दिल्ली हाईकोर्ट में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के तकनीकी ढांचे और उनके एडिक्टिव डिजाइन को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है। इस कानूनी मुहिम में राजस्थान के उदयपुर की रहने वाली अधिवक्ता सुभिका जोशी भी शामिल हैं, जिन्होंने अधिवक्ता कार्तिका शर्मा के साथ मिलकर कानून के प्रोफेसर डॉ. विकास कथूरिया की ओर से यह याचिका अदालत के समक्ष पेश की है। इस याचिका में उन विशेष फीचर्स पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं जो यूजर्स को लगातार ऐप पर बने रहने के लिए उकसाते हैं।
क्या है सोशल मीडिया का एडिक्टिव डिजाइन?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल केवल उस पर मौजूद वीडियो, फोटो या पोस्ट की वजह से नहीं बढ़ रहा है। असल में, इन प्लेटफॉर्म्स के पीछे काम करने वाली कोडिंग और तकनीकी डिजाइन को इस तरह से तैयार किया गया है कि लोग चाहकर भी इनसे दूर न रह सकें। ऐसे कई फीचर्स एल्गोरिदम के जरिए काम करते हैं जो यूजर्स की पसंद को ट्रैक करते हैं और उन्हें लगातार स्क्रॉल करने के लिए मजबूर करते हैं। इस आर्किटेक्चर के कारण लोग बार-बार इन ऐप्स पर लौटते हैं, जिससे वे अपने समय और मानसिक स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया की ये तकनीकें मानव मनोविज्ञान को प्रभावित करती हैं। जब कोई यूजर बार-बार नोटिफिकेशन देखता है या अनवरत स्क्रॉलिंग करता है, तो उसका दिमाग डिजिटल रूप से बंध जाता है।
बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर
याचिका में इस बात पर विशेष चिंता व्यक्त की गई है कि इस लत का सबसे खतरनाक असर देश के बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। किशोरों के मानसिक विकास और उनके सामाजिक व्यवहार पर इन एडिक्टिव फीचर्स का बेहद नकारात्मक असर हो रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का यह तकनीकी ढांचा उनके व्यवहार को इस कदर प्रभावित करता है कि वे इसके आदी हो जाते हैं। इससे न केवल उनकी पढ़ाई और शारीरिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है, बल्कि उनके भीतर मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं भी जन्म ले रही हैं।
अदालती सुनवाई और न्यायाधीश का हटना
इस अहम मामले पर 9 सितंबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई तय की गई थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान पीठ के एक माननीय न्यायाधीश ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। इस रीक्यूजल के बाद अब इस याचिका को अगले सप्ताह किसी दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। कानूनी विश्लेषकों और आम जनता की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आगामी सप्ताह में नई पीठ इस गंभीर संवेदनशील मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाती है।
कड़े कानून और दिशा-निर्देशों की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई है कि भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इन नुकसानदेह एडिक्टिव डिजाइन फीचर्स को प्रतिबंधित, नियंत्रित या नियमित करने के लिए केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को उचित आदेश दिए जाएं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि जब तक इस विषय पर कोई सख्त संसद कानून नहीं बन जाता, तब तक सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट की ओर से अस्थायी दिशा-निर्देश जारी किए जाएं ताकि देश के नागरिकों और विशेषकर बच्चों को इस डिजिटल खतरे के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रखा जा सके।



















