससे दर्शक तालियों और सीटियों से उनका हौसला बढ़ाते नजर आते हैं।
मोती और गजराज के साथ इन प्रशिक्षित ऊंटों ने बिखेरा जलवा
इस बार की प्रतियोगिता में कई चर्चित और लोकप्रिय ऊंटों ने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई है। इनमें मोती और गजराज नाम के ऊंट विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, जिनकी पहचान इलाके में अपने बेहतरीन डांस और अचरज भरे करतबों के लिए पहले से स्थापित है। इनके अलावा मैदान में हंसराज, नान्या, राजा, हंस, तूफान, टाइगर और बादल जैसे कई अन्य प्रशिक्षित ऊंट भी अपने हुनर की चमक बिखेर रहे हैं। मेले में रोजाना सूरज ढलते ही यह नृत्य और करतब मुकाबला शुरू हो जाता है। शाम के समय एक के बाद एक कई ऊंट अपनी अनूठी प्रस्तुतियां देकर वहां जमा लोगों का भरपूर मनोरंजन कर रहे हैं और उत्सव के माहौल को चार चांद लगा रहे हैं।
महीनों के कठोर अभ्यास और निरंतर साधना का नतीजा
पशुपालकों का स्पष्ट कहना है कि ढोल-नगाड़ों और लाउडस्पीकर के तेज शोर के बीच मवेशियों का इस तरह थिरकना कोई आसान काम नहीं है और यह हुनर किसी एक दिन में तैयार नहीं होता। इस सधे हुए प्रदर्शन के पीछे कई महीनों की अथक मेहनत, रोज का अभ्यास और पशुपालकों का गहरा समर्पण जुड़ा होता है। पालक हर रोज घंटों पसीना बहाकर अपने ऊंटों को खास संकेतों, आवाज और शारीरिक इशारों की भाषा सिखाते हैं। लगातार दी जाने वाली इसी कड़े प्रशिक्षण का फल होता है कि मेले में हजारों की भीड़, शोरगुल और तेज आवाज के बावजूद ये बेजुबान तनिक भी विचलित नहीं होते और बिना किसी घबराहट के बिल्कुल सटीक तालमेल के साथ अपनी प्रस्तुति पूरी करते हैं।
पशुओं का व्यापार और शाम की रंगारंग सांस्कृतिक महफिल
करतब और नृत्य की इन रोमांचक प्रतियोगिताओं के साथ-साथ मेले में ऊंटों, घोड़ों और अन्य तमाम दुधारू व भारवाही पशुओं का व्यापार भी जोर-शोर से चल रहा है। सुदूर इलाकों से पहुंचे व्यापारी और स्थानीय ग्रामीण दिनभर तंबुओं के बीच पशुओं के मोलभाव में व्यस्त रहते हैं। व्यापार की इस गहमागहमी के बीच जैसे ही शाम घिरती है, पूरा मेला परिसर विशुद्ध लोक संस्कृति के रंगों में रंग जाता है। देर रात तक सजने वाली सांस्कृतिक चौपालों में लोक कलाकार पारंपरिक गीतों, देहाती संगीत और वाद्ययंत्रों की प्रस्तुतियों से ऐसा समां बांधते हैं कि मेले में मौजूद हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध होकर झूमने पर मजबूर हो जाता है।



















